नवरात्रि के साथ त्योहारी सीजन ने जोर पकड़ लिया है. इन दिनों उत्तर भारत में बड़ी संख्या में लोग व्रत रखते हैं. कुछ लोग पूरे नौ दिन तो कुछ किसी विशेष दिन पर व्रत नियमों का पालन करते हैं. इनमें रोज़ाना के खाने से परहेज़ करना शामिल है. जो लोग मांसाहारी हैं वे इन नौ दिनों के दौरान मांस-मछली से दूरी बना कर रखते हैं और व्रत नियमों के तहत विशेष प्रकार का भोजन करते हैं. इस दौरान साबूदाना खाने की सलाह दी जाती है.

इन्हीं दिनों सोशल मीडिया पर एक संदेश काफ़ी वायरल हो रहा है. इसमें व्रत रखने वालों को चेतावनी दी गई है कि वे साबूदाना न खाएं क्योंकि यह मांसाहारी है, जबकि कहा यह जाता है कि साबूदाना व्रत रखने वालों के सबसे अच्छे शाकाहारी आहारों में से एक है. संदेश में साबूदाना को उसे बनाने के तरीक़े की वजह से मांसाहारी क़रार दिया गया है. कई लोग इस दावे को सच मान कर बड़ी संख्या में संदेश को शेयर कर रहे हैं. चूंकि इसमें धार्मिक पहलू भी शामिल है इसलिए लोगों का जल्दी बातों में आना अस्वाभाविक नहीं लगता.

हालांकि इस पोस्ट का नाता सच्चाई से काफ़ी कम और सोशल मीडिया के निठल्ले चिंतन से ज़्यादा लगता है. इस संदेश में साबूदाना बनाने की विधि से अलग ज़्यादातर बातें सही हैं. जैसे तमिलनाडु के सेलम में साबूदाना बनाने की बहुत सारी फ़ैक्ट्रियां हैं और यह विशेष प्रकार की जड़ों से बनता है आदि.

लेकिन प्रोसेसिंग से जुड़ी जानकारी में कोरा निठल्ला चिंतन दिखाई देता है. इसमें कहा गया है कि कसावा की जिन जड़ों से साबूदाना बनाया जाता है, उनका गूदा बना कर महीनों तक सड़ने के लिए बड़े-बड़े गड्ढों में डाल दिया जाता है. यह ग़लत है. इस प्रक्रिया के तहत मैन्युफ़ैक्चरिंग यूनिटों से बड़ी मात्रा में कसावा पौधे की जड़ों को फ़ैक्ट्रियों तक लाया जाता है. प्रोसेसिंग के तहत सबसे पहले इन्हें अच्छे से धोकर इनके छिलके उतारे जाते हैं. उसके बाद इन्हें अच्छे से पीस कर गाढ़े द्रव (या लिक्विड) में तब्दील किया जाता है. सेलम स्थित फ़ैक्ट्रियों में यह काम पूरी तरह मशीनों के ज़रिए होता है.

गाढ़ा लिक्विड तैयार होने के बाद उसे सड़ने के लिए महीनों तक गड्ढों में तैयार नहीं किया जाता. खाद्य तकनीक में पीएचडी करने वाले अजीत सिंह भटनागर बताते हैं कि ऐसा वहां होता है जहां उत्पादन के लिए उचित सुविधाएं नहीं होतीं. यहां बात सेलम स्थित फ़ैक्ट्रियों की हो रही है जो पूरी तरह मशीनों और आधुनिक तकनीक की मदद से साबूदाना तैयार करने के लिए जानी जाती हैं. यहां साबूदाने को महीनों तक सड़ाने की ज़रूरत नहीं होती. उसका गूदा तैयार करने के बाद उसे सूखे पाउडर में बदला जाता है.

