भारत और इंग्लैंड के बीच खेली जा रही टेस्ट सीरीज के चौथे मैच के तीसरे दिन का खेल अभी चल ही रहा था कि अार अश्विन की प्रभावहीन गेंदबाजी और विराट कोहली की कप्तानी सोशल मीडिया पर आलोचना का सबब बनने लगी. खेल के शुरुआती दो दिनों तक जो मैच भारत की पकड़ में लग रहा था, उसके संतुलन को तीसरे दिन के खेल ने काफी हद तक इंग्लैंड की तरफ झुका दिया. तीसरे दिन का खेल खत्म होने तक इंग्लैंड ने दूसरी पारी में अाठ विकेट खोकर 260 रन बना लिए हैं और उसे 233 रनों की बढ़त मिल चुकी है. खेल के चौथे दिन अगर यह लीड 250 रनों से ऊपर निकली तो चौथे पारी में इस स्कोर का पीछा करने में भारत को खासी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा.

तीसरे दिन के खेल की शुरुआत भारत के लिहाज से ठीक ही रही. जब जसप्रीत बुमराह और ईशांत शर्मा ने एलिस्टर कुक और नंबर तीन पर बल्लेबाजी करने अाए मोइन अली को जल्द पैवेलियन भेज दिया. लेकिन विराट कोहली समेत भारतीय खेमे को जिस गेंदबाज से सबसे ज्यादा उम्मीद थी. वे थे आर अश्विन. साउथ हैम्पटन का विकेट पूरी तरह स्पिन बॉलिंग के मुफीद था. कप्तान कोहली अश्विन को जल्द गेंदबाजी पर लाए, लेकिन शुरुआत से ही वे खास प्रभावी नहीं दिखे. मोइन अली जहां दूसरी पारी में ही पिच के रफ एरिया का बेहतरीन तरीके से इस्तेमाल कर रहे थे वहीं अश्विन की गेंद का टप्पा वहां पड़ ही नहीं रहा था. अश्विन किस कदर अप्रभावी रहे इसका अंदाजा उनके गेंदबाजी विश्लेषण से लगाया जा सकता है. 35 ओवर में 78 रन देकर अश्विन को एक सिर्फ एक विकेट मिला.

मैदान में खिली धूप और बिल्कुल सूखा विकेट. एक स्पिन गेंदबाज के लिए इससे बेहतर हालात और क्या हो सकते थे. लेकिन अश्विन इसका फायदा नहीं उठा पाए. अश्विन के अालोचक विदेशी पिचों पर उनके प्रदर्शन पर सवाल उठाते हैं और उन्हें भारत का ही स्पिन गेंदबाज मानते हैं,लेकिन इस सीरीज के पहले मैच में अश्विन ने एक पारी में पांच विकेट चटका कर इसका जवाब दिया था. लेकिन शनिवार को अश्विन ने शायद अपने करियर के सबसे खराब स्पेल फेंके. टि्वटर पर एक यूजर ने लिखा कि स्पिन गेंदबाजी एक कला होती है, लेकिन अश्विन ने उसे विज्ञान बना दिया है. भरोसे के साथ एक लेंथ पर बॉलिंग करने के बजाय वे लगातार प्रयोग करते रहे और इंग्लिश बल्लेबाजों ने उन्हें आराम से खेला.

दरअसल अश्विन उस किस्म गेंदबाज हैं भी नहीं जो पिच के रफ एरिया का इस्तेमाल कर बल्लेबाजों को मुश्किल में डाले. वे अपनी गेंदबाजी में गति और विविधता पर ज्यादा जोर देते हैं. वे आमतौर पर अोवर में दो तीन बार अपनी लेंथ बदलते हैं. लेकिन साउथ हैम्पटन के विकेट पर शायद यह करने की जरूरत नहीं थी. उन्हें विकेट के रफ एरिया पर गेंद करनी थी,लेकिन उनका टप्पा उससे दूर ही रहा. मोइन अली फुटहोल्स में एक ओवर में दो गेंद तक फेंक रहे थे, वहीं अश्विन का टप्पा वहां कभी-कभार ही पड़ा.

इसके अलावा इन हालात में कई बार स्पिनर्स स्पीड कम करके फ्लाइट देते हैं, लेकिन अश्विन ने न ऐसा प्रयास किया और न कप्तान की ओर से भी उन्हें एेसी कोई सलाह मिलती नहीं दिखी. ऱफ एरिया का इस्तेमाल करने का सबसे अच्छा तरीका था कि वे अपनी गेंद गुडलेंथ पर रखते. लेकिन अश्विन एेसा करते नहीं दिखे. मोइन अली ने जहां 70 फीसद गेंदे गुडलेंथ पर फेंकी वहीं अश्विन फुल लेंथ या बैक आफ लेंथ गेंदबाजी करते रहे. हरभजन सिंह ने भी अश्विन को विकेट न मिलने पर हैरत जताई.

