हाल ही में इंडोनेशिया में संपन्न हुए 18वें एशियाई खेलों में 69 पदकों के साथ भारत आठवें स्थान पर रहा. भारतीय खिलाड़ियों ने 15 स्वर्ण, 24 रजत और 30 कांस्य पदक अपने नाम किए. पदकों की संख्या के हिसाब से एशियाई खेलों में यह भारत का अभी तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है.

पिछले तीन बार के एशियाई खेलों पर नजर डालें, तो इस दौरान महिला खिलाड़ियों द्वारा काफी संख्या में पदक हासिल किए गए. 2010 के एशियाई खेलों में महिला खिलाड़ियों ने 64 में से 21 पदक हासिल किए थे जो कुल पदकों का 32 प्रतिशत था. 2014 में महिला खिलाड़ियों ने 57 में से 28 पदक हासिल किए और फीसदी का यह आंकड़ा 49 पर आ गया. इस बार महिला खिलाड़ियों ने अपने शानदार प्रदर्शन को जारी रखते हुए कुल 69 पदकों में से 31 पदक हासिल किए जो कुल पदकों का 44 प्रतिशत है.

जानकारों का मानना है कि खेलों में महिला खिलाड़ियों द्वारा पदक हासिल करना पुरुष खिलाड़ियों के मुकाबले ज्यादा बड़ी उपलब्धि है. हमारे देश में सरकारी मशीनरी की अवहेलना झेलना तो एक ऐसी समस्या है जिसका सामना सभी खिलाड़ियों को करना ही पड़ता है. लेकिन लड़कियों के सामने इससे अलग भी कई तरह की चुनौतियां होती हैं.

सबसे पहली चुनौती तो यही है कि हमारे समाज का एक बड़ा तबका आज भी उन्हें खिलाड़ी के रूप में आसानी से स्वीकार नहीं करता. इसलिए उनके साथ कोई सहयोग करना तो दूर, उलटे यह कहकर उनका मनोबल ही तोड़ता है कि खेलना-कूदना तो सिर्फ लड़कों का काम है. ऐसे में कोई लड़की यदि अपने प्रयासों से खेल की दिशा में बढ़ती भी है, तो सबसे पहले उसे अपने परिवार और रिश्तेदारों के असहयोग और उनकी नकारात्मक सोच का सामना करना पड़ता है.

दूसरा, भारतीय समाज में अब भी एक बड़ा हिस्सा है जिसमें लड़कियों को लड़कों की अपेक्षा कम पौष्टिक खाना दिया जाता है. इसका नकारात्मक असर उनके स्टैमिना और सेहत दोनों पर पड़ता है. ऐसे में यदि कोई लड़की परिवार की मर्जी के खिलाफ जाकर किसी खेल में खुद को झोंकती है, तो शारीरिक दुर्बलता से निपटना ही उसके लिये एक बड़ा संघर्ष बन जाता है. परिवार में यदि कोई लड़का खेल की दुनिया में जाने की तैयारी करता है तो अक्सर ही उसकी पौष्टिकता और उसके स्टैमिना का ख्याल करके उसकी खुराक बढ़ा दी जाती है. बल्कि यदि परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर हो तो भी पूरे परिवार के बजट में कटौती करके, खिलाड़ी बनने जा रहे लड़के की खुराक का ध्यान रखा जाता है. पूरा परिवार एकजुट होके लड़के की सेहत और उसका स्टैमिना बढ़ाने की जिम्मेदारी निभाता है.

लेकिन किसी लड़की के खिलाड़ी बनने पर ठीक इसके उलट उसके खाने में पहले जैसी ही लापरवाही बरती जाती है. लड़कियों के लिये अपनी स्थाई शारीरिक कमजोरी से लड़ने के लिये नियमित रूप से ज्यादा सेहतमंद खाना जुटाना ही एक बहुत बड़ी बाधा है जो सबसे पहले उसका परिवार ही उसके सामने खड़ी करता है. पुरुष खिलाड़ी तो जानते तक नहीं कि खिलाड़ी बनने में ऐसी भी किसी दिक्कत का सामना करना पड़ता है.

