उपेंद्र जी, क्या आप एनडीए छोड़कर महागठबंधन में जाने की तैयारी कर रहे हैं?

अरे मैडम, मैंने तो खीर बनाने का जिक्र किया था, फिर आप मुझसे मेरे खिचड़ी पकाने के बारे में सवाल क्यों कर रही हैं!

तो क्या आप खीर और खिचड़ी एक साथ पका रहे हैं?

देखिए, खिचड़ी तो यहां सालभर पकती है और हर कोई पकाता है. बल्कि मैं तो कहूंगा कि घरों और अस्पतालों से ज्यादा खिचड़ी राजनीतिक गलियारों में पकती है! पकौड़ा तलने वालों की भी पहली पसंद तो खिचड़ी ही है, क्योंकि यह न सिर्फ शरीर के लिए बल्कि राजनीतिक करियर के लिए भी सबसे सेहतमंद है. जो नेता जितनी ज्यादा खिचड़ी पकाता है, उसका राजनीतिक स्वास्थ्य उतना ही बढ़िया रहता है. खिचड़ी पकाने वालों के बीच मैं अकेला ही हूं जो खीर भी पका रहा हूं.

मसला तो यही है कि लोग राजनीति में खिचड़ी पकाते हैं, फिर आप खीर क्यों पका रहे हैं?

मैंने बताया तो, खिचड़ी पकाना राजनीतिक स्वास्थ्य की मजबूरी है, स्वाद के लिए तो पकौड़े और खीर ही जरूरी हैं! (हंसते हुए)

अच्छा यह बताइए कि आपको खीर बनाने का विचार आया कहां से?

वहीं से जहां से पकौड़े तलने का विचार आया था! देखिए, इस समय मैं देश की सबसे रचनात्मक विचारों वाली पार्टी के साथ हूं जहां बिप्लब देब जैसे घोर विचारवान रत्न मौजूद हैं. उनके विचारों की रचनात्मकता का कुछ असर तो मेरे ऊपर भी पड़ेगा ही न!

यह पैगाम-ए-खीरक्या है? इसके बारे में कुछ विस्तार से बताइए.

देखिए, मैं जमीन से जुड़ा आदमी हूं. हर एक चीज का सदुपयोग करने में यकीन रखता हूं. मैंने गौर किया कि दूध-दही को तो आजकल कोई पूछ ही नहीं रहा, क्योंकि गोभक्तों का सारा ध्यान तो सिर्फ गोसेवा, गोमूत्र, गोमांस और गोबर में ही रहता है. सो मुझे लगा कि इतनी मात्रा में जो दूध बेकार जा रहा है, मैं ही उसका सदुपयोग कर लेता हूं. इसलिए उसमें से कुछ दूध की खीर पकाऊंगा और बाकी की दही जमाकर समय आने पर रायता फैलाऊंगा... मतलब कि बनाऊंगा. दरअसल मैं लोगों को बताना चाहता हूं कि स्वास्थ्य के साथ उन्हें स्वाद का भी ख्याल रखना चाहिए.

आपने कहा था कि यादवों के दूध, कुशवाहों के चावल और दलितों के पंचमेवों को मिलाकर खीर बनाएंगे. लेकिन इस खीर में मीठा कौन डालेगा, आपने यह नहीं बताया?

(हंसते हुए) लगता है आपको खीर काफी पसंद है क्योंकि यह सवाल कोई खीरखोर ही पूछ सकता है! लेकिन आप मीडिया वाले भी अपने सारे पत्ते नहीं खोलते, फिर मैं अपनी खीर में कौन-सा, कैसा और कितना मीठा डालूंगा ये भला आपको क्यों बताऊं?

अच्छा यह तो बता ही दीजिए कि सियासी खीर और असली खीर में से आपको कौन-सी ज्यादा स्वादिष्ट लगती है?

सियासी खीर.

वो क्यों?

