बीते महीने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तुर्की पर कई तरह के प्रतिबंध लगाने की घोषणा की. ट्रंप ने एक ट्वीट में इसकी जानकारी देते हुए कहा, ‘तुर्की से आने वाले स्टील और एल्युमिनियम पर मैंने 50 और 20 फीसदी शुल्क लगाने की इजाजत दे दी है. इस समय तुर्की से हमारे संबंध अच्छे नहीं चल रहे हैं.’

ट्रंप प्रशासन की ओर से इस संबंध में एक और घोषणा भी की गई. इसमें कहा गया कि अमेरिका तुर्की को उस विशेष योजना से बाहर करने पर विचार कर रहा है जिसके तहत तुर्की को अमेरिकी बाजार में बिना किसी शुल्क दिए अपना सामान बेचने की इजाजत है. बताया जाता है कि इस योजना से बाहर होने पर तुर्की को करीब सालाना दो अरब डॉलर यानी 15 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा का नुकसान उठाना पड़ेगा.

काफी समय से अर्थवयवस्था की सुस्ती झेल रहे तुर्की के लिए अमेरिका की ये घोषणाएं किसी बड़े झटके से कम नहीं थीं. इसके बाद तुर्की की अर्थव्यवस्था चरमरा गई. वहां महंगाई दर 15 फीसदी पहुंच गई. साथ ही उसकी मुद्रा लीरा में एक हफ्ते के अंदर 20 फीसदी से ज्यादा की गिरावट आ गई. तुर्की की अर्थव्यवस्था का अंदाजा का इस बात से भी लगाया जा सकता है कि पिछले एक साल के दौरान लीरा का भाव डॉलर के मुकाबले आधा रह गया है.

तुर्की पर आए इस संकट के कुछ रोज बाद कतर के शासक शेख तमीम बिन हम्माद अल थानी तुर्की की यात्रा पर पहुंचे. इस दौरान उन्होंने सभी को चौंकाते हुए तुर्की को इस संकट से उबरने के लिए 15 अरब डॉलर यानी एक लाख करोड़ रुपए से ज्यादा की मदद देने की घोषणा कर दी.

कतर द्वारा तुर्की को यह मदद देना अमेरिका को चुनौती देने जैसा माना जा रहा है. दरअसल, अमेरिका द्वारा तुर्की पर की गयी कार्रवाई का मकसद अमेरिकी पादरी एंड्रयू ब्रुनसन को छुडवाना है. तुर्की ने दो साल पहले ब्रुनसन को सरकार विरोधी गतिविधियों के आरोप में गिरफ्तार किया था. अमेरिका के कई बार कहने के बाद भी तुर्की ने उन्हें नहीं छोड़ा. अब अमेरिका द्वारा तुर्की पर लगाए गए प्रतिबंधों का मकसद उस पर दवाब बनाकर ब्रुनसन को छुड़वाना माना जा रहा है. लेकिन, कतर की इतनी बड़ी मदद से तुर्की पर अमेरिकी दवाब काफी हद तक कम हो गया है.

अमेरिकी पादरी एंड्र्यू ब्रुनसन को कोर्ट में पेश करने के लिए ले जाती तुर्की पुलिस, ब्रुनसन पर तुर्की में 2016 में हुए तख्तापलट के प्रयासों में शामिल होने का आरोप है
अमेरिकी पादरी एंड्र्यू ब्रुनसन को कोर्ट में पेश करने के लिए ले जाती तुर्की पुलिस, ब्रुनसन पर तुर्की में 2016 में हुए तख्तापलट के प्रयासों में शामिल होने का आरोप है

कतर की इस मदद ने कई लोगों को हैरान भी किया है. कतर को अमेरिका का करीबी माना जाता है, और वह सैन्य सुरक्षा को लेकर भी अमेरिका पर निर्भर है. ऐसे में सवाल उठता है कि उसने अमेरिका को नाराज करने वाला फैसला क्यों लिया. एक अजीब सी लगने वाली बात यह भी है कि छोटी-छोटी बातों पर तीखी प्रतिक्रिया देने वाले डोनाल्ड ट्रंप ने कतर की इस हरकत पर अब तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है.

मध्य पूर्व मामलों के कुछ पत्रकार एक और बात भी बताते हैं. इनके मुताबिक पिछले सालों में कतर ने कई और भी ऐसे काम किए हैं जो अमेरिका को अच्छे नहीं लगते, फिर भी अमेरिका ने कभी उस पर कोई कार्रवाई नहीं की. खाड़ी के लगभग सभी देशों का कहना है कि कतर मुस्लिम ब्रदरहुड, इस्लामिक स्टेट, हमास और अलक़ायदा जैसे आतंकी संगठनों को वित्तीय मदद दे रहा है और इसके उनके पास सबूत भी हैं. पिछले दिनों एक मीडिया समूह ने कतर और ईरान की सेना के बीच संबंधों का खुलासा भी किया था. लेकिन, अमेरिका ने इन सभी घटनाओं पर या तो बस चिंता जता दी या कतर को हल्के लहजे में चेतावनी देकर मामले को निपटा दिया.

खाड़ी देशों पर नजर रखने वाले जानकार कतर को लेकर अमेरिका के इस बर्ताव के पीछे कई कारण बताते हैं. ये लोग कहते हैं कि अमेरिका और कतर के बीच जिस तरह की परिस्थितियां बनी हुई हैं, उन्हें देखते हुए कतर की सरकार को भरोसा है कि अमेरिका उनकी गलतियों के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाएगा.

