प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील के बाद एक करोड़ लोगों के एलपीजी सब्सिडी छोड़ने की उम्मीद जताई गई थी. तीन महीने बाद भी हकीकत उस आंकड़े से कोसों दूर क्यों है?
इस साल मार्च में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपील की थी कि जो लोग रसोई गैस सिलिंडर बाजार भाव पर ले सकते हैं वे सब्सिडी छोड़ दें. इसी महीने सब्सिडी छोड़ो अभियान की आधिकारिक शुरुआत हुई थी. इसके बाद उम्मीद जताई गई कि जल्द ही एक करोड़ लोग यह सब्सिडी छोड़ सकते हैं.
लेकिन ताजा आंकड़े बताते हैं कि हकीकत इस लक्ष्य से कोसों दूर है. तब से अब तक सिर्फ 0.35 फीसदी लोगों ने ही एलपीजी सब्सिडी छोड़ी है. यह आंकड़े पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की अध्यक्षता में पिछले सप्ताह हुई समीक्षा बैठक के बाद सामने आए हैं. इसके मुताबिक अब तक करीब साढ़े पांच लाख लोगों ने ही स्वैच्छिक तरीके से एलपीजी सब्सिडी लेना बंद किया है. देश में करीब 15.3 करोड़ एलपीजी उपभोक्ता हैं.
इक्का-दुक्का उदाहरणों को छोड़ दें तो सब्सिडी छोड़ो अभियान के प्रति खुद सांसदों, विधायकों या सरकारी अधिकारियों की प्रतिक्रिया कोई खास उत्साहजनक नहीं है.
कई महीनों से सरकार सब्सिडी छोड़ो अभियान को आक्रामक तरीके से प्रचारित कर रही है. कुछ समय पहले खबर आई थी कि पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री धर्मेंद्र प्रधान खुद विशिष्ट व्यक्तियों, मंत्रियों और नेताओं को फोन करके सब्सिडी वाला सिलिंडर छोड़ने का आग्रह कर रहे हैं. कहा गया कि उनके आग्रह पर वित्त मंत्री अरुण जेटली और अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी सहित कई व्यक्तियों ने सस्ता गैस सिलिंडर लेना बंद कर दिया. लेकिन इन इक्का-दुक्का उदाहरणों को छोड़ दें तो सब्सिडी छोड़ो अभियान के प्रति खुद सांसदों, विधायकों या सरकारी अधिकारियों ने कोई खास प्रतिक्रिया नहीं दिखाई है. बताया जाता है कि सत्ताधारी भाजपा सहित विभिन्न दलों के बहुत से सांसद अब भी एलपीजी सब्सिडी ले रहे हैं. सब्सिडी छोड़ो अभियान पर अलग-अलग महानगरों के पॉश इलाकों में रहने वाले लोगों की प्रतिक्रिया भी कोई खास नहीं है.
उपभोक्ताओं को अभी हर साल 14.2 किलो के 12 या पांच किलो वाले 34 सिलेंडर सब्सिडी पर मिलते हैं. 14.2 किलो वाले सिलेंडर की बाजार कीमत 625.50 और पांच किलो वाले की 220 रुपये बैठती है. दिल्ली में 14.2 किलोग्राम के सब्सिडी वाले सिलेंडर का दाम 417 रुपये है जबकि पांच किलोग्राम के सिलेंडर का 155 रुपए. लोगों द्वारा एलपीजी सब्सिडी छोड़ने से सरकार के सब्सिडी बिल में काफी कमी आ सकती है. पिछले वित्तीय वर्ष में ईंधन सब्सिडी का आंकड़ा करीब 36,580 करोड़ रुपये था. 2015-16 के बजट अनुमान के अनुसार चालू वित्त वर्ष में पेट्रोलियम सब्सिडी को 60,270 करोड़ रुपये से घटाकर 30 हजार करोड़ रुपये किया गया है. इसमें से 22 हजार करोड़ रुपये एलपीजी और बाकी केरोसीन के लिए रखे गए हैं.
