हाल की बात है. झारखंड के अखबारों में एक छोटी सी खबर छपी. खबर यह थी कि रांची में एक सिनेमाई सांस्कृतिक आयोजन होने वाला है जिसमें झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा मुख्य अतिथि होंगे. बीते कुछ समय में यह तीसरा सांस्कृतिक आयोजन है जिसमें अर्जुन मुंडा बतौर मुख्य अतिथि की भूमिका में हैं.

अब सोचें तो यह एकदम मामूली बात है. सबसे ज्यादा बार झारखंड के मुख्यमंत्री रहे और भाजपा के कद्दावर नेता को किसी ऐसे आयोजन में बुलाया जाना एकदम सामान्य घटना है. लेकिन यह छोटी सी खबर भी झारखंड भाजपा कार्यालय में कुछ नेताओं के बीच बतकही का विषय बन गई. इस पर ऐसे बात हुई मानो कुछ असामान्य हुआ हो.

इसकी वजह भी है. छिटपुट ही सही, राजनीतिक के बजाय सांस्कृतिक आयोजनों में ही सही, अर्जुन मुंडा को मुख्य अतिथि के तौर पर बुलाये जाने का सिलसिला शुरू हुआ है. एकदम से गुमनामी के अंधेरे में धकेल दिये गए या समा गये मुंडा फिर से सार्वजनिक मंचों पर दिखने लगे हैं.

करीब दो माह पहले ऐसे ही एक आयोजन में अर्जुन मुंडा गये थे तो उन्होंने मंच पर ही कह दिया था, ‘मैं तो फिलर हूं. जहां कोई नहीं आता या किसी कारण से मना कर देता है, वहां मुझे बुलाया जाता है.’ अर्जुन मुंडा ने जब यह बात कही थी तो उस समय झारखंड में पत्थलगढ़ी आंदोलन के नाम पर स्थिति तनावपूर्ण थी. मामला सरकार की गले की हड्डी बनता जा रहा था. न उगलते बन रहा था, न निगलते. राज्य के मुख्यमंत्री रघुवर दास के बार-बार बयान आ रहे थे. वे कह रहे थे कि दूसरे नेताओं को भी चाहिए कि इसमें ‘इनवाॅल्व’ हों और राज्य में स्थिति शां​तिपूर्ण करने में सहयेाग करें, गलतफहमियों को दूर करें.

तब दूसरे नेताओं से रघुवर दास का आशय किससे था यह तो साफ नहीं हो सका था, लेकिन लगभग उसी समय एक इंटरव्यू में अर्जुन मुंडा भी अपनी बात रख रहे थे. कह रहे थे कि सरकार ऐसे मामले को अपने स्तर पर गंभीरता से डील करे. उन्होंने इस दौरान कई पत्रकारों से भी आपसी बातचीत में यह कहा. इस कहे का असर तेजी से होता हुआ दिखा. भाजपा कार्यालय में अर्जुन मुंडा पर कानाफूसी वाले अंदाज में बात होने लगी. वे आज क्या कर रहे हैं, कल क्या करने वाले हैं, इस पर चर्चा होने लगी.

और एक बड़ा असर यह हुआ कि पिछले दिनों जब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह रांची आये तो एक आयोजन में उन्होंने अर्जुन मुंडा को न सिर्फ मंच पर अपने बगल में ससम्मान बिठाया बल्कि उनकी तारीफ में कसीदे भी गढ़े. अमित शाह ने कहा, ‘आज राज्य में जो भी विकास कार्य वर्तमान मुख्यमंत्री रघुवर दास कर रहे हैं, उन सबका ब्लूप्रिंट मुंडाजी ने ही तैयार किया था, दास तो उसे आगे बढ़ा रहे हैं.’

कुछ महीने पहले वही अर्जुन मुंडा थे और वही अमित शाह थे और वही रांची थी. भाजपा का एक आयोजन था और उसमें अर्जुन मुंडा को मंच पर जाने तक नहीं दिया गया था. नाराज मुंडा उस आयोजन से अपने समर्थकों संग वापस लौट आए थे. यही वजह है कि उन्हीं अर्जुन मुंडा को इस कदर मिलती तरजीह चर्चा का सबब है.

