रुपया अब एक डॉलर के मुकाबले 71.97 रुपये के स्तर पर पहुंच गया है. इस तरह इसने गिरावट का एक नया स्तर छू लिया है. उधर, भारतीय मुद्रा में इस नई गिरावट की खबरों के बीच केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने सफाई दी है. उन्होंने कहा है कि इस गिरावट से घबराने की जरूरत नहीं है. अरुण जेटली ने इसके लिए वैश्विक कारणों को जिम्मेदार बताया और कहा कि भारतीय रिजर्व बैंक इस बाबत हर जरूरी कदम उठा रहा है.

इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक बुधवार को कैबिनेट की बैठक के बाद वित्त मंत्री ने कहा, ‘अगर आप घरेलू और वैश्विक आर्थिक स्थिति देखें तो इसके लिए (रुपये में गिरावट) कोई घरेलू वजह दिखाई नहीं देती. ऐसा वैश्विक कारणों के चलते हो रहा है. हमें यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि बीते महीनों में डॉलर हर मुद्रा के मुकाबले मजबूत हुआ है. इसलिए ज्यादातर मुद्राएं डॉलर की तुलना में कमजोर हुई हैं.’

रुपये में हुई लगातार गिरावट ने भारत की चिंताएं बढ़ा दी हैं. मंगलवार को यह प्रति डॉलर की तुलना में 71.76 रुपये के स्तर पर था जो बुधवार को 0.27 प्रतिशत की गिरावट के साथ 71.97 रुपये हो गया. लगातार छठवें दिन हुई इस गिरावट पर जेटली ने कहा, ‘मुझे विश्वास है कि यह उथल-पुथल डॉलर की वजह से हो रही है. अंत में भारतीय अर्थव्यवस्था की स्वाभाविक मजबूती ही अहम भूमिका अदा करेगी, और यह उतार-चढ़ाव कम हो जाएगा. मुझे यकीन है कि इस संबंध में मुद्रा प्रबंधन से जुड़े जरूरी कदम आरबीआई द्वारा उठाए गए हैं. मुझे नहीं लगता कि दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था को इससे घबराने और बिना सोचे-समझे प्रतिक्रिया देने की जरूरत है.’

अरुण जेटली ने रुपये की अन्य देशों की मुद्राओं से तुलना करते हुए कहा कि बीते पांच सालों में नए बाजारों में रुपया मजबूत बना रहा है. उन्होंने कहा, ‘जहां तक अन्य मुद्राओं की बात है तो रुपया या तो लगातार मजबूत हुआ है या फिर एक (निश्चित मूल्य की) सीमा में बना रहा है. किसी भी मुद्रा की तुलना में यह कमजोर नहीं हुआ. बल्कि पिछले चार-पांच सालों की तुलना करें तो यह अन्य मुद्राओं के मुकाबले बेहतर है.’ वित्त मंत्री ने उदाहरण देते हुए कहा कि सितंबर 2013 में पाउंड की तुलना में रुपये की कीमत 101.42 रुपये थी जो आज 92.05 रुपये है. वहीं, यूरो के मुकाबले भारतीय मुद्रा की कीमत 84.67 रुपये थी. लेकिन आज 83.13 रुपये है.

अरुण जेटली के मुताबिक वैश्विक तेल बाजार में कमी के चलते दामों में बढ़ोतरी हुई है जिसका असर भारत पर भी पड़ा है. उन्होंने कहा, ‘अगर सभी मुद्राओं को देखें तो केवल एक मुद्रा (डॉलर) मजबूत होती नजर आती है. इसके कारण स्पष्ट हैं. ऐसा अमेरिका की कुछ विशेष नीतियों की वजह से हुआ है. हम तेल आयातक हैं. इसलिए अगर तेल की कमी होती है तो दाम अस्थायी रूप से बढ़ जाते हैं जिसका असर हम पर पड़ता है. यह एक बाहरी कारण है. हम व्यापार युद्ध में नहीं हैं. लेकिन अगर पड़ोसी देश अपनी मुद्रा का मूल्य कम करते हैं तो नतीजे के तौर पर उसका असर हम पर भी पड़ता है. तुर्की पर भी इसका असर पड़ा है.’