तेल की कीमतों में तेजी जारी है. तेल मार्केटिंग कंपनियों ने शुक्रवार को पेट्रोल की कीमतें फिर से बढ़ा दीं. इससे राजधानी दिल्ली में एक लीटर पेट्रोल की कीमत 80.38 रुपये हो गई है और डीजल 72.51 रुपये प्रति लीटर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है. वहीं मुंबई में यह आंकड़ा 87.77 और 76.98 रुपये प्रति लीटर है.

कहा जा रहा है कि अगर केंद्र की मोदी सरकार ने अब भी कुछ नहीं किया को डॉलर के मुकाबले लगातार गोता खा रहे रुपये के चलते तेल की कीमतों में यह बढ़ोतरी आगे भी जारी रह सकती है.

ऐसे में लोग लोग सरकार से पेट्रोल और डीजल पर लग रहे भारी भरकम करों को तुरंत घटाने की मांग कर रहे हैं ताकि इनकी आसमान चढ़ी कीमतों पर काबू पाया जा सके. इसके जवाब में केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का कहना है कि तेल की बढ़ती कीमतों के लिए अंतरराष्ट्रीय कारक जिम्मेदार हैं. उनका कहना है कि ईरान, वेनेजुएला और तुर्की जैसे देशों में जो हालात हैं उन्होंने तेल उत्पादन को प्रभावित किया है. पेट्रोलियम मंत्री के मुताबिक ओपेक देशों ने भी वादे के बावजूद अपना उत्पादन नहीं बढ़ाया है.

हालांकि उनका यह कहना उतना भी सही नहीं लगता क्योंकि पिछले कुछ महीनों से अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें कमोबेश एक दायरे में बनी हुई हैं. यहां तक कि मई में इनकी कीमतें आज के मुकाबले ज्यादा भी रह चुकी हैं. इसके अलावा प्रधान का एक बार फिर से कहना है कि पेट्रोल और डीजल की कीमतें कम करने के लिए पेट्रोल और डीजल को जीएसटी के दायरे में लाना जरूरी है.

कीमतों में बढ़ोत्तरी, इसके खिलाफ विपक्ष के आंदोलन की खबरों और जनता को हो रही परेशानी के बीच कई अहम सवाल पैदा होते हैं. इनमें से सबसे पहला सवाल यह है कि मोदी सरकार के पास महंगे होते पेट्रोलियम उत्पादों से लोगों को राहत देने के लिए किस तरह के विकल्प मौजूद हैं. इसके अलावा दूसरा अहम सवाल यह भी है कि केंद्र ने अभी तक इन विकल्पों पर गौर क्यों नहीं किया है?

पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी के दायरे में लाना

अर्थशास्त्रियों के अनुसार पेट्रोल और डीजल को सस्ता करने के लिए सरकार के पास मुख्यत: दो विकल्प हैं. इनमें से पहला विकल्प वही है जिसकी बात अपने ऊपर आई बला को टालने के लिए धर्मेंद्र प्रधान कह रहे हैं - इन उत्पादों को जीएसटी (वस्तु और सेवा कर) के दायरे में ले आया जाए. इससे केंद्र और राज्यों की कोई भी सरकार इन पर मनमाना टैक्स नहीं लाद सकेगी और दिल्ली और मुंबई में तेल के दाम बराबर हो जाएंगे.

लेकिन ज्यादातर जानकारों को आज के हालात में ऐसा होने की संभावना न के बराबर दिखती है. इसका मुख्य कारण यह है कि केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर अभी पेट्रोल पर 90 फीसदी से ज्यादा और डीजल पर 60 फीसदी तक टैक्स वसूल रही हैं. दूसरी ओर जीएसटी के तहत कर का उच्चतम स्लैब केवल 28 फीसदी ही है जो सरचार्ज आदि मिलाकर 30 फीसदी तक ही हो सकता है.

जानकारों के अनुसार जीएसटी के दायरे में आने पर पेट्रोल से मिलने वाला राजस्व घटकर दो तिहाई जबकि डीजल से प्राप्त होने वाला कर करीब आधा रह जाने का अनुमान है. ऐसे हालात में जब सभी सरकारें अपना कर राजस्व बढ़ाने की भरसक कोशिश कर रही हैं तब पेट्रोल और डीजल को जीएसटी के तहत शामिल करने की उम्मीद करना खयाली पुलाव पकाने जैसी बात ही होगी. केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री शिवप्रताप शुक्ल ने भी पिछले दिनों कहा था कि बिना राज्यों के वित्त मंत्रियों की सहम​ति से पेट्रोल और डीजल को जीएसटी में शामिल करने का प्रस्ताव जीएसटी परिषद में लाना मुमकिन नहीं है. इसलिए जानकारों का मानना है कि पेट्रोल और डीजल के जीएसटी में शामिल होने की तब तक कोई उम्मीद नहीं है जब तक अप्रत्यक्ष कर की यह प्रणाली अपनी पूरी क्षमता के साथ काम न करने लगे.