2014 में हुए विधानसभा चुनावों में अर्जुन मुंडा खरसांवा विधानसभा सीट से हार गए थे. यह पहला चुनाव था जिसमें उन्हें हार मिली थी. इसके बाद वे हाशिये पर चले गए. झारखंड भाजपा के ही एक नेता बताते हैं, ‘जैसा अर्जुन मुंडा के साथ हुआ वैसा किसी धाकड़ नेता के साथ नहीं होता. महज एक चुनाव हार जाने के कारण उन्हें इस कदर हाशिये पर धकेल दिया गया.’ इसके बाद अर्जुन मुंडा अपने दायरे में सिमट कर रह गये. यही वजह है कि जब बीते महीने अमित शाह ने उन्हें मंच पर ससम्मान बिठाया और उनकी तारीफ में बोले तो यह हैरान करने वाली ही घटना थी.

तो अचानक से ही अर्जुन मुंडा को इतना महत्व क्यों दिया जाने लगा? भाजपा के यही नेता बताते हैं कि पार्टी को अब उनकी जरूरत हो गयी है. वे कहते हैं, ‘भाजपा ने गैर आदिवासी सीएम का प्रयोग झाररखंड में एक नयी शुरुआत तो की थी, लेकिन उसके बाद उसके सामने आदिवासियों के मोर्चे पर एक के बाद एक चुनौतियां आती गईं और उनसे डील करने वाला कोई कददावर नेता उसके पास नहीं रहा. कहने को तो कई नेता हैं. लेकिन कोई इतना कारगर साबित नहीं हुआ जो पिछले चार सालों में आदिवासियों के फ्रंट पर आये सवालों को डील कर सके’

दरअसल बीते कुछ समय के दौरान झारखंड में स्थानीयता की परिभाषा तय करने सहित कई ऐसे मुद्दे उछले जिन पर रघुवर दास सरकार को सुरक्षा की मुद्रा में आना पड़ा. उधर, इन मुद्दों को लेकर विपक्षी पार्टियां यह माहौल बनाती रहीं कि मौजूदा भाजपा सरकार आदिवासी विरोधी है. विपक्ष के निशानों ने रघुवर दास को इतना परेशान कर दिया कि एक बार तो उन्होंने झल्लाकर कह दिया कि आदिवासी-आदिवासी सुनते-सुनते उनके कान पक गए हैं.

भाजपा से जुड़े सूत्र बताते हैं कि भाजपा पर लगातार आदिवासी विरोधी होने का लेबल लगने से सबसे ज्यादा परेशानी संघ परिवार को हो रही है. यह स्वाभाविक भी है क्योंकि संघ झारखंड में वनवासी कल्याण केंद्र, एकल विद्यालय योजना, सेवा भारती, विकास भारती आदि संस्थाओं के माध्यम से लंबे समय से काम करता रहा है. सूत्र बता रहे हैं कि विपक्षी दल रघुवर दास की सरकार को केंद्र में रखकर पाॅपुलर राजनीतिक बातों के जरिये भाजपा के आदिवासी विरोधी होने की बात इतने निचले स्तर तक फैला चुके हैं कि उसे मैनेज करने के लिए अर्जुन मुंडा जैसे नेता को सामने लाना जरूरी है.

कहा यह भी जा रहा है कि अगर रघुवर दास ने महज एक चुनाव हारने के बाद अर्जुन मुंडा को एकदम से हाशिये पर डालकर उनका औपचारिक मान-सम्मान भी खत्म कर किया, तो इसी के समानांतर अर्जुन मुंडा भी गुमनामी में अपने सबसे बड़े विरोधी रघुवर के खिलाफ गोटियां बिछाते रहे और वे इसे समझ नहीं सके. यह कहा जा रहा है कि आज भाजपा के आदिवासी विधायक और नेता अर्जुन मुंडा को ही अपना नेता मानते हैं और उनसे ही संकेत लेते हैं.

यही सब कारण है कि देर से ही सही, भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व समझ रहा है कि अर्जुन मुुंडा को अगर ‘मैनेज’ नहीं किया गया तो मुश्किल हो सकती है. जानकारों के मुताबिक मुंडा राज्य के पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी की तरह नई पार्टी तो नहीं बनायेंगे, लेकिन पार्टी में ही रहते हुए वे उसे ऐसा नुकसान पहुंचा सकते हैं जिसकी भरपाई करना आसान नहीं होगा. झारखंड एक तरीके से पूरे देश के आदिवासियों की राजनीति का विमर्श तय करने वाला प्रमुख हिंदी भाषी इलाका रहा है. जानकारों के मुताबिक मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ से लेकर राजस्थान तक संदेश यहीं से जाना है इसलिए इन राज्यों में चुनाव से पहले पहले भाजपा सब ठीक कर लेना चाहती है. राज्य की 14 में से 12 लोकसभा सीटें पार्टी के पास हैं. इसलिए अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों के लिहाज से भी अर्जुन मुंडा को साधना भाजपा के लिए जरूरी हो गया है.