कुछ समय पहले चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लू कांग का बयान आया कि वे भारत और पाकिस्तान के बीच शांतिपूर्ण संबंध चाहते हैं. चीनी प्रवक्ता का यह भी कहना था कि वे इसके लिए रचनात्मक भूमिका निभाने के लिए तैयार हैं. कुछ लोगों के अनुसार यह एक सामान्य सा बयान था. दूसरी तरफ कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत और पाकिस्तान के बीच अच्छे संबंधों का फायदा चीन को भी होना है, इसलिए वास्तव में वह दोनों देशों के बीच बेहतर संबंध चाहता है.

चीन की महत्वाकांक्षी परियोजना बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) का एक हिस्सा चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सी-पैक) भी है. इस गलियारे के जरिए चीन पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह का इस्तेमाल कर अफ्रीका से लेकर दक्षिण पूर्व एशिया तक अपनी बादशाहत कायम करना चाहता है. लेकिन ऐसा तभी होगा जब इस पूरे क्षेत्र में शांति होगी और भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्ते बेहतर होंगे. लू कांग के इस बयान को इस संदर्भ में देखा जा सकता है.

अमेरिका और चीन के बीच व्यापार युद्ध चल रहा है. दोनों देश एक दूसरे के लिए अपने बाजार तक पहुंच मुश्किल बना रहे हैं. जानकार बताते हैं कि अमेरिका जैसे बड़े बाजार में अपनी स्थिति बिगड़ती देख चीन अब उसके विकल्प के तौर पर दूसरे बाजारों की तलाश में है. ऐसे में वह विशाल भारतीय बाजार को बहुत अहम मानकर चल रहा है. यही वजह है कि वह भारत के साथ अपने रिश्ते ठीक करना चाहता है. चीन और पाकिस्तान करीबी सहयोगी रहे हैं जबकि भारत और पाकिस्तान के संबंध हमेशा तनावपूर्ण रहे हैं. जानकारों के मुताबिक ऐसे में भारत के साथ अपने संबंध ठीक करने से पहले चीन को भारत और पाकिस्तान बीच सुलह करानी होगी. यही वजह है कि वह भारत और पाकिस्तान के बीच रचनात्मक भूमिका निभाने की बात कह रहा है.

जानकारों के मुताबिक एक अन्य कारण यह भी हो सकता है कि चीन की वैश्विक शक्ति या ग्लोबल पॉवर बनने की महत्वाकांक्षा पिछले कुछ समय में काफी प्रबल हुई है. इसीलिए वह भारत और पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता करना चाहता है. अगर उसके प्रयासों से भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्ते ठीक हो जाते हैं, तो यह चीन के पक्ष में पूरी दुनिया में एक बड़ा संदेश होगा. यानी चीन इसे आर्थिक ही नहीं, भू-सामरिक नजरिये से भी देख रहा है.

यानी चीन को पाकिस्तान और भारत के बीच रिश्तों के बेहतर होने का फायदा मिलेगा. लेकिन पाकिस्तान को भी इसका फायदा ही होना है. उसकी अर्थव्यवस्था अभी बहुत बुरे दौर से गुजर रही है. खबरों के मुताबिक पाकिस्तान के नए प्रधानमंत्री इमरान खान पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) से लोन की मांग करने वाले हैं. इस पर पाकिस्तान के अर्थशास्त्रियों का सुझाव है कि इमरान खान को आईएमएफ से लोन की मांग करने के बजाए भारत के साथ व्यापार को बेहतर करने पर विचार करना चाहिए. इमरान खान ने भी अपने चुनावी भाषणों के दौरान भारत और पाकिस्तान के बीच व्यापार संबंधी गतिविधियों को बढ़ाने को लेकर अपनी प्रतिबद्धता जाहिर की थी. इन बातों को देखते हुए कयास लगाए जा रहे हैं कि इमरान शायद इस दिशा में कोई सकारात्मक कदम उठाएं.

भारत अफगानिस्तान के साथ व्यापार करना चाहता है. इसके लिए पाकिस्तान से होकर जाने वाला रास्ता सबसे छोटा और उपयुक्त है. लेकिन पाकिस्तान इसके लिए अपनी जमीन के उपयोग की इजाजत नहीं देता. इधर अफगानिस्तान भी भारत को माल निर्यात करना चाहता है लेकिन, पाकिस्तान ने उसपर भी कई तरह की शर्त लगा रखी हैं. मसलन अफगानिस्तान भारत को माल भेज तो सकता है लेकिन, भारत अफगानिस्तान को नहीं भेज सकता. इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि अफगानिस्तान से माल, ट्रक के जरिए भारत आ तो सकता है, लेकिन ट्रक को खाली ही वापस जाना पड़ता है. इससे मालवाहकों को भारी नुकसान होता है. जिसकी वजह से अफगानिस्तान भी भारत को माल नहीं भेज पाता.

कई मानते हैं कि अगर पाकिस्तान जिद छोड़ भारत और अफगानिस्तान को अपनी जमीन का उपयोग करने दे तो उसे ट्रांजिट फीस के तौर पर काफी फायदा होगा. इतना ही नहीं, इसके जरिये पाकिस्तान, दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया को जोड़ने वाला व्यापार का एक बड़ा हब भी बन सकता है. पाकिस्तान के ऐसा करने से जाहिर तौर पर भारत और अफगानिस्तान के निर्यात में भी बढ़ोतरी होगी.

इस तरह देखा जाए तो पाकिस्तान का यह एक कदम सभी संबंधित देशों के लिए फायदे का सौदा साबित होगा. लेकिन जानकारों के मुताबिक सबसे पहले पाकिस्तान को अपनी धरती पर आतंकवाद को पनाह देना बंद करना होगा, ताकि भारत और पाकिस्तान के बीच राजनीतिक संबंध ठीक हो सकें. तभी आर्थिक संबंध भी ठीक हो पाएंगे.