अश्विन पर उम्मीदों का पहाड़ था, लेकिन उन्होंने निराश किया. हालांकि सवाल विराट कोहली की कप्तानी पर भी उठ रहे हैं. क्रिकेट विशेषज्ञों का मानना है कि जब अश्विन प्रभावी साबित नहीं हो पा रहे थे तो उनसे इतनी लंबी बालिंग क्यों करवाई गई? भारत द्वारा फेंके गए ओवरों में एक तिहाई से ज्याजा ओवर अश्विन ने फेंके. यहां विराट शायद इस उम्मीद में थे कि अश्विन सफलता मिलने के बाद विकेटों की झड़ी लगा देंगे. लेकिन क्या अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में इस किस्म के अाशावाद के अाधार पर कप्तानी करनी चाहिए?. इंग्लैंड के अखबार इंडिपेंडेंट के चीफ स्पोर्ट्स राइटर जॉनथन लियू ने लिखा, ‘कोहली के लिए दिन रहा.अजीबोगरीब फील्डिंग.खराब रिव्यू. देर से नई गेंद लेना और उसे फिर अश्विन को देना. अश्विन से बेवजह लंबी बॉलिंग कराना और हार्दिक पांड्या से लंबे समय तक बॉलिंग न कराना.’



जॉनथन लियू का सवाल जायज भी लगता है. माना कि विकेट में तेंज गेंदबाजों को स्विंग नहीं मिल रही थी, लेकिन इसके बाद भी भारत के तीनों मुख्य गेंदबाद जसप्रीत बुमराह, ईशांत और शमी अच्छी गेंदबाजी कर रहे थे और उन्होंने ही बीच-बीच में विकेट निकाले. इसके अलावा 66 ओवर तक हार्दिक पांड्या का बतौर गेंदबाज इस्तेमाल ही नहीं किया गया. सवाल उठता है कि अगर हार्दिक से गेंदबाजी नहीं करानी थी तो उन्हें खिलाया ही क्यों गया था. क्या उन्हें बतौर बल्लेबाज खिलाया गया था. जानकारों के मुताबिक अगर एक अतिरिक्त बल्लेबाज ही खिलाना था तो पृथ्वी शॉ को मौका देना ज्यादा ठीक होता. इसके अलावा अश्विन तीसरे टेस्ट में ही चोटिल थे. क्रिकेट विशेषज्ञों का मानना है कि अपनी बॉलिंग के दौरान भी उन पर चोट का असर दिख रहा था. एेसे में क्या रविंद्र जड़ेजा ज्यादा बेहतर विकल्प नहीं होते जो रफ एरिया का ज्यादा बेहतर इस्तेमाल करते हैं?

दरअसल चीजें जब अापके खिलाफ जाती हैं तो अापके फैसलों पर उंगली उठने लगती है. अभी तक विराट कोहली इस बात को लेकर अालोचनाओं का शिकार थे कि वे हर मैच में टीम बदलते हैं. अब जब कोहली ने तीसरे टेस्ट की विजेता टीम को जस का तस मैदान में उतारा तो क्रिकेट विशेषज्ञ इस बात पर अालोचना कर रहे हैं कि चोटिल अश्विन की जगह उन्होंने रविंद्र जड़ेजा को खिलाना चाहिए था.

भारतीय टीम मैनेजमेंट से पिच का रूख भांपने में भी शायद गलती हुई. साउथ हैम्पटन की ‘ओवरकास्ट’ परिस्थितयों को देखते हुए भारत ने सिर्फ एक स्पिनर खिलाया, वहीं इंग्लैंड की टीम ने आदिल रशीद और मोइन अली दोनों को टीम में जगह दी. केएल राहुल को लगातार मौका देने को लेकर विराट पहले से ही अालोचनाओं के घेरे में हैं.

विराट कोहली निसंदेह दुनिया के सबसे शानदार बल्लेबाजों में से एक हैं. लेकिन उनकी कप्तानी पर जब तब सवाल उठते रहते हैं. वेस्टइंडीज के महान तेज गेंदबाज माइकल होल्डिंग ने कहा था, ‘क्रिकेट को लेकर विराट कोहली बहुत ही भावुक हैं, लेकिन उन्हें अपनी कप्तानी में सुधार की जरुरत है.’ इंग्लैंड के पूर्व कप्तान नासिर हुसैन भी एजबेस्टन टेस्ट में विराट की कप्तानी की अालोचना कर चुके हैं.

भारत साउथैम्टन टेस्ट में २३३ रनों से पिछड़ चुका है और इंग्लैंड के हाथ में अभी भी दो विकेट हैं. जाहिर है कि फुटहोल्स से भरी पिच में २५० के स्कोर का पीछा करना और उसका बचाव करना मुश्किल काम है. इतिहास भी इस मामले मेंं भारत के साथ नहीं है. एशिया से बाहर भारत सिर्फ तीन बार ही २०० से ज्यादा रनों का पीछा कर जीत पाया है. विराट के पास इन अालोचनाओं का जवाब देना का तरीका उनकी बल्लेबाजी ही है.