इस संग्रह की कहानी ‘पहले प्रेम की दूसरी पारी’ का एक अंश :

‘वह एक लंबी पारी खेलना चाहता है. पुराने प्यार की दूसरी पारी. उसने पासा फेंका -
‘ये रंग तुम पर अच्छा लगता है.’
‘ओह! हां, उन्हें बहुत पसंद है. बल्कि नीले रंग के सारे शेड्स. आसमानी, फ़ीरोज़ी, नेवी. उफ़्फ़! दर्जनों साड़ियां...मानते ही नहीं.’

तो ये रंग इसलिए नहीं कि उसे पसंद है. छनाक-छनाक कुछ चटख गया...

...उधर तिपहिया से उतरकर ‘वह’ लगभग दौड़ती हुई घर पहुंची... उसका मन अब तक कनॉट प्लेस के रेस्त्रां के उसी कोज़ी कॉर्नर में सिकुड़ा-सा बैठा है. उसके चेहरे पर अवसाद और संताप की एक ग़र्द-सी चढ़ गई है...घड़ी नौ बजा रही है. ‘वो’ बस आते ही होंगे. उसने बड़ी तत्परता से उठकर डायरी को वापस अपनी जगह पर रखा और उस इकलौती नीली साड़ी को नेप्थलीन की गोलियों के साथ पॉलिथीन में सहेज दिया.

गु़सलख़ाने में वह देर तक अपना चेहरा धोती रही. अब वहां आंसू, संताप या अवसाद के कोई लक्षण नहीं हैं.’


कहानी संग्रह : अनुपमा गांगुली का चौथा प्यार

लेखिका : विजयश्री तनवीर

प्रकाशक : हिन्द युग्म प्रकाशन

कीमत : 115 रुपये


हममें से ज्यादातर लोग जब भी किसी नए रिश्ते को जीना शुरू करते हैं तो जल्द ही उसे कोई न कोई नाम देना चाहते हैं. हालांकि हम रिश्तों को परिभाषित करने की चाहे कितनी भी जल्दबाजी करें, लेकिन अक्सर ही बहुत सारे रिश्ते बेनाम ही रह जाते हैं. कई बार ऐसा भी होता है कि उन अनाम रिश्तों का कोई ऐसा नाम सूझता ही नहीं जो उस रिश्ते की व्यापकता को समेट सके. ऐसे बेनाम और गुमनाम रिश्तों की उम्र चाहे बहुत छोटी होती हो, लेकिन इसके बावजूद ये अपने जीने वालों के जीवन और जेहन में बहुत गहरी तस्वीर छोड़ जाते हैं. इस कहानी संग्रह की कहानियां भी ऐसे ही बेनाम रिश्तों के इर्द-गिर्द बुनी गई हैं. विजयश्री तनवीर की ये कहानियां आम लोगों के उन अनाम रिश्तों को बहुत ही करीब से जाकर पढ़ती हैं, उन्हें गुनती-बुनती हैं और उनकी गर्माहट को ठीक उसी तापमान में परोसने में सफल होती हैं.

इस कथासंग्रह की शीर्षक कहानी ‘अनुपमा गांगुली का चौथा प्यार’ एक स्त्री के भोलेपन के चरम को बहुत ही सादगी लेकिन गहराई से दर्शाता है. यह ऐसा अनाम प्यार है जिसका किसी भी तरफ से इकरार नहीं हुआ, लेकिन जिससे इंकार भी नहीं किया जा सकता. लेखिका लड़कियों/स्त्रियों की इस दिमागी बुनावट को बखूबी पहचानती हैं जिसमें वे बिना किसी ठोस बुनियाद के ही खुद को इश्क के दरिया में डूबने के लिए उतार देती हैं. किसी पुरुष के द्वारा सहज भाव से दिए गए जरा से सहयोग के चलते ही बहुत बार स्त्रियां प्रेम के तीव्र आवेग की स्थिति में पहुंच जाती हैं. इसी भाव की यह बहुत खूबसूरत कहानी है. प्रेम और नैतिकता के द्वंद में फंसी नायिका के खुद से संवाद का एक टुकड़ा –

‘दिन पहाड़-सा होता है. उस सलोने आदमी को देखे बिना एकदम फीका और बेरंग.

बाहर की सयानी औरत को यह उद्विग्नता फ़िजूल लगती है. उसने डपटकर कहा, ‘कैसा फितूर है, तुम्हें उसके सिवा कुछ सूझता भी है?’

‘नहीं सूझता’ प्रेमिका ढीठ और बेफ़िक्र है.

‘मैं उसके प्रेम में हूं.’

‘चौथी बार!’ सयानी औरत विद्रूपता से मुस्कुराने लगती है.

‘क्या हर्ज है?’

प्रेयसी मोहब्बत के फ़लसफ़े जानती है. उसे जिरह-पैरवी से गुरेज़ नहीं.

‘अगर एक बार, तो चौथी बार क्यों नहीं? सही पात्र न मिले तो सौ बार भी लाज़िम है.’