विशेषज्ञ बताते हैं कि इसमें आधुनिक तकनीक का सहारा लिया जाता है. जड़ों को पीस कर जो लिक्विड तैयार किया जाता है उसे कुछ घंटों के लिए एक बड़े बर्तन (गड्ढे में नहीं) में रखा जाता है. इस दौरान लिक्विड में शामिल पानी ऊपर आ जाता है और ठोस सफ़ेद हिस्सा (जिसका बाद में पाउडर बनता है) केक के रूप में नीचे आ जाता है. फिर पानी को निकाल दिया जाता है और केक से पहले पाउडर और फिर गोलियों के रूप में साबूदाना बनाया जाता है.

आम तौर पर इन गोलियों का आकार दो मिलीमीटर होता है. फिर इन गोलियों को भूना जाता है या एक ऑटोमैटिक रोस्टर में घुमाया जाता है. कुछ फ़ैक्ट्रियों में गर्म बॉयलर्स पर इन्हें उबाला भी जाता है. फिर इन्हें सूरज की रोशनी में या मशीनों की मदद से सुखाया जाता है. कुछ फ़ैक्ट्रियों में इन्हें अलग-अलग रंगों से रंगा भी जाता है. इसके बाद पैकेजिंग कर इन्हें बाज़ार में भेज दिया जाता है. यह पूरा प्रोसेस कुछ ही दिन में पूरा हो जाता है. महीनों लगने वाली बात सही नहीं है.

फ़ैक्ट्रियों से बदबू क्यों आती है?

इस बारे में डॉ अजीत लिखते हैं, ‘खाद्य उद्यम से जुड़े लोग जानते हैं कि स्टार्च/कार्बोहाइड्रेट युक्त फ़सलें फ़र्मेंटेशन के दौरान गंधक गैस छोड़ती हैं. इसलिए चावलों की मिलों से और सोयाबीन की प्रोसेसिंग के दौरान अलग तरह की गंध आती है. शराब बनाने की प्रक्रिया में भी ऐसा होता है.’ यानी साबूदाना बनने के दौरान आने वाली गंध एक सामान्य बात है.

कौन-सा साबूदाना खाएं?

वायरल संदेश इसलिए निठल्ला चिंतन है क्योंकि यह साबूदाना बनाने के आधुनिक तरीक़े को ग़लत रूप में पेश करता है. जो बातें इसमें कही गई हैं, वे तब सही हो सकती हैं अगर साबूदाना बनाने का तरीक़ा काफ़ी हद तक या पूरी तरह मानवीय हो. मशीनों के अभाव में ‘शुद्ध’ साबूदाना बनाना शायद संभव न हो. लेकिन सेलम स्थित फ़ैक्ट्रियों के मामले में ऐसा नहीं है. इसलिए यह जान लें कि व्रत के दौरान खाने के लिए बाज़ार से कौन-सा साबूदाना ख़रीदें.

डॉ अजीत के मुताबिक़ साबूदाना उत्पादन से जुड़े कई उद्यम विश्व स्वास्थ्य संगठन के (गुड मैन्युफ़ैक्चरिंग प्रैक्टिसिज़ यानी जीएमपी) मानकों व दिशा-निर्देशों का पालन करते हैं. ये उद्यम अंतरराष्ट्रीय मानकीकरण संगठन यानी आईएसओ और हैज़र्ड एनालिसिस एंड क्रिटिकल कंट्रोल पॉइंट्स (एचएसीसीपी) जैसे अंतरराष्ट्रीय मानकों से प्रमाणित हैं. लेकिन कुछ उद्यम इन मानकों के तहत उत्पादन नहीं करते. वे किसी ब्रैंड के तहत साबूदाना तैयार नहीं करते.

सीधे शब्दों में कहे तो इनका साबूदाना संदिग्ध हो सकता है. इसलिए बाज़ार से साबूदाने के वे पैकेट ख़रीदें जिन पर डब्ल्यूएचओ-जीएमपी, आईएसओ और एचएसीसीपी की मान्यता व प्रामाणिकता संबंधी जानकारी हो या भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) का लेबल लगा हो. सोशल मीडिया के निठल्ले चिंतन में न आएं. साबूदाना पूरी तरह शाकाहारी आहार है. बस इसे ख़रीदते समय थोड़ी सावधानी बरतने की ज़रूरत है.

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