दूरदर्शन के दौर में एक बार मशहूर क्विज मास्टर सिद्धार्थ राय ने अपने प्रोग्राम में प्रश्न पूछा कि दिमाग तेज करने में कौन सा खनिज उपयोगी है. संकेत, यानी हिंट देते हुए, उन्होंने कहा कि आख़िर बंगाली इतने होशियार क्यों होते हैं? जवाब था, ‘फ़ॉस्फ़ोरस’. राय का कहना था, ‘बंगाली मछली खाते हैं, जिसमें फ़ॉस्फ़ोरस तत्व की प्रधानता होती है!’

बात तो कुछ हद तक सही है. बंगाल का तकरीबन हर क्षेत्र में दबदबा रहा है और संगीत में तो कुछ ज़्यादा ही. आज हम बात ऐसे संगीत रचनाकार की बात कर रहे हैं जिसे फ़िल्म संगीत के इकलौते बुद्धिजीवी संगीतकार की उपाधि दी जाती है. हम सलिल चौधरी की बात कर रहे हैं.

सलिल चौधरी के कई परिचय हो सकते हैं. महान संगीतकार, लेखक, गीतकार और फ़िल्म समीक्षक. एक परिचय और है जिसकी परछाई में उनके ये सारे हुनर पले. वह है - साम्यवादी सलिल चौधरी. उन्होंने साम्यवाद को न सिर्फ़ अपने संगीत में ढाला, उसे जिया भी. उनकी कहानियों में, उनके लेखों में और जीवन शैली में साम्यवाद झलकता था.

अपने लेख, ‘द क्राइसिस ऑफ़ बंगाली म्यूज़िक’ में सलिल चौधरी ने क्षेत्रीय अभिव्यक्ति के दायरों से बाहर निकल अंतरराष्ट्रीय लोक प्रभावों को अपनाने की जरूरत पर जोर दिया था. सलिल के संगीत में बंगाली प्रभाव ही नहीं, बल्कि पंजाबी, पूर्वी यूरोप, पाश्चात्य सिम्फनीज़ और हार्मनी का व्यापक प्रयोग दिखता है. बिमल रॉय की सर्वकालिक महान फ़िल्म ‘दो बीघा ज़मीन’ का ‘धरती कहे पुकार के गीत गा ले प्यार के’ गाना इस इस बात की तस्दीक करता है कि समाजवाद के प्रभाव के चलते उनके संगीत में सर्वहारा की पीड़ाएं और आशाएं, दोनों ही नज़र आती हैं. यह बात कम ही लोगों को मालूम है कि ‘दो बीघा ज़मीन’ की कहानी सलिल चौधरी की कहानी ‘रिक्शावाला’ पर आधारित थी.

अपनी किताब ‘धुनों की यात्रा’ में पंकज राग लिखते हैं, ‘सलिल ने संगीत को अभिजात्य वर्ग के एकाधिकार से निकालकर उसमें आम आदमी की कराहों, पसीने और आशाओं का रंग भरा. उन्होंने न सिर्फ़ विभिन्न देशों और प्रदेशों के लोकसंगीत का समाकलन किया, बल्कि इन लोक-शैलियों को अपने नए जन संघर्ष के तेवर और ऑर्केस्ट्रेशन तथा कम्पोज़िंग की नयी चेष्टाओं से एक सर्वथा नया उद्देश्य और अभिव्यक्ति दी.’

सलिल चौधरी के संगीत का दायरा बेहद विशाल है. यह फ़िल्मी भी है और ग़ैर फ़िल्मी भी जिसने हिंदी से लेकर बांग्ला और मलयालम भाषाओं तक एक बड़ा सफर तय किया. संगीत में माधुर्य रचने में उनका सानी नहीं है. पर हम जिस बात की चर्चा करेंगे वह यह कि उनका संगीत कुछ हद तक वैज्ञानिक है और इसीलिए जटिल भी है. महान सितारवादक पंडित रविशंकर को शिकायत थी कि वे बहुत जटिल संगीत रचते हैं.

किसी प्रोडक्ट या विचार की जटिलता, विलक्षण प्रभावों और उपयोगों को जन्म देती है. कहते हैं कि नोबेल पुरस्कार विजेता और महान वैज्ञानिक श्रोडिंगर का तरंग सिद्धांत इतना जटिल था कि दुनिया में इसे तब सिर्फ़ आठ लोग ही समझ पाए थे. पर इस सिद्धान्त ने क्वांटम भौतिकी का आधार ही बदल दिया था. संगीत में सलिल चौधरी की जटिलता भी कुछ ऐसा ही अभूतपूर्व कार्य कर गयी.

