राजनीति में तमाम विराेधाभास साथ-साथ चला करते हैं. ऐसा ही एक विरोधाभासी घटनाक्रम इन दिनों तेलंगाना की सियासत में घटता दिख रहा है. यहां तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) की सरकार है और पार्टी के मुखिया के चंद्रशेखर राव (केसीआर) राज्य के मुख्यमंत्री. केसीआर देश के उन चुनिंदा राजनेताओं में शुमार होते हैं जो लोक सभा के साथ राज्य विधानसभाओं के चुनाव भी कराए जाने के पक्षधर हैं. ख़ास बात यह कि उनके राज्य तेलंगाना में अगले साल लोक सभा के साथ विधानसभा चुनाव भी निर्धारित हैं. लेकिन यहीं दिलचस्प विरोधाभास यह बन गया कि केसीआर ने तमाम अटकलों को सच साबित करते हुए गुरुवार को राज्य विधानसभा भंग कर दी.

वैसे इस तरह की ख़बरें पहले से आ रही थीं कि केसीआर राज्य में समय से पहले चुनाव कराना चाहते हैं. बताया जाता है कि छह के अंक को केसीआर अपने लिए भाग्यशाली मानते हैं. लिहाज़ा उन्होंने बड़े फैसले के लिए छह सितंबर की तारीख़ ही चुनी. दोपहर बाद एक बजे के क़रीब राज्य मंत्रिमंडल की बैठक में उन्होंने विधानसभा भंग करने का फैसला किया. फिर आधे-पौन घंंटे बाद वे राज्यपाल ईएसएल नरसिम्हन से मिले, जिन्हें शीर्ष अधिकारियों के जरिए इस बाबत पहले ही ख़बर पहुंचाई जा चुकी थी. लिहाज़ा राज्यपाल ने भी तुरंत सरकार के फैसले पर मुहर लगा दी. इसके बाद केसीआर खुलकर चुनावी मोड में आ गए.

राज्यपाल से मुलाकात के बाद केसीआर मीडिया से मुख़ातिब हुए. बीते कुछ महीनों की अपनी तैयारी का स्पष्ट संकेत देते हुए उन्होंने लगे हाथ राज्य की 119 में से 105 विधानसभा सीटों पर पार्टी के प्रत्याशी भी घोषित कर दिए जबकि दूसरी पार्टियां अभी ठीक तरह इस स्थिति के लिए तैयार भी नहीं हो पाई हैं. इतना ही नहीं सात सितंबर से केसीआर चुनाव अभियान भी शुरू करने वाले हैं. पहली जनसभा करीमनगर के हुस्नाबाद में हाे रही है. केसीआर का दावा है कि राज्य के चुनाव के संबंध में भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) से चर्चा हो गई है. पूरा भरोसा है कि तीन महीने बाद मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और मिज़ोरम के साथ तेलंगाना में भी चुनाव हो जाएंगे.

ऐसे में यह सवाल एक़दम लाज़िमी और मौज़ूं (प्रासंगिक) है कि केसीआर को आख़िर चुनाव कराने की ज़ल्दी क्यों है. इससे वे क्या-कुछ हासिल करना चाहते हैं?

केंद्र में बड़ी भूमिका निभाने की इच्छा

राज्य में चुनाव की जल्दबाज़ी का पहला कारण तो केसीआर की महत्वाकांक्षा में छिपा है. केसीआर यानी कल्वकुंतला चंद्रशेखर राव की महत्वाकांक्षा ही थी जिसने लगभग ठंडे पड़ चुके तेलंगाना आंदोलन को पुनर्जीवित किया. इसी महत्वाकांक्षा ने उन्हें केंद्र में मंत्री पद तक पहुंचाया ताकि वहां रहकर वे आंध्र प्रदेश से अलग तेलंगाना का गठन सुनिश्चित कर सकें. और यही महत्वाकांक्षा थी जिसने उन्हें न सिर्फ उनका यह लक्ष्य हासिल भी कराया, नए राज्य के पहले मुख्यमंत्री के पद तक भी पहुंचाया.