क्योंकि असली खीर बिना मीठे के स्वादिष्ट नहीं लगती, लेकिन सियासी खीर ‘शुगर फ्री’ होती है इसलिए शुगर के पेशेंट भी इसे पूरे शौक से मनभर खा सकते हैं! (जोर से हंसते हुए)

उपेंद्र जी, आप बिहार की राजनीति से दूर केंद्र में हैं. फिर खुद को बिहार के मुख्यमंत्री पद का दावेदार क्यों मानते हैं?

मैं तो फिर भी केंद्र में होकर एक राज्य के मुख्यमंत्री पद की दावेदारी कर रहा हूं. यहां तो ऐसे-ऐसे पप्पू हैं जो कहीं के न होकर भी खुद को प्रधानमंत्री पद के दावेदार के तौर पर देख रहे हैं!

इस समय पूरे देश में मॉब लिंचिंग बहुत खतरनाक तरीके से बढ़ रही है. ऐसे में आप केंद्र सरकार की कानून और व्यवस्था की नाकामी पर सवाल खड़े करने के बजाय, इस मुद्दे पर बिहार सरकार को निशाना क्यों बना रहे हैं?

कुरुवंशी अपने निशाने के लिए सारी दुनिया में प्रसिद्ध हैं... और आप हैं जो मेरे जैसे कुरुवंशी के निशाने पर ही सवाल खड़ा कर रही हैं! (चिढ़ते हुए)

अपनी बात जरा विस्तार समझाइए.

अरे मेरा मतलब है कि अर्जुन अपने शानदार निशाने के लिए ही जाने गए और वे कुरुवंशी ही थे. उन्हीं के पुरखों का खून मेरी रगों में भी दौड़ रहा है, तो जाहिर है कि मेरी नजर भी निशाने से अलग और कहीं और नहीं टिकेगी!

उपेंद्र जी, नीतीश कुमार आपको बिहार की राजनीति में लेकर आए हैं, इस नाते वे आपके राजनीतिक गुरू हैं. फिर आजकल आप उन पर लगातार मौखिक हमले क्यों कर रहे हैं?

ये सब संगत का असर है! आपको पता होना चाहिए कि खरबूजे को देखकर खरबूजा भी उतनी तेजी से रंग नहीं बदलता, जितनी तेजी से एक नेता दूसरे नेता को देखकर रंग बदलता है.

क्या मतलब?

देखिए, जैसे जीवन में कोई एक गुरू नहीं होता, वैसे ही राजनीति में भी बहुत सारे गुरू होते है. जिस तरह उच्च शिक्षा के लिए हम और ज्यादा काबिल और योग्य गुरू के पास जाते हैं, उसी तरह राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के लिए भी पहले से ज्यादा योग्य गुरू की शरण में जाना पड़ता है. सो अब मैं ऐसे व्यक्ति की शरण में हूं, जिन्होंने अपने गुरू की राजनीतिक हत्या के बाद ही सफलता की सीढ़ी तेजी से चढ़ी!

कुछ समय पहले आपने कहा था कि एनडीए में ही कुछ लोग नरेंद्र मोदी को दोबारा प्रधानमंत्री बनते हुए देखना नहीं चाहते. क्या आप बताएंगे कि वे कौन लोग हैं?

मैं यहां स्वादिष्ट खीर का स्वाद मुंह में लेकर घूम रहा हूं और आप उसे कड़वी करने पर तुली हुई हैं! ये बात आप अपने खुफिया सूत्रों से पता लगाइए, मेरे मुंह का स्वाद क्यों बिगाड़ रही हैं.(खीजते हुए)

एक आखिरी सवाल. आपने चंद्रगुप्त मौर्य और सम्राट अशोक को किस आधार पर कुशवाहा जाति का कहा? मेरा मतलब है कि आपने उनकी जाति का कैसे पता लगा लिया?

जब बिप्लब देब, चंद्रगुप्त मौर्य और सम्राट अशोक के समय से कई सदी पहले जाकर महाभारत काल में इंटरनेट की खोज कर सकते हैं तो मैं क्या इन लोगों की जाति भी पता नहीं लगा सकता!