आपातकाल के बाद इंदिरा गांधी फिर सत्ता में आ गयी गईं. जैसा पिछली यानी जनता पार्टी सरकार ने किया उन्होंने भी उसी तर्ज़ पर राज्यों की ग़ैरकांग्रेसी सरकारों पर आफ़त बरसाई. कई राज्यों की सरकारें बर्ख़ास्त की गईं. इनमें महाराष्ट्र भी एक था. इसके बाद वहां अब्दुल रहमान अंतुले की अगुवाई में कांग्रेस की सरकार बनी.
लेकिन जल्द ही उसे भी तगड़ा झटका लगा. इंडियन एक्सप्रेस के तत्कालीन संपादक अरुण शौरी ने सीमेंट आवंटन के घोटाले का पर्दाफ़ाश करके इंदिरा गांधी सरकार के होश उड़ा दिए. उनकी एक ख़बर की हैडलाइन थी - ‘अंतुले : तुले या नहीं तुले’. चौतरफ़ा दबाव को देखते हुए इंदिरा गांधी को उन्हें हटाना पड़ा. इसे भारत का ‘वाटरगेट स्कैंडल’ या ‘अंतुले वाटरगेट स्कैंडल’ भी कहा जाता है. यह साल 1981 की बात है.

राजनीति के दिग्गज, अब वे चाहे दोस्त हों या दुश्मन, सभी अंतुले को ‘महाराष्ट्र का नेपोलियन’ या हारून-अल-रशीद (बग़दाद का पांचवां ख़लीफा जो न्याय और ईमानदारी के लिए प्रसिद्ध था) मानते थे. अंतुले की प्रतिष्ठा अजेय थी. तब महाराष्ट्र में शरद पवार की अगुवाई में प्रोग्रेसिव डेमोक्रेटिक फ्रंट की सरकार थी. इसके बर्खास्त होने के बाद चुनाव हुए जिनमें कांग्रेस की जीत हुई. इंदिरा गांधी ने वहां की ताक़तवर मराठा लॉबी को नेस्तनाबूद करने के लिए तेज़तर्रार कांग्रेसी ‘बैरिस्टर अंतुले’ को नया मुख्यमंत्री नियुक्त किया. अजीब इत्तेफाक है कि मराठा लॉबी शिवाजी ब्रांड की पक्षधर थी और अंतुले भी शिवाजी की कार्यस्थली रायगढ़ से ताल्लुक रखते थे.
अंतुले ‘संजय गांधी’ स्टाइल राजनीति के पैरोकार थे. जल्द निर्णय लेना और तुरंत ही उसे अंजाम तक पहुंचाना उन्हें पसंद था. उन्होंने बड़े ज़िलों को तोड़कर छोटा बनाया जिससे प्रशासन सुगमता से चल सके. कहा जाता है कि ब्यूरोक्रेसी उनसे कांपती थी. उन्होंने अपने कार्यकाल में कई योजनाएं शुरू कीं. ग़रीब तबके के लोगों की वित्तीय सहायता के लिए ‘संजय गांधी निराधार योजना’ और विधायकों व मीडिया कर्मियों के लिए आवास योजना इनमें शामिल थी. इसके अलावा उन्होंने कुछ ट्रस्टों की स्थापना की जिनका उद्देश्य फंड इकट्ठा करना था. यही उनके लिए जीवन की सबसे बड़ी भूल साबित हुई.
अर्थशास्त्री अरुण शौरी विश्व बैंक की नौकरी छोड़कर भारत चले आए थे. कुछ समय के लिए योजना आयोग के साथ काम करने के बाद वे इंडियन एक्सप्रेस अखबार के साथ जुड़ गए. रामनाथ गोयनका ने उन्हें पूरी छूट दी. गोयनका ने आपातकाल की मुखालफ़त बड़े पुरज़ोर तरीके से की थी.
31 अगस्त 1981 को इंडियन एक्सप्रेस में 7500 शब्दों की रिपोर्ट छपी. इसमें अरुण शौरी ने सिलसिलेवार तरीक़े से यह समझाने की कोशिश की कि किस तरह से महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने तमाम नियम कायदों को ताक पर रखकर विभिन्न ट्रस्टों के ज़रिये धन इकट्ठा किया और कुछ उद्योगपतियों की लॉबी को फ़ायदा पहुंचाया.
बताया जाता है कि अंतुले ने कुल सात ट्रस्ट बनाये थे. अरुण शौरी ने अपने लेख में बताया कि कैसे इन्हीं में से एक ट्रस्ट ‘इंदिरा गांधी प्रतिभा प्रतिष्ठान’ के तहत ठेकेदारों और बिल्डरों से पैसा लिया गया था और उन्हें सीमेंट देने में फ़ायदा पहुंचाया गया था. उन्होंने रिपोर्ट में उन बिल्डरों के नाम भी उजागर किये जिन्होंने चंदा दिया था और इसका फ़ायदा उठाया था. दरअसल, उन दिनों सीमेंट पर सरकार का कंट्रोल था और मुंबई शहर में कंस्ट्रक्शन का काम बड़े स्तर पर किया जा रहा था. ज़ाहिर था कि ठेकेदारों और बिल्डरों को सीमेंट की दरकार थी. एआर अंतुले ने सीमेंट की मांग-आपूर्ति के बीच के अंतर को भुनाने की कोशिश की और ‘इंदिरा गांधी प्रतिभा प्रतिष्ठान’ में 5.2 करोड़ रुपया इकट्ठा किया.
