दिल्ली-देहरादून हाइवे पर मुरादनगर से कुछ आगे निकलते ही एक जगह हिंदू युवा वाहिनी का बोर्ड लगा है. इसके पास कुछ लोगों का जमावड़ा दिखता है. बातों और गले में पड़े गमछों से सहज ही अंदाजा लग जाता है कि इनमें से ज्यादातर भाजपा समर्थक हैं. ये लोग एससी-एसटी एक्ट के विरोध में सवर्ण समाज के बंद के बारे में चर्चा कर रहे हैं. इस दौरान इस बंद को लेकर फॉरवर्ड हुए वाट्सएप मैसेज देखे दिखाए जा रहे हैं. साथ ही मध्य प्रदेश की उन घटनाओं का जिक्र भी हो रहा है जिनमें वहां की एक सांसद और मुख्यमंत्री शिवराज चौहान तक का विरोध किया गया था.

भीड़ में शामिल कुछ लोगों के तर्क पर जाएं तो सरकार दलित कार्ड खेलने में इतनी मशगूल है कि उसे पार्टी के कोर वोट बैंक की फ्रिक ही नहीं. कुछ केंद्र सरकार की राजनीतिक मजबूरियां गिना रहे हैं. थोड़ी देर के लिए ही यह बातचीत सुनने पर अंदाजा लगाया जा सकता है कि भाजपा के जनप्रतिनिधि इस मामले पर किस तरह की पसोपेश में होंगे.

एससी-एसटी एक्ट पर मोदी सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने के विरोध में छह सितंबर को हुए बंद से जुड़ी ज्यादातर खबरें मध्य प्रदेश, राजस्थान और बिहार से आईं. लेकिन इससे चिंतित उत्तर प्रदेश भाजपा के भी सांसद-विधायक दिखे. उत्तर प्रदेश के एक सांसद से जब हम सवर्णों की नाराजगी की बात करते हैं तो पहले वे पार्टी की आधिकारिक लाइन लेते हैं. कहते हैं, ‘सवर्णों-दलितों की नाराजगी जैसी कोई बात नहीं है. भाजपा सबके साथ-सबके विकास में यकीन रखती है.’

लेकिन थोड़ा और कुरेदने और नाम न छापने की शर्त पर वे स्वीकार करते हैं कि इस बात को लेकर जिस तरह से लकीरें खींची जा रही हैं, वे मुश्किल पैदा कर रही हैं. एक घटना का उल्लेख करते हुए वे कहते हैं, ‘एक कस्बे का कारोबारी जिसका एससी-एसटी एक्ट से शायद ही कभी साबका पड़े वो भी मुझसे पूछ रहा था कि सरकार ने इस एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को क्यों बदल दिया.’

भाजपा में उनके जैसे कई लोग हैं. मसलन उत्तर प्रदेश भाजपा संगठन के ही एक अन्य पदाधिकारी कहते हैं, ‘एससी-एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर पार्टी से कुछ रणनीतिक चूक हुई. जब सुप्रीम कोर्ट ने बिना जांच के गिरफ्तारी न होने का फैसला दिया तो काफी दिनों तक इस पर चुप्पी साधे रखी गई. धीरे-धीरे विपक्ष और सोशल मीडिया ने इसे इतना फैला दिया कि दलितों का भारत बंद हुआ. पार्टी को लेकर दलितों में नाराजगी बढ़ी. बाद में इसे फैसले को पलटा गया तो सवर्णों ने इसे मुद्दा बना लिया.’ वे अागे कहते हैं, ‘दलितों की पार्टी से नाराजगी दूर हुई हो एेसा भी नहीं. ऊपर से ऊंची जातियां अलग विरोध प्रदर्शन कर रही हैं. एसी-एसटी एक्ट के मसले पर अगर तुरंत फैसला लिया गया होता तो शायद यह नौबत नहीं आती.’

हालांकि ये पदाधिकारी मानते हैं कि ऊंची जातियों के मतदाताओं का बड़ा हिस्सा इस सबके बावजूद भाजपा के पाले में ही आएगा क्योंकि फिलहाल उसके पास कोई ठोस विकल्प नहीं है. लेकिन भाजपा फिर भी इसे लेकर कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहती कि दलितों के साथ अगड़ी जातियां भी उससे आश्वस्त रहें. केंद्रीय मंत्री कलराज मिश्र का हालिया बयान इसका उदाहरण है.

एससी-एसटी एक्ट चुनावी समर में पहली बार मुद्दा बन रहा हो एेसा भी नहीं है. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में मुलायम सिंह यादव और अखिलेश अपने चुनाव प्रचार में इस एक्ट के दुरुपयोग को खत्म करने का आह्वान किया करते थे. तब उत्तर प्रदेश भाजपा के नेता भी इस एक्ट के दुरुपयोग के बारे में खुलकर बोला करते थे. 2007 में उत्तर प्रदेश की सत्ता में आने पर बसपा सुप्रीमो मायावती ने भी इस एक्ट के प्रावधानों को काफी हद तक शिथिल कर दिया था. तब कहा गया था कि ब्राम्हण और दलितों की सोशल इंजीनियरिंग से मिली जीत के चलते मायावती ने ऐसा फैसला लिया है.