आलोचकों के मुताबिक तब तक केंद्र और राज्य सरकारें इस प्रस्ताव को न लाने के लिए एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराते हुए टालते रहेंगे. हालांकि कुछ जानकारों का यह भी कहना है कि पेट्रोलियम उत्पादों के लिए ही जीएसटी में नये स्लैब भी बनाये जा सकते हैं ताकि कम से कम पूरे देश में इनके दामों में एकरूपता लायी जा सके. लेकिन फिर यह भी कहा जाता है कि इससे जीएसटी थोड़ा और जटिल हो जाएगा और इसे लाने का उद्देश्य ही खत्म हो जाएगा.

केंद्र और राज्य के करों को कम करना

पेट्रोल और डीजल पर अभी दो तरह के कर - उत्पाद शुल्क और वैट - लगते हैं. उत्पाद शुल्क जहां केंद्र सरकार लगाती है. वहीं वैट राज्यों द्वारा लगाया जाता है लिहाजा हर राज्य में यह अलग-अलग है. मोदी सरकार पेट्रोल पर अभी 20 रुपये से ज्यादा और डीजल पर करीब 16 रुपये का उत्पाद शुल्क वसूल रही है. सरकार का कहना है कि वह इस राशि का इस्तेमाल वित्तीय घाटा कम करने और बुनियादी ढांचा विकसित करने में कर रही है.

संसद के बजट सत्र के दौरान फरवरी 2018 में मोदी सरकार ने लोकसभा को बताया कि वित्त वर्ष 2013-14 में पेट्रोल और डीजल पर लगने वाले उत्पाद शुल्क से उसे केवल 88.6 हजार करोड़ रुपये की आय हुई थी. लेकिन कच्चा तेल सस्ता होने के बाद केंद्र ने जब नवंबर 2014 से जनवरी 2016 तक नौ बार इस पर उत्पाद शुल्क बढ़ाया तो उसकी आय बढ़ती ही चली गई. वित्त वर्ष 2014-15 में पेट्रोल और डीजल से मिलने वाला राजस्व 19 फीसदी बढ़कर 1.06 लाख करोड़ रुपये हो गया. केंद्र के कुल कर राजस्व में इसका योगदान 8.5 फीसदी ही था. लेकिन अगले वित्त वर्ष (2015-16) में यह हिस्सेदारी बढ़कर 12.7 फीसदी (1.86 लाख करोड़ रु) हो गई. वहीं वित्त वर्ष 2016-17 में यह आंकड़ा बढ़ते हुए 14.8 फीसदी (2.53 लाख करोड़ रुपये) तक जा पहुंचा.

यानी कि केंद्र के कुल कर राजस्व में पेट्रोल और डीजल का हिस्सा इतना बड़ा है कि इसे खोने के डर से केंद्र सरकार ही इन उत्पादों को जीएसटी के दायरे में लाना नहीं चाहती. ऐसे में वह चाहे तो दो उपाय आजमा सकती है. पहला उत्पाद शुल्क में कटौती करना और दूसरा विभिन्न राज्यों के वैट को कम करवाना.

केंद्रीय वित्त मंत्रालय के एक अधिकारी के अनुसार पेट्रोल और डीजल पर लगने वाले एक रुपये के उत्पाद शुल्क से केंद्र को एक साल में करीब 15,000 करोड़ की आय हो रही है. इसका मतलब यह हुआ कि यदि इस उसने उत्पाद शुल्क में सिर्फ दो से चार रुपये की कटौती की गई तो इससे केंद्र सरकार को 20 से 40 हजार करोड़ रुपये तक का नुकसान हो सकता है.

अर्थशास्त्रियों के अनुसार केवल उत्पाद शुल्क घटाने के फैसले से वित्त वर्ष 2018-19 में केंद्र का वित्तीय घाटा 3.3 फीसदी के तय लक्ष्य को पार करते हुए 3.6 फीसदी तक जा पहुंचेगा. अगर उत्पाद शुल्क में कटौती के बाद भी केंद्र वित्तीय घाटा को तय सीमा में रखना है तो उसे अपने खर्च में 20 से 40 हजार करोड़ रुपये की कटौती करनी होगी. जानकारों के अनुसार आम चुनाव से ठीक पहले किसी सरकार द्वारा ऐसा सोच भी पाना बेहद मुश्किल है. और ऐसा करने से मौजूदा वित्त वर्ष में विकास दर के अपेक्षा से कम रहने का खतरा भी पैदा हो सकता है.