कुल सात ट्रस्टों में लगभग 30 करोड़ रुपया जमा हुआ था और तब यह बहुत बड़ी रकम थी. कहा जाता है कि अंतुले बड़े चाव से कहते थे कि कोई भी करोड़पति उनके पास आता है तो वे उसे अपने ट्रस्टों के बारे में बताते हुए कहते कि हैं कि इनमें दिया गया दान टैक्स फ्री है. वे ये भी कहते थे कि इनमें पैसा इकट्ठा करना उनका शौक बन गया है. यूं तो सारे ट्रस्ट पब्लिक थे और जो राशि जमा हुई थी वह चेक और ड्राफ्ट के ज़रिये ही हुई थी, पर इल्ज़ाम लगा कि यह सारा पैसा अंतुले का ही है क्योंकि इन ट्रस्टों के सदस्य उनके ही परिवार के सदस्य या मित्र थे.
अरुण शौरी की रिपोर्ट छपने के बाद संसद में हंगामा मच गया और पक्ष और विपक्ष आपस में भिड़ गए. दो सितंबर 1981 को संसद के मानसून सत्र में इस मुद्दे पर नौ घंटे बहस हुई थी. नज़ारा कमाल का था. विपक्ष के बजाय सरकार के नेता कार्यवाही में बाधा डाल रहे थे. तत्कालीन वित्त मंत्री आर वेंकटरमण (जो बाद में राष्ट्रपति बने) ने सरकार की तरफ से मोर्चा संभाला था.
बड़बोले एआर अंतुले ने इस खुलासे से महज तीन दिन पहले दिल्ली में स्थित महाराष्ट्र सदन में इन सात ट्रस्टों के बारे में कांग्रेस नेताओं को बताया था कि किस तरह से इनमें इकट्ठा हुए पैसे से ग़रीबों का भला किया जाएगा. वहां एक सांसद वे भी थे जो उनके विरोधी थे उन्होंने यह बात लीक कर दी. पर तब इतना हो-हल्ला नहीं मचा. तूफ़ान अरुण शौरी की रिपोर्ट के बाद आया था. विवाद बढ़ने लगा तो अंतुले ने ‘इंदिरा गांधी प्रतिभा प्रतिष्ठान’ में से इंदिरा गांधी का नाम हटा दिया. एक और कमाल की बात यह थी कि इंदिरा गांधी के नाम से बने ट्रस्ट को उनका आशीर्वाद प्राप्त था. उन्होंने बाकायदा पत्र लिखकर इससे जुड़ने में अपनी ख़ुशी ज़ाहिर की थी. अंतुले के लिए यह बहुत बड़ी बात थी.
एआर अंतुले पर ट्रस्ट के दानदाताओं को तय कोटे से ज़्यादा सीमेंट देने, सीमेंट वितरण प्रणाली को बदलने, मुंबई में विभिन्न प्रोजेक्ट को मंजूरी न देकर कीमतों को बढ़ाने और चीनी उद्योग से जुड़े लोगों को दान देने पर मजबूर करने के इल्ज़ाम लगे. केंद्र की सरकार ने उनके ख़िलाफ़ कोई ख़ास कार्रवाई नहीं की. इसी बीच मामला बॉम्बे उच्च न्यायालय में पंहुच गया. मशहूर वकील राम जेठमलानी ने अंतुले के ख़िलाफ़ पैरवी की. उन्होंने इसके लिए कोई फ़ीस भी नहीं ली थी. न्यायाधीश बख्तावर लेंतिन ने अंतुले को दोषी पाया.
फ़ैसला आने के बाद सरकार को कार्रवाई पर मजबूर होना पड़ा. जनवरी 1982 में अंतुले को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा. हालांकि, बाद में यह मामला सुप्रीम कोर्ट गया और लंबी लड़ाई के बाद कोर्ट ने पर्याप्त सबूतों के अभाव में अंतुले को सारे इल्जामों से बरी कर दिया. पर तब तक उनका राजनैतिक जीवन लगभग समाप्त हो गया था. बाद में वे केंद्र की राजनीति का हिस्सा बने.
देखा जाए तो यह खोजी पत्रकारिता का पहला मामला कहा जा सकता है जिसकी वजह से किसी बड़े नेता को कुर्सी गंवानी पड़ी थी. इससे अरुण शौरी नेशनल हीरो बन गए थे. तत्कालीन सांसद पीलू मोदी ने बयान दिया था, ‘सोचिये अगर देश में एक की जगह 10 अरुण शौरी हो जायें तो देश के हालात बदल जाएं.’
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