कतर और अमेरिका का सैन्य और व्यापारिक गठजोड़

मध्यपूर्व के कई पत्रकार अमेरिका द्वारा कतर पर कार्रवाई न किए जाने के पीछे इन दोनों के सैन्य और व्यापारिक गठजोड़ को जिम्मेदार बताते हैं. इस समय दुनिया के सबसे बड़े अमेरिकी सैन्य अड्डों में से एक कतर में है, जहां करीब 11 हजार अमेरिकी सैनिक हर वक्त रहते हैं. यह सैन्य बेस अमेरिका के लिए काफी ज्यादा महत्वपूर्ण माना जाता है. अफगानिस्तान, ईराक और सीरिया में कार्रवाई करने के लिए अमेरिका इसी सैन्य बेस का इस्तेमाल करता है. अमेरिका के लिए मध्य एशिया में सैन्य अड्डा कितना महत्व रखता है इसका अंदाजा हाल में सामने आए एक घटनाक्रम से भी लगता है. बीते जुलाई में अमेरिका ने तालिबान से शांति वार्ता शुरू की है, तालिबान से जुड़े कुछ सूत्रों की मानें तो पहली बैठक में अमेरिका ने अफगानिस्तान में अपना एक सैन्य अड्डा बनाने की इच्छा जाहिर की है.

कतर अमेरिका के सबसे बड़े पांच हथियार खरीददारों में शामिल है. कतर उससे हर साल करीब एक अरब डॉलर कीमत के हथियार खरीदता है. बीते साल ही इन दोनों के बीच 21 अरब डॉलर की बड़ी सैन्य डील हुई है. अमेरिकी विदेश मंत्रालय के मुताबिक कतर द्वारा अमेरिका के हथियार खरीदे जाने से ही अमेरिका में एक लाख से ज्यादा लोगों को नौकरी मिलती है. इसके अलावा कतर कई अन्य मौकों पर भी अमेरिकी सेना के लिए काफी मददगार साबित हुआ है. बीते साल उसने तालिबान से सौदेबाजी कर एक अमेरिकी मेजर को इस संगठन के चंगुल से छुड़ाया था.

बीते साल कई खाड़ी देशों द्वारा कतर से संबंध तोड़ने को ट्रंप ने सही ठहराया था, लेकिन बीते अप्रैल में उन्होंने कतर के शासक तमीम का वाइट हाउस में स्वागत करते हुए उनकी जमकर तारीफ़ की | फोटो : क़तर सरकार
बीते साल कई खाड़ी देशों द्वारा कतर से संबंध तोड़ने को ट्रंप ने सही ठहराया था, लेकिन बीते अप्रैल में उन्होंने कतर के शासक तमीम का वाइट हाउस में स्वागत करते हुए उनकी जमकर तारीफ़ की | फोटो : क़तर सरकार

अमेरिका के लिए व्यापारिक रूप से भी कतर काफी अहम है. वह अमेरिका में सबसे ज्यादा निवेश करने वाले देशों में आता है. हाल ही में उसने 2021 तक अमेरिका में करीब दो लाख करोड़ रुपए का निवेश करने का ऐलान किया है. छोटे से देश क़तर में 120 से ज्यादा अमेरिकी कंपनियां काम कर रही हैं. क़तर के तेल, गैस और पेट्रोकेमिकल्स के उत्पादन के लिए प्रमुख उपकरण अमेरिकी कंपनियां ही मुहैय्या करवाती हैं.

यानी कुल मिलाकर देखें तो क़तर हर साल अमेरिका को खरबों डॉलर देता है, ऐसे में जाहिर है कि अमेरिका के उससे दूर जाने से अमेरिका को ही ज्यादा नुकसान है.

ईरान भी एक बड़ी वजह

अमेरिका द्वारा कतर की गलतियां माफ़ करने की एक और बड़ी वजह क़तर और ईरान की दोस्ती बताई जाती है. ये दोनों देश अरब की खाड़ी में दुनिया का सबसे बड़ा गैस क्षेत्र साझा कर रहे हैं जिस वजह से इनके बीच मजबूत आर्थिक संबंध बने हुए हैं. बीते साल जब कई खाड़ी देशों ने क़तर से संबंध तोड़ लिए थे तो ईरान और तुर्की ही सबसे पहले उसकी मदद में आगे आए थे. इन दोनों की करीबियों के चलते अमेरिका को डर है कि अगर उसने कतर पर कोई कार्रवाई की तो वह पूरी तरह से ईरान, रूस और तुर्की के साथ न चला जाए.

अमेरिकी कई बार सार्वजनिक रूप ऐसी चिंता भी जता चुका है. बीते साल जब सऊदी अरब सहित कई खाड़ी देशों ने क़तर पर आतंकी समूहों को मदद देने का आरोप लगाते हुए उससे संबंध तोड़ लिए थे तो डोनाल्ड ट्रंप ने इस कार्रवाई को सही ठहराया था. लेकिन, बीते मई में ट्रंप प्रशासन की ओर से इस मामले पर एक बयान जारी किया गया. इसमें कहा गया, ‘अमेरिका को लगता है कि अगर खाड़ी देशों के बीच विवाद कुछ दिन और चला तो इससे ईरान को फायदा होगा. इसलिए, इस विवाद को खत्म करने पर काम शुरू किया जाए.’

विदेश मामलों के जानकारों की मानें तो केवल अमेरिका ही नहीं, कई खाड़ी देशों को भी कतर के ईरान के साथ जाने का डर बना रहता है. साल 1992 में जब सीमा को लेकर कतर और सऊदी अरब के बीच संबंध खराब हो गए थे तब मिस्र के तत्कालीन राष्ट्रपति होस्नी मुबारक ने इन दोनों के बीच सुलह करवाई थी. मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो उस समय इस विवाद के चलते ईरान और कतर के बीच नजदीकियां बढ़ने लगी थीं. इन्हें देखकर होस्नी मुबारक समझ गए थे कि कतर जल्द ही ईरान के पाले में जाने वाला है.