अब जैसी कि ख़बरें बताती हैं, केसीआर दिल्ली की राजनीति का रुख़ अपने हिसाब से मोड़ना चाहते हैं. विधानसभा भंग का फैसला सार्वजनिक करते हुए उन्होंने कहा भी, ‘मैं तेलंगाना के लोगों से अपील करता हूं कि अब दिल्ली का ग़ुलाम नहीं रहना है. तेलंगाना के बारे में फैसला यहीं इसी राज्य में होना चाहिए.’ यही नहीं, ख़बरें तो यहां तक हैं कि केसीआर की नज़र अब दिल्ली के लोककल्याण मार्ग (रेसकोर्स रोड) स्थित सात नंबर के बंगले पर है. यानी वह जगह जहां भारत के प्रधानमंत्री रहते हैं. अपनी इस महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए वे क्षेत्रीय पार्टियों का मोर्चा बनाने की पहल भी कर चुके हैं. साथ ही वे यह भी साफ तौर पर कह चुके हैं कि इस मोर्चे के अगुवा वे ख़ुद ही होंगे.

ज़ाहिर तौर पर केसीआर की इच्छा तभी पूरी होगी जब राज्य में उनकी सरकार बनी रहे और लोक सभा में भी वे कम से कम इतने सांसदों की अगुवाई करें कि देश की अगली सरकार के गठन में अहम भूमिका निभा सकें. ऐसे में उन्हें अगर इस वक़्त राज्य की चुनावी ज़िम्मेदारी से जल्द फ़ारिग़ होने की ज़रूरत महसूस होती है तो कोई अचरज की बात नहीं है. क्योंकि स्वाभाविक तौर पर बड़े मंसूबे पूरे करने के लिए पर्याप्त समय के साथ उतने ही लक्ष्यकेंद्रित प्रयासों की भी ज़रूरत होती है. सो राज्य की चुनावी क़वायद से निपटकर लोक सभा चुनाव तक वे आराम से ऐसा कर सकते हैं. बल्कि ख़बर तो यह भी है कि वे चुनाव के बाद राज्य की ज़िम्मेदारी पुत्र केटी रामाराव को सौंप सकते हैं.

जानकार मानते हैं कि दो और कारणों से केसीआर ने जल्द चुनाव का रास्ता चुना है. इनमें पहला तो यह कि अगले लोक सभा चुनाव में स्थिति 2014 से भिन्न होगी. पिछली बार तेलंगाना का गठन हुआ ही था और नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने नहीं थे. इसलिए लोक सभा के साथ हुए राज्य विधानसभा चुनाव के जरिए केसीआर को सत्ता तक पहुंचने में दिक्क़त नहीं आई. लेकिन इस बार अगर लोक सभा के साथ राज्य के चुनाव होते तो लोगों का ध्यान प्रदेश के साथ देश के मुद्दों और केसीआर-मोदी पर बराबर से जाता. इससे केसीआर की संभावनाएं प्रभावित हो सकती थीं. वहीं दूसरी बात कुछ अंदरूनी सर्वेक्षणों से जुड़ती है जिन्हें नवंबर-दिसंबर में चुनाव कराने पर टीआरएस के सत्ता में लौटने का अनुमान है.

केसीआर चुनाव के बाद किस तरफ मुड़ सकते हैं?

अपने भविष्य की दिशा के बाबत केसीआर दो तरह के संकेत दे रहे हैं. इनमें एक स्पष्ट है लेकिन दूसरा अस्पष्ट. उनकी तरफ से कांग्रेस विरोध का संकेत स्पष्ट है. विधानसभा भंग करने के बाद मीडिया से बात करते हुए उन्होंने जिस तरह कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के लिए ‘मसखरा’ जैसे संबोधन का इस्तेमाल किया उससे यह साफ हो गया कि वे निकट भविष्य में कांग्रेस के साथ नहीं होंगे. तो फिर दूसरा रास्ता क्या? इस बारे में भी उनकी प्राथमिकता काफी हद तक साफ दिखती है. वे ग़ैर-कांग्रेस, गैर-भाजपा समर्थक दलों का मोर्चा बनाकर उसकी अगुवाई करना चाहते हैं. इसके लिए वे इस साल के शुरूआत से ही अपनी तरफ से लगातार कोशिश भी कर रहे हैं.