सवाल उठता है कि सब्सिडी छोड़ो अभियान के प्रति लोगों के इस निरुत्साह की क्या वजह हो सकती है? एक वर्ग को इस अभियान में सिर्फ भावनाओं की राजनीति दिख रही है. अपने एक लेख में वरिष्ठ पत्रकार संदीपन शर्मा कहते हैं, 'अगर आप लोगों को राजनीतिक रूप से नहीं मना सकते तो भावनात्मक रूप से उन्हें ब्लैकमेल करिए. सब्सिडी का बोझ उनकी अंतरात्मा पर डाल दीजिए और खुद संसद भवन की कैंटीन में 25 रु में चिकन उड़ाइए.' उनके मुताबिक पिछली यूपीए सरकार ने जब सब्सिडी वाले सिलिंडरों की संख्या घटाई थी तो तब भाजपा ने हंगामा खड़ा कर दिया था, लेकिन अब उसकी सरकार चाहती है कि लोग खुद सब्सिडी छोड़ दें.
जानकारों के मुताबिक यह अपील ऐसा संदेश देने की कोशिश करती है कि लोगों का सब्सिडी लेना गलत है जबकि सरकार का सब्सिडी देना उसकी उदारता है.
जानकारों के मुताबिक सरकार की यह अपील ऐसा संदेश देने की कोशिश करती है कि लोगों का सब्सिडी लेना गलत है जबकि सरकार का सब्सिडी देना उसकी उदारता है. कभी वाजपेयी सरकार ने ही यह नीतिगत फैसला लिया था कि पेट्रोल, डीजल और एलपीजी के दाम अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों के हिसाब से तय किए जाएंगे. उसके बाद आई यूपीए सरकार ने यह नीति जारी रखी. यूपीए के शासन के दौरान कच्चे तेल की कीमतें उछाल मारते हुए 115 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थीं. आज यह आंकड़ा 60 डॉलर के आसपास आ गया है. लेकिन पेट्रोल और डीजल का दाम अब भी 60 और 50 रु प्रति लीटर से ऊपर बना हुआ है और एलपीजी करीब 450 रु प्रति सिलिंडर की दर से मिल रही है.
ये कीमतें लगभग वही हैं जो यूपीए सरकार के दौरान तब थीं जब कच्चे तेल की कीमत कहीं ज्यादा थी. इसके चलते ही कई जानकार मानते हैं कि एलपीजी सब्सिडी की वजह से सरकार पर जो बोझ पड़ रहा है वह उस फायदे की तुलना में कहीं कम है जो सरकार कच्चे तेल की कीमतें आधी होने के बावजूद एलपीजी और दूसरे ईंधनों की कीमतें जानबूझकर ऊंची रखकर लोगों से वसूल कर रही है. जानकारों का कहना है कि कहीं न कहीं आम जनता को भी यह समझ में आ रहा है. विश्लेषकों के मुताबिक वाजपेयी सरकार के दौरान और उसके बाद खुले बाजार के हिसाब से मूल्य तय करने की जो नीति अपनाई गई है उसके हिसाब से पेट्रोल-डीजल 36 और 25 रु प्रति लीटर और एलपीजी 300 रु प्रति सिलिंडर के हिसाब से बिकनी चाहिए.
यही वजह है कि लोगों को सब्सिडी छोड़ने की यह अपील सिर्फ पब्लिसिटी स्टंट लग रही है. जानकारों के मुताबिक अगर सरकार आम आदमी की जेब पर पड़ रहे बोझ के प्रति इतनी ही चिंतित है तो उसे एलपीजी और दूसरे ईंधनों की कीमत को कच्चे तेल के मौजूदा दाम के हिसाब से रखना चाहिए. आम आदमी पर पड़ रहा बोझ खुद ही कम हो जाएगा.