मोदी सरकार के पास तेल की कीमतें कम करने के लिए दूसरा विकल्प यह है कि वह राज्यों को वैट घटाने के लिए मनाने की कोशिश करे. आलोचकों का मानना है कि देश के 20 राज्यों और 64 फीसदी आबादी वाले इलाके पर एनडीए का शासन होने के चलते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यदि चाहें तो ऐसा हो सकता है.

एक अध्ययन के अनुसार वैट की भारी-भरकम दरों की वजह से कई राज्यों की कुल आय में पेट्रोल और डीजल की हिस्सेदारी केंद्र से भी ज्यादा है. इसके मुताबिक देश के सभी 36 राज्यों में पेट्रोल पर लागू वैट का औसत अभी 26 फीसदी है और डीजल पर 18.5 फीसदी. लेकिन पेट्रोल पर 18 राज्य और डीजल पर 13 राज्य इस औसत से ज्यादा कर वसूल रहे हैं. महाराष्ट्र में पेट्रोल पर 40 फीसदी से ज्यादा वैट वसूला जा रहा है. जबकि आंध्र प्रदेश में डीजल पर 28.50 फीसदी वैट लिया जा रहा है. ऐसे में अगर नरेंद्र मोदी केवल भाजपा शासित राज्यों को ही वैट की दर घटाने के लिए तैयार कर लेते हैं तो इससे अन्य राज्यों पर भी इसे कम करने का दबाव बनेगा.

लेकिन ऐसा किया जाना उतना आसान भी नहीं है क्योंकि वैट घटाने से राज्यों की पहले से खराब वित्तीय सेहत के और पस्त होने की आशंका है. और अंत में इसका भी दबाव केंद्र सरकार पर पड़ सकता है.

कुछ दूसरे विकल्प

कुछ समय पहले केंद्र सरकार का यह भी कहना था कि वह इस बारे में तात्कालिक के बजाय ‘दीर्घकालिक उपाय’ करने की सोच रही है. हालांकि उन्होंने ऐसे किसी उपाय के बारे में अब तक कोई जानकारी नहीं दी. बस यह जरूर कहा है कि सरकार ऐसे उपाय खोज रही है जिससे जनता को तेल के मूल्यों में होने वाली घट-बढ़ से हमेशा के लिए निजात मिल जाए. उनके बयान का यह मतलब भी निकाला जा रहा है कि सरकार शायद अगले चुनाव तक पेट्रोल और डीजल के मूल्यों में होने वाले रोजाना के संशोधनों पर रोक लगा दे.

वहीं कुछ जानकारों का दावा है कि केंद्र सरकार उत्पाद शुल्क घटाने के बजाय तेल कंपनियों पर अंकुश लगाने की सोच रही है. इसके तहत भारत में कच्चा तेल निकालने वाली कंपनियों को इसे अंतरराष्ट्रीय दर पर बेचने से रोका जा सकता है. ऐसा दावा किया जा रहा है कि मोदी सरकार कच्चा तेल निकालने वाली कंपनियों के लिए देश में तेल बेचने की अधिकतम कीमत 70 डॉलर प्रति बैरल तय कर सकती है. दुनिया के कई देशों में पहले से ऐसे नियम हैं. ब्रिटेन ने 2011 में उत्तरी सागर से निकलने वाले तेल और गैस पर कर लगाते हुए तेल का अधिकतम मूल्य 75 डॉलर तय कर दिया था. भारत में 2008 में ऐसे कर का प्रस्ताव आया था लेकिन निजी कंपनियों के भारी विरोध के चलते मनमोहन सरकार ने इसे लागू नहीं किया था.

सूत्रों का यह भी दावा है कि सरकार ऑइल मार्केटिंग कंपनियों का मुनाफा मार्जिन भी कम करने पर विचार कर रही है. हालांकि इस फैसले से तेल विपणन कंपनियों की सेहत खराब होने की आशंका है जो लंबे समय में नुकसानदेह हो सकता है.

लेकिन इन सभी परेशानियों के बावजूद मोदी सरकार को कुछ भी करके कुछ ही समय में तेल के दाम कम करने ही पड़ेंगे. इसकी सबसे बड़ी वजह इसी साल होने वाले चार राज्यों के और अगले साल होने वाले आम चुनाव हैं.

केयर रेटिंग्स ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि पेट्रोलियम उत्पादों के महंगे होने से देश की खुदरा महंगाई पहले के अनुमान से आधा फीसदी ज्यादा रह सकती है. जानकारों के अनुसार चुनावों से पहले इस आशंका ने भी केंद्र सरकार की चिंता काफी बढ़ा दी है.