केरल को इस बार बाढ़ ने बुरी तरह तहस-नहस कर दिया. इस आपदा में 350 से ज़्यादा लोग मारे गए और लगभग 10 लाख लोग अपने बसेरों से उजड़ गए. इन्हें 4,000 से ज़्यादा राहत शिविरों में ठिकाना मिला. इसके बावज़ूद हजारों लाेग अब तक असहाय हालत में हैं, ऐसा बताया जाता है.

यह प्राकृतिक आपदा वक़्त पर मिली चेतावनी की तरह है. इसने संकेत दिया है कि जलवायु परिवर्तन से आगे किस तरह की और कितनी विकट परिस्थितियां बन सकती हैं. वह भी किसी एक ख़ास जगह पर नहीं बल्कि पूरी दुनिया में कहीं भी और कभी भी. हालांकि फिलहाल अभी बाढ़ जैसी किसी भी आपदा को जलवायु परिवर्तन से सीधे तौर पर नहीं जोड़ा जा रहा लेकिन भौतिक शास्त्र का मूलभूत सिद्धांत इशारा इसी तरफ करता है. यह सिद्धांत है कि धरती पर जैसे-जैसे गर्मी बढ़ती है, वाष्पीकरण भी स्वाभाविक तौर पर बढ़ जाता है और वायुमंडल में पानी ज़्यादा इकट्‌ठा होने लगता है. इसका नतीज़ा उतने ही स्वभाविक रूप से अतिवृष्टि यानी भारी बारिश के तौर पर सामने आता है.

वैसे मानसून के सीज़न में यूं तो भारी बारिश होती ही है लेकिन इस साल केरल में सामान्य से 42 फ़ीसदी अधिक पानी गिर चुका है. आंकड़े बताते हैं कि इस पूरे क्षेत्र में जून से अगस्त के बीच 2,300 मिलीमीटर से ज़्यादा बारिश हो चुकी है. इसमें 700 मिलीमीटर पानी तो सिर्फ अगस्त में ही गिरा है. अमेरिका के ह्यूस्टन में अगस्त-2017 में आए हार्वे तूफान के दौरान वहां 1,500 मिलीमीटर से ज़्यादा बारिश हुई थी. वैसे अध्ययन बताते हैं कि धरती का तापमान दो डिग्री बढ़ जाने पर हार्वे जैसे तूफानों की शक्ति 10 प्रतिशत तक बढ़ सकती है. यही नहीं, जलवायु परिवर्तन के चलते इसी सदी के अंत तक बहुत भारी बारिश की संभावनाएं छह गुना तक बढ़ जाने का अनुमान लगाया जा रहा है.

केरल के नदी-नाले इतनी भारी बारिश के लिए तैयार नहीं थे जिससे वहां भीषण बाढ़ की स्थिति बन गई. आम तौर पर बारिश के पानी को बहने से रोकने में सबसे बड़ी भूमिका पेड़ निभाते हैं. लेकिन बीते 40 साल में केरल से लगभग आधे जंगल साफ हो चुके हैं. आंकड़ों में ख़त्म हो चुके जंगलों का यह इलाका नौ हजार वर्ग किलोमीटर के आसपास बताया जाता है, यानी वृहद् लंदन के आकार के लगभग बराबर. इस पर भी केरल में शहरीकरण की रफ़्तार अभी धीमी नहीं हुई है बल्कि यह तेजी से बढ़ ही रहा है. इसका दूसरा मतलब यह भी है कि बारिश के पानी को रोकने का प्राकृतिक बंदोबस्त यानी कि जंगलों के न होने से वह तेजी से नदी-नालों में समा रहा है और बाढ़ जैसी विपदा का कारण बन रहा है.

केरल की बाढ़ की तस्वीरों ने एक और चिंताजनक पहलू की तरफ ध्यान खींचा है. इनमें देखा गया है कि बारिश और बाढ़ के दौरान जगह-जगह किस पैमाने पर भूस्खलन हुआ है. इसने विपदा की गंभीरता को और बढ़ाया है. तमाम शोध बताते हैं कि भू-आकृति में बदलाव की प्रक्रिया (जियोमॉर्फोलॉजी) बारिश के प्रति काफी संवेदनशील होती है. मिट्‌टी के उलट-पलट की यही वह प्रक्रिया है जिससे ज़मीन का आकार-प्रकार तय होता है. बार-बार ज़्यादा बारिश और बाढ़ से यह प्रक्रिया भी प्रभावित होती है. फिर ज़ाहिर तौर पर ज़मीनी भूगोल भी.

केरल की बाढ़ कितनी भीषण?

राज्य के मुख्यमंत्री पिनरायी विजयन ने इसको बीते ‘100 साल में आई सबसे भीषण बाढ़’ बताया है. हालांकि जब भी कहीं इस तरह की कोई घटना होती है या प्राकृतिक आपदा आती है तो उसकी तीव्रता बताने के लिए इसी तरह के विशेषण इस्तेमाल किए जाते हैं. लगभग पूरी दुनिया में यही देखने में आता है लेकिन यह तरीका बाढ़ जैसी विपदा से जुड़े जोख़िम का आकलन करने के लिए प्रभावी नहीं माना जा सकता. इससे न ही उसकी तीव्रता को ठीक तरह से समझाया जा सकता है न ही भविष्य के जोख़िम का आकलन किया जा सकता है क्योंकि 100 साल की समयावधि काफी लंबी हाेती है. इस समयावधि में किसी घटना के एक बार होने मिसाल ठीक तरह लोगों की चेतना में जगह नहीं बना पाती. उन्हें यह तो लगता है कि कुछ बड़ा हुआ है लेकिन वे यह नहीं समझ पाते कि मामला किस हद तक गंभीर है या आगे हो सकता है. क्योंकि तुलना करने के लिए इस लंबी समयावधि के दौरान हुआ इसी तरह का कोई पुराना वाक़या किसी को याद नहीं रहता. पीढ़ियां बदल चुकी होती हैं इसीलिए मौज़ूदा पीढ़ी इस तरह के विशेषणों के साथ ठीक-ठीक जुड़ नहीं पाती. तो फिर क्या करना चाहिए?