हालांकि इस संभावित माेर्चे की अगुवाई के लिए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी पूरी मशक्क़त कर रही हैं. इससे केसीआर और उनकी पार्टी- टीआरएस ममता बनर्जी से नाख़ुश भी बताई जाती है. लेकिन फिर भी लोक सभा चुनाव से पहले केसीआर इस दिशा में एक बार और कोशिश करते दिखें तो कोई बड़ी बात नहीं होगी. अलबत्ता बड़ी बात चुनाव के बाद होगी. वह भी ख़ास तौर पर तब जबकि केंद्र में किसी पार्टी या गठबंधन को सरकार बनाने लायक बहुमत न मिले. यह मौका अन्य तमाम दलों की तरह केसीआर के लिए परीक्षा की घड़ी होगी जहां उन्हें तय करना होगा कि वे भाजपा और उनके समर्थकों के साथ रहें या कांग्रेस और उनके साथी दलों की तरफ.

हालांकि इस मामले में अगर केसीआर की ओर से मिल रहे संकेतों की ही मानें तो वे अागे भी कांग्रेस से दूरी बनाकर चलने की ही कोशिश कर सकते हैं. ऐसा इसलिए मान सकते हैं कि विधानसभा भंग करने से पहले जून से अगस्त तक केसीआर चार-पांच बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिल चुके हैं, जबकि दूसरे मुख्यमंत्रियों को प्रधानमंत्री का समय इतनी आसानी से नहीं मिलता. इतना ही नहीं, कहा तो यहां तक जा रहा है कि उन्हाेंने विधानसभा भंग करने के फैसले पर भी प्रधानमंत्री से पहले ही चर्चा कर ली थी. फिर इसी की दूसरी मिसाल भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से जुड़ी सामने आई. इससे भी लगा कि केसीआर और भाजपा के बीच अंदरख़ाने कुछ पक रहा है.

ख़बरों के मुताबिक अमित शाह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की एक बैठक में शामिल होने के लिए जाते वक़्त रास्ते में शमशाबाद हवाई अड्‌डे पर रुके थे. यहां भाजपा की तेलंगाना इकाई के वरिष्ठ नेता उनसे मिलने गए. इन नेताओं ने उनसे शिकायती लहज़े में कहा, ‘हम राज्य में टीआरएस से लड़ रहे हैं. लेकिन प्रधानमंत्री ख़ुद टीआरएस प्रमुख केसीआर के प्रति नरमदिली दिखा रहे हैं. इससे राज्य में पार्टी की संभावनाओं पर असर पड़ रहा है.’ बताया जाता है कि इस शिकायत के बाद शाह ने पार्टी नेताओं से साफ कहा, ‘केसीआर ख़ुद केंद्र सरकार से अच्छे संबंध बनाकर रखना चाहते हैं. और हम उन्हें विरोधी की तरह नहीं देख सकते जिनके केंद्र सरकार से मधुर संबंध हैं.’

इसके अलावा यह भी ख़बर आई कि केसीआर अगर विधानसभा भंग करेंगे तो भाजपा उनका विरोध नहीं करेगी. फिर दूसरी यह कि विधानसभा भंग करने से पहले केसीआर ने इसी मंगलवार को तेलंगाना के भाजपा विधायकों से मुलाकात भी की थी. इससे ठीक एक दिन पहले वे दिल्ली में प्रधानमंत्री मोदी से मिलकर आए थे. अब तक तमाम मौकों पर संसद में टीआरएस लगातार भाजपा का साथ भी देती रही है.

इस सबका निचोड़ इस वक़्त तो यही है कि अगर गै़र-भाजपा, गैर-कांग्रेस समर्थक दलों के किसी संभावित गठबंधन ने लोक सभा चुनाव के बाद कांग्रेस की तरफ रुख़ किया तो केसीआर इसकी ठीक उल्टी दिशा पकड़ सकते हैं. मोर्चा न बन पाने की सूरत में भी ज़्यादा संभावना यही लगती है कि नरेंद्र मोदी को अगली सरकार बनाने के लिए अगर थोड़ी मदद की ज़रूरत पड़ी तो केसीआर हाथ लगा सकते हैं.

लेकिन सवाल यहां भी एक कि क्या महत्वाकांक्षी केसीआर इतने सहज भाव से सहयोग का यह लेन-देन करेंगे? इसका ज़वाब वक़्त ही देगा.