महिला खिलाड़ियों के साथ एक अन्य दिक्कत प्रशिक्षकों की उपलब्धता से जुड़ी है. जैसे ही घर वालों को पता चलता है की उनका बेटा किसी खेल में जाना चाहता है तो वे अक्सर ही अपने सामर्थ्य के अनुसार उसके लिये अच्छे कोच को ढूंडते हैं. उधर, लड़कियों के लिए यह बनिस्बत मुश्किल होता है. शुरुआत में अक्सर ही उन्हें इधर-उधर से अपना खेल संबंधी ज्ञान बटोर कर अकेले ही बिना किसी मार्गदर्शन के प्रैक्टिस करनी पड़ती है. हां, यदि वे अपनी मेहनत और किस्मत के दम पर शुरू में ही कोई पदक या इनाम जीत लेती हैं, तब जाकर घरवाले उसके लिये किसी कोच ढूंढने का सोचते हैं. यानी लड़की खिलाड़ी को पहले खुद को एक स्तर तक साबित करना होता है कि हां वह अपने खेल के प्रति बेहद संजीदा है और उसमें प्रतिभा है.

इन सबसे अलग एक और बड़ी बाधा है जो महिला खिलाड़ियों को झेलनी पड़ती है. उन्हें कई बार लिंगभेदी और यौन शोषण वाली स्थितियों से भी दो-चार होना पड़ता है. कोच द्वारा यौन शोषण, शारीरिक गठन को लेकर भद्दे कमेंट्स, टीम में चुनाव के लिये योग्यता के बजाय कोच या किसी अधिकारी के साथ संबंध बनाने के दबाव और ऐसे ही अन्य बहुत से कौंचने वाले अनुभवों से महिला खिलाड़ियों को गुजरना पड़ता है. अक्सर ही लड़कियों के पास यौन शोषण या लिंगभेदी व्यवहारों से लड़ने का कोई अच्छा विकल्प नहीं होता. क्योंकि यदि वे कहीं कोई शिकायत दर्ज कराती हैं तो यह तय है कि उसके बाद उस खेल की टीम में शामिल होना उनके लिये लगभग असंभव हो जायेगा. ये सभी चीजें किसी भी खिलाड़ी का मनोबल तोड़ने में बहुत अहम भूमिका निभाती हैं.

पुरुष खिलाड़ियों को उपरोक्त सभी चुनौतियों से शायद ही अपने खेल जीवन में कभी गुजरना पड़ता हो. (अपवाद हो सकते हैं) यहां तक कि उन्हें शायद अहसास भी नहीं होगा कि खिलाड़ी बनने के लिये लड़कियों/महिलाओं को अक्सर ही कितनी बुनियादी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. (यहां भी अपवाद हो सकते हैं)

इस सबके बावजूद महिलाओं ने पुरुषों के साथ मिलकर एशियाई खेलों में जो बड़ी उपलब्धि हासिल की है उसने खेलों में और ज्यादा संख्या में लड़कियों के आने के लिए रास्ता तैयार कर दिया है. ये महिला खिलाड़ी बहुत सारी लड़कियों के लिए रोल मॉडल बनेंगी. महिला खिलाड़ियों की यह सफलता निश्चित तौर पर समाज की सोच भी बदलने में सहयोग करेगी जिसका सकारात्मक असर आने वाली नई खिलाड़ियों पर पड़ेगा. महिला-पुरुष खिलाड़ियों की यह उपलब्धि बहुत साफ़ तौर पर एक और भी संदेश दे रही है. वह यह कि अगर महिला और पुरुष इसी तरह मिलकर और बराबर कोशिश करें तो भारत कई अन्य क्षेत्रों में भी अभूतपूर्व स्तरों पर पहुंच सकता है.