सलिल चौधरी के कई गानों में इतने स्केल होते थे कि गायकों के लिए उन्हें गाना बिलकुल भी आसान नहीं होता था. मिसाल के तौर पर फ़िल्म ‘माया’ (1961) का गाना, ‘तस्वीर तेरी दिल में’ की बात करते हैं. बताते हैं कि इस डुएट गाने के लिए महान मोहम्मद रफ़ी ने 11 बार रीटेक दिए थे. वहीँ, लता मंगेशकर इसे आसानी से गा गईं.

इसी तरह 1972 में आई फ़िल्म ‘अन्नदाता’ का एक गीत है - ‘गुजर जाए दिन दिन दिन’. इसके मुखड़े और अंतरों में स्केल का इतना परिवर्तन है कि सलिल को भी एक बार लगा कि क्या कोई इसे गा पायेगा? महान और सनकी किशोर कुमार को इस फ़िल्म के लिए अनुबंधित किया गया था. उनसे तो सलिल चौधरी को दूर-दूर तक उम्मीद नहीं थी. किशोर दा ने इसे गाने से पहले कई स्वांग किये. जैसे उन्होंने कहा कि वे सपने में भी इसे नहीं गा सकते. सलिल असमंजस में थे. पर जब किशोर ने रिकॉर्डिंग स्टूडियो में सुर लगाये तो वे चकित रह गए. गाना एक बार में ही पूरा हो गया. फिर सलिल चौधरी किशोर के मुरीद हो गए. बहुत संभव है कि इसके बाद ही लता ने किशोर को सर्वश्रेष्ठ गायक माना हो. किशोर जीनियस थे. आप यह गाना सुनिए और किशोर की गायकी की रेंज और संगीत की जटिलता का अंदाज़ा लगाइए.

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बावजूद इस सबके सलिल चौधरी के पसंदीदा गायक मुकेश ही थे. फ़िल्म ‘मधुमती’, जिसकी संगीत रचना उनकी सबसे महान रचनाओं में से एक है, में दिलीप कुमार चाहते थे कि ‘सुहाना सफ़र’ गीत तलत महमूद गाएं. तलत उन दिनों विदेश में कार्यक्रमों में व्यस्त थे. तलत ने सलिल को सुझाया कि वे इसे मुकेश से गवाएं. दिलीप कुमार अचकचा रहे थे, पर मुकेश ने गाने को सर्वकालिक बना दिया. सलिल का मानना था कि मुकेश अपनी गायकी में रेंज की कमी को लय और भावनाओं से पूरा कर लेते थे. मिसाल के तौर पर फ़िल्म ‘आनंद’(1970) का ‘कहीं दूर जब दिन ढल जाए’ तो हिंदी फ़िल्मों में दार्शनिक गानों की फ़ेहरिस्त में काफ़ी ऊपर आता है.

सलिल चौधरी महान निर्देशक बिमल रॉय कैंप के स्थायी संगीत निर्देशक थे. ऋषिकेश मुखर्जी, ऋत्विक घटक, कमल बोस, नुबेंदु घोष, रघुनाथ झालानी और गुलज़ार जैसे नाम इसी कैंप से जुड़े रहे. कमाल की बात है कि बिमल दा के बाद भी ये सभी किसी न किसी तौर पर एक दूसरे के साथ बने रहे. शैलेंद्र के बाद सलिल चौधरी ने गुलज़ार और योगेश से गीत लिखवाए.

बहुत कम लोगों को मालूम है कि इस दिग्गज संगीतकार ने दिलीप कुमार से भी एक गीत गवाया था और दिलीप साहब ने इस गीत की रिकॉर्डिंग के लिए तीन ग्लास ब्रांडी पी. यतींद्र मिश्र की ‘लता सुर गाथा’ में ख़ुद लता मंगेशकर ने इस क़िस्से को बयान किया है. वे कहती हैं, ‘जब दिलीप साहब गाना शुरू करते तो आंखें बंद कर लेते और इस बात से बेख़बर हो जाते कि उन्हें कब गाना बंद करना है और कब मुझे शुरू. मुझे याद है कि वे शुरू के आलाप इतनी ज़ोर-ज़ोर से आँखें बंद करके गा रहे थे, मैं पास में बैठी हुई यह सब देख रही थी. उनसे तालमेल बिठाकर ही मुझे गाना था. सलिल दा ने मेरी तरफ़ इशारा कर दिया कि अब मुझे ही उनके साथ संतुलन बिठाते हुए गाने को संभालना है. इस तरह हम लोग एक अजीब सी विचित्र स्थिति में पड़े हुए इस डुएट को रिकॉर्ड कर सके.’

