हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू मैरिज एक्ट को लेकर एक बहुत ही अहम फैसला सुनाया है. शीर्ष अदालत ने कहा कि यदि पति-पत्नी की आपसी सहमति से किया गया तलाक का केस अदालत में लंबित है तो उस दौरान उनमें से किसी के भी द्वारा किया गया दूसरा विवाह मान्य होगा. इस मामले में तलाक की अपील लंबित रहने के दौरान पति ने दूसरी शादी कर ली थी, लेकिन पहली शादी के केस में तलाक संबंधी अंतिम निर्णय न आने के कारण हाईकोर्ट में इसे अमान्य करार दे दिया गया था. इसके बाद पति ने हाईकोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी.

दुनिया भर के मुकाबले भारत में तलाक लेने वालों की संख्या काफी कम है, लेकिन यह लगातार बढ़ती भी जा रही है. एक अनुमान के मुताबिक दिल्ली में हर साल साढ़े सात हजार, मुम्बई में नौ हजार और बेंगलुरु में तीन हजार तलाक के केस दर्ज होते हैं. एक अंदाजे के अनुसार भारतीय अदालतों में इस समय तलाक के लगभग 55 हजार केस लंबित हैं. इनमें से कई परस्पर सहमति से किये गये मामले भी हैं जिनमें से कुछ बरसों चल रहे हैं.

कुछ सालों पहले तक तलाक को एक कलंक के रूप में लिया जाता था. साथ ही तलाकशुदा पुरुषों या महिलाओं से कोई शादी भी नहीं करना चाहता था. लेकिन हाल के समय में तलाक और दूसरे विवाह दोनों के प्रति ही समाज का नजरिया काफी सहयोगी हुआ है. खासतौर से महिलाएं अब तलाक की अर्जी देने और दूसरा विवाह करने, दोनों ही मामलों में काफी मुखर हो गई हैं.

हाई कोर्ट के कई वकीलों का कहना है कि तलाक की अर्जी देने वालों में महिलाओं की संख्या पुरुषों से ज्यादा है.विवाह परामर्शदाताओं के अनुसार हाल के समय में तलाक की संख्या बढ़ने के साथ-साथ पति-पत्नी दोनों के ही दूसरा विवाह करने के चलन में भी तेजी आई है. पहले जहां सिर्फ पुरुष ही दूसरा विवाह करने को अहमियत देते थे, वहीं अब महिलाएं भी काफी संख्या में ऐसा करने लगी हैं.

इस बदलाव का सबसे मुख्य कारण है कि अब महिलाओं के लिए तलाक और दूसरा विवाह एक कलंक जैसा नहीं रह गया है. इसके कई कारण नजर आते हैं. एक तो आजकल माता-पिता खुद भी इस बात के लिए तैयार हो चुके हैं कि यदि लड़की ससुराल में पीड़ित है तो उसे एक सीमा के बाद वह सब बर्दाश्त नहीं करना चाहिए. यदि मायके वालों का आर्थिक सहयोग मिलता है तो लड़कियां तलाक का निर्णय और भी आसानी से ले पाती हैं.

दूसरा, शादी को सात जन्मों का रिश्ता मानने वाली सोच में बदलाव हुआ है. अब सात साल क्या, सात महीनों के भीतर भी कभी-कभी तलाक के केस दायर किये जाने लगे हैं. अब तलाक को जीवन खत्म होने की तरह नहीं लिया जाता बल्कि इसे नए जीवन की शुरुआत के तौर पर भी देखा जाने लगा है.

तीसरी बात यह है कि आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर लड़कियों के लिए तलाक का निर्णय, गैरआत्मनिर्भर लड़कियों की अपेक्षा ज्यादा आसान हुआ है. सोच के स्तर पर यह बदलाव हुआ है कि पढ़ी-लिखी लड़कियां अब सब चीजों को भूलकर आगे बढ़ जाना चाहती हैं. नि:संदेह पहले विवाह का खत्म होना लड़कियों को भी भीतर से तोड़ता है, लेकिन अब वे पुरुषों की तरह ज्यादा व्यावहारिक हो रही हैं.

चौथा कारण यह है कि दूसरे विवाह को लेकर समाज में भी कई स्तरों पर सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहे हैं. अब पहले विवाह से हुए बच्चों को दूसरी पत्नी या दूसरे पति द्वारा अपनाने का चलन देखने में आ रहा है. पहले जहां ‘हमारे बच्चे’ से मतलब एक पति-पत्नी के बच्चों से था, वहीं अब दूसरे पति और दूसरी पत्नी के बच्चे मिलकर ‘हमारे बच्चे’ की अवधारणा में शामिल हो रहे हैं.

एक अन्य परिवर्तन यह है कि अब अविवाहित लोग भी तलाकशुदा लोगों के साथ शादी करने में हिचकते नहीं है. समाजशास्त्रियों का कहना है कि शादी की उम्र बढ़ने के कारण लड़के-लड़कियों द्वारा तलाकशुदा लोगों को भी विकल्प के तौर पर देखने का चलन बढ़ा है.

यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट का हालिया फैसला उन सभी महिलाओं और पुरुषों के लिए राहत लेकर आया है जो आपसी सहमति से तलाक लेकर दूसरा विवाह करना चाहते हैं. लेकिन जटिल अदालती प्रक्रिया सालों तक उन्हें ऐसा करने नहीं देती.