लेकिन ऐसा शायद पहली बार हो रहा है कि एससी-एसटी एक्ट पर चर्चा भाजपा के माथे पर परेशानी ला रही है. भाजपा नेता कलराज मिश्र जहां एससी-एसटी एक्ट का दुरुपयोग न होने देने की बात कह रहे हैं, वहीं उन्हीं की पार्टी के दलित सांसद उदितराज का ट्वीट इसका विरोधाभासी है. यानी पार्टी के भीतर ही इस मसले को लेकर दो गुट बनते दिख रहे हैं.

दलितों से जुड़े मुद्दों पर शोध कर रहे नितिन कश्यप कहते हैं, ‘एक समय ऐसी राजनीतिक अवधारणा बनाई गई थी कि दलित एक्ट का यादव, कुर्मी और जाट जैसी कृषक जातियों के खिलाफ दुरुपयोग किया जा रहा है. हर कानून की तरह इस एक्ट के भी इस्तेमाल के कुछ गलत मामले होते होंगे. लेकिन फिलहाल एससी-एक्ट के विरोध को लेकर जो माहौल दिख रहा है, वह ग्रामीण अाबादी के बजाय शहरी उच्च वर्ग में ज्यादा दिख रहा है.’

नितिन का मानना है कि एससी-एसटी एक्ट का मौजूदा विरोध समस्या से कम जातीय पहचान की राजनीति से ज्यादा जुड़ा है. वे अागे कहते हैं, ‘बदले राजनीतिक हालात में इसका विरोध ओबीसी किसान जातियों से ज्यादा शहरी लोग कर रहे हैं जिनके खिलाफ इस एक्ट के दुरुपयोग की संभावना न्यूनतम है. चूंकि यह वर्ग भाजपा का मुख्य वोट बैंक है और राय निर्धारण में अपनी महती भूमिका निभाता है. इसलिए भाजपा की परेशानी भी ज्यादा है.’

समाजवादी पार्टी से जुड़े एक मुस्लिम नेता इस प्रकरण को जरा दिलचस्प तरीके से समझाते हैं. वे कहते हैं, ‘गांव देहात की राजनीति करने वाला हर नेता जानता है कि विपक्षियों को कैसे झूठे मुकदमों में फंसाया जाता है. बहुत सारे कानून हैं. कोई गलत तरीके से पशु कटान में फंस जाता है. किसी पर ग्राम समाज की जमीन कब्जाने का मुकदमा हो जाता है. सरकारें आने-जाने पर यह लगा रहता है. वैसे ही माफिक सरकार होने पर दलित एक्ट का भी गलत इस्तेमाल हो जाता है. लेकिन इस समय तो एेसे कोई हालात नहीं हैं कि दलित एक्ट के जरिये किसी का उत्पीड़न हो रहा है. इस समय तो दलित उत्पीड़न की घटनाओं की ही चर्चा है.’

वरिष्ठ पत्रकार अवनींद्र कमल कहते हैं, ‘भाजपा जिस तरह सभी जातियों को खींचकर हिंदुत्व की छतरी के नीचे लाई है, उसमें देर सवेर अंतर्विरोध तो पैदा होंगे ही क्योंकि इन्हें सुलझाने की किसी पार्टी के पास बुनियादी योजना तो है नहीं. चाहे भाजपा हो या कोई और पार्टी, ये सब हमेशा दलित, पिछड़ा,अगड़ा कार्ड खेलकर ही जन भावनाओं को साधने की कोशिश करते हैं. खांचों में बंटी राजनीति कभी आपके लिए फायदेमंद होती है तो कभी वही चुनौती बन जाती है.’

मध्य उत्तर प्रदेश से भाजपा के एक दलित विधायक सत्याग्रह से बातचीत में कहते हैं, ‘उत्तर प्रदेश की सियासत में दलित और पिछड़ों के वोट पर किसी एक पार्टी की दावेदारी तो है नहीं. हमें दलित वोटों का एक हिस्सा ही मिलता है. ऊंची जातियोंं के लिए एससी-एसटी एक्ट बिना बात का मुद्दा बन गया है और हमारे लोग हमसे दलित उत्पीड़न को लेकर सवाल पूछते हैं.’

वे सरकार द्वारा हाल ही जारी की गई इस एडवाइजरी पर भी खिन्न नजर आते हैं जिसमें मीडिया से दलित शब्द का इस्तेमाल न करने की अपील की गई है. वे कहते हैं, आज सोशल मीडिया का जमाना है. ये सब बातें गलत असर डालती हैं.पार्टी को जल्दी इस बारे में कुछ सोचना होगा.’

साफ है कि भाजपा के लिए न निगलते और न उगलते बनने वाली स्थिति है.