समाज में टूट रही यौन वर्जनाएं एक साथ कई स्तरों पर विवाह, परिवार और परिवेश को प्रभावित कर रही हैं. इन्हीं भावों के इर्द-गिर्द बुनी कहानी ‘खिड़की’ एक बहुत ही सधी हुई प्रतीकात्मक कहानी है. यहां खिड़की पूरे समाज में चल रहे अनैतिक यौन रिश्तों को देखने का जरिया है. कहानी काफी संक्षिप्त बयान करते हुए भी पूरे परिवेश का बहुत ही स्पष्ट चित्र बनाने में सफल होती है और अपने पीछे एक गहरी छटपटाहट छोड़ जाती है. खिड़की से झांकने वाली नायिका समाज में चल रहे संबंधों के अनैतिक व्यापार से इतनी क्षुब्ध है कि अंततः वह खिड़की को पूरी तरह बंद करवा देती है. इसी मौके का वर्णन करते हुए लेखिका लिखती हैं –

‘महीनों बाद मैं रात के वक़्त आज फिर खिड़की पर खड़ी हुई थी...अंधेरे में डूबे मनचंदा के कमरे की बत्ती भक से जली और अगले ही पल बुझ गई. मगर उस एक पल में मुझ पर सैकड़ों बिजलियां टूट पड़ीं...मैंने जो देखा वो मेरे लिए अविश्वसनीय और अकल्पनीय था. मैंने देखा दो दुबली कच्ची बाजुएं राधिका मनचंदा की नग्न छातियों के गिर्द लिपटी हुई हैं...

मैं निष्प्राण कदमों से सीढ़ियां उतरती हुई गुंजन के कमरे में जा पहुंची. वह गहरी नींद में था...मुझे लगा वह नवजात शिशु बन जाए और मैं उसे फिर अपने गर्भ में छिपा लूं...

...राजमिस्त्री ने फीते से नाप-जोख करते हुए पूछा,

‘एक रोशनदान की जगह छोड़ दूं?’

मैंने एक गहरी सांस छोड़ी जो एक अर्से से रुकी हुई थी और बिना एक पल सोचे कहा, ‘नहीं एक सुराख़ भी नहीं.’

लेखकों द्वारा ऐसी बहुत सी रचनाएं लिखी जाती हैं जहां वे स्त्री पात्रों का इतना बारीक विश्लेषण करते हैं कि अक्सर ही उनकी ‘स्त्री संवेदी’ छवि बन जाती है. लेकिन व्यवहार में वे लेखक स्त्री संवेदी जरा भी नहीं होते. विजयश्री ऐसे ही लेखकों की पोल खोलती हैं. अपनी कहानी ‘खजुराहो’ के माध्यम से वे बताती हैं कि स्त्री-विमर्श पर या स्त्रियों के मनोविज्ञान को समझकर लिखना और उनके साथ संवेदनशील व्यवहार करना दो बिल्कुल ही अलग बातें हैं. यह कतई जरूरी नहीं कि जो लेखक स्त्रियों के मनोविज्ञान को बहुत गहराई से समझता और लिखता हो वह असली जीवन में भी उनके साथ वैसे ही पेश आता हो. इसी मनोभाव को व्यक्त करते हुए ‘खजुराहो’ कहानी की नायिका एक जगह लिखती है –

‘भला कोई जान भी पाएगा कि यह शब्दों का जादूगर अपनी असल ज़िंदगी में कितना क्रूर, कितना निर्मम, कितना ख़ुदग़र्ज़ है. आधी रात जिस समय उनके आत्मीय स्पर्श के लिए उसका शरीर और मन करवटें बदलते हैं, वे बड़े यत्नों के साथ बेफ़िक्र अपनी कल्पनाओं से कोई सुगंधा, अनामिका या मानसी गढ़ रहे होते हैं. अपने किरदारों की कृत्रिम संवेदनाओं को गहरे छू जाने वाले किसी क़िस्से में उतार रहे होते हैं, अपनी ख़ुद की पत्नी की संवेदनाओं और चाहनाओं से नितांत बेखबर. और दंभ दुनियाभर की औरतों को जान लेने का. अपने काल्पनिक पात्रों की अनुभूतियों को महसूसते हुए उनकी ख़ुद की अनुभूतियां भोथर हो चली हैं. अगर वह अनिकेत की पत्नी न होती तो शायद इन्हीं मूर्ख औरतों में से ही एक होती.’

अपने इस पहले कथासंग्रह के साथ विजयश्री तनवीर ने कहानी की दुनिया में जो आगाज किया है, वह खूब उम्मीदें जगाता है. पहले ही संग्रह से यदि उम्मीदों का भार लेखिका/लेखक के कंधों पर बढ़ जाए तो यह उनके लिए बहुत ही सकारात्मक संदेश है. ये कहानियां बड़े ही मनोवैज्ञानिक ढंग से अपने पात्रों और घटनाओं का सूक्ष्म विश्लेषण करती हैं. यह सूक्ष्म विश्लेषण ही इन कहानियों की जान है. विजयश्री एक बेहद पेशेवर मनोवैज्ञानिक की तरह अपने पात्रों के क्षणिक, स्थाई, तीव्र मनोभावों को पकड़ने में सफल होती हैं. पाठक बहुत जगह इन कहानियों में खुद को पाएंगे और अपने जीवन के उन अनाम और गुमनाम रिश्तों के मीठे-मीठे अहसासों को फिर से जिंदा होता हुआ महसूस करेंगे.

कहीं-कहीं पाठक खुद को लेखिका द्वारा रंगे हाथों पकड़े जाने जैसा भी महसूस कर सकते हैं. यह अहसास उन्हें गुदगुदाएगा और फिर से अतीत या वर्तमान के उन गोपनीय लम्हों में जाने को विवश करेगा. ये कहानियां स्त्री-पुरुष दोनों के ही मनोविज्ञान को बहुत बारीकी से समझती हैं. हर इंसान के जीवन में आने वाले असंख्य क्षणिक,अस्थाई, लेकिन तीव्र मनोभावों को पकड़ती और फिर उसी तीव्रता से अभिव्यक्त करती ये बहुत ही प्यारी कहानियां हैं.