फोटो क्रेडिट : ईपीए
फोटो क्रेडिट : ईपीए

ऐसे मामले में लोगों को इस तरह की विभीषिका की गंभीरता के प्रति जागरूक करने, उन्हें समझाने के लिए नए तरीके अपनाने की ज़रूरत है. उन्हें यह बताया जा सकता है कि इस तरह की बाढ़ का मतलब ये भी है कि अगर किसी मकान पर 25 साल की अवधि का कर्ज़ लिया गया है तो इस दौरान उसके इस किस्म की प्राकृतिक आपदा में बह या ढह जाने की 25 फ़ीसदी आशंका है. केरल की बाढ़ के दौरान बड़े पैमाने पर ऐसा हुआ भी है. इन नए तरीकों से न सिर्फ लोग इस मुददे के साथ बेहतर तरीके से जुड़ा महसूस करेंगे बल्कि इसके चलते उनकी जिंदगी में आने वाले जोखिम के बारे में ज्यादा अच्छी तरह भी सोच सकेंगे.

इसी तरह से केंद्र और राज्यों की सरकारें भी तरीका अपना सकती हैं. वे भी छोटे-छोटे कालखंड में बांटकर विभिन्न एजेंसियों आदि की मदद से अध्ययन करा सकती हैं. बाढ़ संभावित और इससे त्रस्त क्षेत्राें का मानचित्र बनवा सकती हैं. लोगों को ऐसी प्राकृतिक आपदाओं के बारे में लगातार जागरूक कर सकती हैं. उन्हें शिक्षित कर सकती हैं और उनको पर्यावरण संबंधी मसलों से सीधे जोड़ भी सकती हैं. इससे सरकार के नीतिगत निर्णयों का स्तर भी सुधरेगा. इस सिलसिले में ब्रिटेन ने अगले 25 साल की एक पर्यावरण योजना बनाई है. इस तरफ कदम उठाने में यह योजना सभी सरकारों के लिए अध्ययन का विषय हो सकती है.

इस सबके साथ यह भी मानना होगा कि जलवायु परिवर्तन से और बारिश के तौर-तरीकों में बदलाव से नदियों का व्यवहार भी बदलेगा ही. अभी तक बारिश-बाढ़ से जुड़े अध्ययनों में नदियों के व्यवहार के इस पहलू को उस गंभीरता से शामिल नहीं किया जाता जिसकी ज़रूरत होती है. नदियों के बारे में मानकर चला जाता है कि वे कालांतर में जैसा व्यवहार करती रही हैं वैसा ही आगे भी करती रहेंगी. जबकि यह सही नहीं है. क्योंकि प्रकृति में अति के स्तर पर घटी किसी भी घटना का स्वाभाविक असर अगर ज़मीन पर पड़ता है, उसका आकार-प्रकार बदलता है तो नदियों के व्यवहार पर भी असर होता है. उनके बहाव क्षेत्र, उनकी घाटियों में बड़े बदलाव की पूरी संभावना रहती है.

लिहाज़ा नदियों के व्यवहार को अध्ययन में जितनी जल्दी शामिल किया जाएगा उतनी ही तेजी से शहरों के जलनिकास की व्यवस्था (ड्रेनेज सिस्टम) को भी समय रहते परिवर्तित किया जा सकेगा. नज़दीकी नदियों के वर्तमान और भविष्य में संभावित व्यवहार के हिसाब से इस व्यवस्था को ढाला जा सकेगा. इससे बाढ़ जैसी विपदा की भीषणता को नियंत्रित किया जा सकेगा. हालांकि ऐसा हो पाने के लिए पहली शर्त यह है कि सरकारें और वैज्ञानिक जलवायु के प्रति कितनी जल्दी और कितना संवेदनशील तथा लचीला रवैया अपनाते हैं. कितनी जल्दी पहले खुद को इनके अनुरूप ढाल पाते हैं.

बाढ़ जैसी विपदाएं किसी एक क्षेत्र विशेष के लिए चुनौती नहीं हैं. यह वैश्विक चुनौती है. भविष्य में यह बढ़ने ही वाली है. इसके प्रभाव भी समय के साथ-साथ और विनाशकारी होने वाले हैं. इसलिए हर एक को, हर समुदाय को इसकी गंभीरता को समझना होगा. समाधान ढूंढना होगा. लचीला रुख़ अपनाते हुए ख़ुद को भविष्य की ऐसी चुनौतियों से निपटने के लिए तैयार करना होगा. वह भी इस तरह कि इनसे नुक़सान कम से कम हो. और इसके लिए ख़ुद को बार-बार यह याद दिलाना होगा केरल की बाढ़ सिर्फ वहीं का संकट नहीं है. यह कभी भी, कहीं भी आ सकता है.

(डैनियल पारसंस और क्रिस्टोफर स्किनर का यह आलेख मूल रूप से द कनवर्जेशन पर प्रकाशित हुआ है)