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हिंदी फ़िल्मों का संगीत हर दशक में बदला है और इस बदलाव ने कई स्थापित संगीतकारों जैसे नौशाद, सी रामचंद्र, यहां तक कि शंकर-जयकिशन को भी हाशिये पर खड़ा कर दिया था. वहीं, सलिल सहजता से नए दौर में दाखिल हो गए. सत्तर के दशक में समाजवाद हिंदी फ़िल्मों से गायब होने लगा, कहानियां शहरी प्रोटैगनिस्ट की ज़िन्दगी के इर्द-गिर्द सिमट रही थीं. सलिल चौधरी ने भी अपना स्टाइल बदल लिया. उनके संगीत में विचारधारा की जगह जीवन की रोज़मर्रा की आपाधापी झलकने लगी. लता जी का गया हुआ ‘न जाने क्यूं होता है ये ज़िन्दगी के साथ’ गाना सलिल की विशिष्ट स्केल परिवर्तन शैली में गया हुआ एक महान गीत है. फ़िल्म ‘रजनीगंधा’ का यह गीत आज भी कानों में मिसरी घोल देता है. इसी फिल्म का ‘कई बार यूं भी देखा है’ मुकेश को पहला राष्ट्रीय पुरस्कार दिलाने वाला गीत था.

सलिल के संगीत में क्वायर (नेपथ्य में गाने वाले) का पुट उनका सिग्नेचर स्टाइल था. फ़िल्म ‘मधुमती’ का ‘दैय्या रे दैय्या चढ़ गयो पापी बिछुवा’ या फिर ‘अन्नदाता’ का ‘ओ मेरी प्राण सजनी चम्पावती आजा’ में नेपथ्य में गाने वाले लोग एक अलग किस्म का प्रभाव डालते हैं. ‘अन्नदाता’ के इस गाने के प्रभाव से तो लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल भी नहीं बच पाए. उन्होंने फ़िल्म ‘बॉबी’ के गीत ‘न मांगू सोना चांदी, न मांगू हीरा मोती’ में क्वायर का बख़ूबी इस्तेमाल किया है. पाश्चात्य संगीत का प्रभाव भी सलिल की संगीत शैली पर भी ज़ाहिर था. फ़िल्म ‘छाया’(1961) का गीत ‘इतना सा मुझसे तू प्यार बढ़ा’ महान ऑस्ट्रियन संगीतकार मोत्सार्ट की चालीसवीं सिम्फ़नी पर आधारित था और उन्होंने कभी इस बात को छुपाया भी नहीं.

सलिल चौधरी बैकग्राउंड म्यूजिक देने में माहिर थे. बिमल रॉय की’ देवदास’ के बैकग्राउंड संगीत में सचिन देव बर्मन की जगह उन्हें उन्होंने ये काम किया. ठीक उसी प्रकार, मदन मोहन की अचानक मृत्यु की वजह से गुलज़ार ने ‘मौसम’ फ़िल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक से सलिल तैयार करवाया. उनके संगीत से जुड़ा एक क़िस्सा है जो राजू भारतन ने लता मंगेशकर की जीवनी में लिखा है. सन 1991 में फ़िल्म ‘विवेकानंद’ के लिए जब वे लता जी को अनुबंधित करने के लिए गए तो उन्होंने अनुपलब्धता का हवाला देकर सलिल को मना कर दिया. राजू भारतन लिखते हैं, ‘संभव है लता को ये डर रहा हो कि अब इस उम्र में वे उनके संगीत के साथ न्याय नहीं कर पाएंगी’. हालांकि, यह बात भी है कि लता को ही उन्होंने बांग्ला फ़िल्मों की सबसे पसंदीदा गायिका बनाया था.

मलयालम फ़िल्मों में भी उनका संगीत चमकदार दीखता है. मिसाल के तौर पर हम 1965 में आई फ़िल्म ‘छेम्मिन’ को ले सकते हैं. इस सुपरहिट फिल्म का एक यादगार गीत ‘मानस मैने वरू’ सलिल चौधरी ने अपनी तरह के खांटी बंगाली मन्ना डे से गवाया था. मजे की बात देखिए, बांग्ला में उन्होंने यह गीत मलयाली येसुदास से गवाया! यह सलिल दा ही कर सकते थे. आप भी सुनिए ये दोनों गीत और एक बार फिर महसूस कीजिए कि क्यों संगीत की कोई भाषा नहीं होती.

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कुल मिलाकर, सलिल चौधरी उन फ़िल्मी हस्तियों की जमात में आते हैं जिनकी शख्सियत फ़िल्म की हर विधा को प्रभावित करती थी. फिर वह चाहे संगीत हो या स्क्रिप्ट या बैकग्राउंड म्यूजिक या फिर गीत. ऐसे विरले ही होते हैं और यह विरलापन इस दौर में और भी विरला होता जा रहा है.

चलते-चलते

कुछ साल पहले जगजीत सिंह ने गुलज़ार की ग़ज़ल, ‘शाम से आंख में नमी सी है’ को अपनी आवाज़ दी थी. क्या आप जानते हैं कि सबसे पहले इस ग़ज़ल को सलिल चौधरी ने अपनी धुन से संवारा था और मुकेश ने इसे अपनी आवाज़ से नवाज़ा था? नहीं. तो सुनिए और यकीन मानिए एकबारगी आप जगजीत को भूल जायेंगे.

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