इन दिनों अचानक ‘अर्बन नक्सल्स’ शब्द चर्चा में आ गया है. हमें बताया जा रहा है कि वे इस देश की और प्रधानमंत्री की सुरक्षा को ख़तरा हैं. चूंकि हमारी पुलिस का आदर्श हरिशंकर परसाई की कहानी ‘इंस्पेक्टर मातादीन चांद पर’ के नायक इंस्पेक्टर मातादीन है इसलिए वह सबूतों के आधार पर किसी को गिरफ़्तार करने का कष्टसाध्य तरीक़ा नहीं अपनाती. वह जिसे सुविधानुसार गिरफ़्तार करना हो उसे गिरफ़्तार करती है, फिर उसके ख़िलाफ़ सबूत खुद ही बना लेती है.

जिन ‘अर्बन नक्सलों’ को गिरफ़्तार किया गया है उनके ख़िलाफ़ सबूतों के बारे में ऐसा ही दिखता है. आज से तीन महीने पहले कुछ ऐसे ही ’अर्बन नक्सल’ लोगों को महाराष्ट्र पुलिस ने गिरफ़्तार किया था, उनके ख़िलाफ़ आरोपपत्र अब तक दायर नहीं किए जा सके हैं और पुलिस ने तीन और महीने का समय मांगा है.

सवाल यह है कि ‘अर्बन नक्सल’ की परिभाषा क्या है. फ़िलहाल जिन लोगों को गिरफ़्तार किया गया है उनमें से ज़्यादातर दलित, आदिवासी आंदोलनों के समर्थक, मानवाधिकार कार्यकर्ता, वक़ील वग़ैरह हैं. हो सकता है इनमें से कुछ वामपंथी संगठनों के सदस्य हों, लेकिन यह कोई गुनाह नहीं है. किसी के ख़िलाफ़ हिंसा भड़काने या करने का ठोस सबूत नहीं है. लेकिन ‘अर्बन नक्सल’ संज्ञा का दायरा इतना बड़ा है कि उसमें सुविधानुसार कोई भी उदार लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील व्यक्ति समा सकता है. बल्कि जो भी सरकार के विरुद्ध है उसे अर्बन नक्सल और देशद्रोही साबित करने किया जा सकता है. इस सुविधा के बारे में तो इंस्पेक्टर मातादीन ने भी नहीं सोचा था.

दरअसल इंस्पेक्टर मातादीन पुरानी सरकारों के दौर के पुलिस अधिकारी थे. वे एक वक्त में एक केस के बारे में सोचते थे. उस दौर में भी इन ‘अर्बन नक्सल्स’ की अलग अलग वक्त पर गिरफ़्तारी हुई थी जब कांग्रेस की सरकार थी. लेकिन उस वक्त में और आज के वक्त में फ़र्क़ यह है कि आज इन गिरफ़्तारियों के पीछे एक पूरा नैरेटिव है, एक भय और संदेह की काल्पनिक कथा जिसका पात्र इन कार्यकर्ताओं को बनाया गया है.

पत्रकार शेखर गुप्ता ने पाकिस्तान के बारे में लिखा है कि पाकिस्तान एक’ नेशनल सिक्योरिटी स्टेट’ है. उस देश की मुख्य थीम सेना और कट्टरवादी तत्वों ने राष्ट्रीय सुरक्षा को बना रखा है. जनता को बहुत पहले से यह समझाया जा रहा है कि देश की सुरक्षा को ख़तरा है इसलिए सबसे महत्वपूर्ण काम देश की सुरक्षा करना है. चूंकि देश की सुरक्षा को प्राथमिकता बनाने के लिए ज़रूरी है कि देश पर लगातार ख़तरे का एक माहौल बनाया जाए, इसलिए वहां ख़तरे का एक विस्तृत कथानक तैयार किया गया है जिसमें कल्पना ज्यादा यथार्थ कम है. अब जनता को एक ही सवाल का जवाब देना होता है कि जब देश ख़तरे में है तो क्या उसे वह ग़रीबी, अशिक्षा, महंगाई, बेरोज़गारी जैसी गौण समस्याओं के समाधान की मांग करनी चाहिए ? ज़ाहिर है जनता का जवाब होता है - बिल्कुल नहीं.

भारत में भी राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर एक ख़तरे का माहौल बनाया जाने लगा है. यह नैरेटिव बनाया जा रहा है कि देश की सुरक्षा को लेकर पिछली सरकारें बहुत लापरवाह रही हैं इसलिए देश में ख़तरे का माहौल है और यह सरकार इस ख़तरे से लड़ने में जुटी है. ख़तरे के लिए दुश्मनों की जरूरत है, इन दुश्मनों में मुस्लिम आतंकवादी तो हैं ही, यह भी तर्क प्रसारित किया जा रहा है कि समानधर्मा होने के कारण सभी मुसलमान भी शक के घेरे में हैं. और ज्यादा दुश्मन गढ़ने की खोज में अर्बन नक्सल पा लिए गए हैं. इनके साथ सुविधा यह है कि इनके साथ तमाम उदार और लोकतांत्रिक लोगों को भी दुश्मनों में शामिल किया जा सकता है. मसलन जो यह कहे कि कोई भी हो, उसे निष्पक्ष क़ानूनी प्रक्रिया और मानवाधिकारों का लाभ मिलना चाहिए, उसके बारे में यह कहा जा सकता है कि देखो, देश ख़तरे में है और यह मानवाधिकारों की बात कर रहा है. वह देश के दुश्मनों के साथ मिला हुआ है

ऐसा नहीं है कि दक्षिणपंथी सरकारें ही ऐसा करती हैं. कम्युनिस्ट सरकारों ने भी पूंजीवादी और साम्राज्यवादी ख़तरे की उनकी बात से असहमत लोगों को पूंजीवाद समर्थक और संशोधनवादी बनाकर कुचला था. जिस सत्ता को भी असहमति से ख़तरा महसूस होता है वह इस ख़तरे को देश पर ख़तरे की तरह पेश करती है. इसलिए हो सकता है कि अगले चुनावों में ‘अर्बन नक्सल’ ख़तरा बड़ा उपयोगी हो.

इंस्पेक्टर मातादीन के दौर में इतना दूरगामी कथानक नहीं था. लेकिन हमें याद रखना चाहिए कि पिछली सरकारों ने लोकतांत्रिक संस्थानों को ऐसा कमज़ोर किया है कि उनका ऐसा दुरुपयोग संभव हो सका. इसीलिए अब के मातादीन सिर्फ़ किसी लघुकथा के पात्र नहीं हैं. वे एक व्यापक कथानक के गढ़ने में साझीदार हैं.