इन पंक्तियों के लिखे जाने के समय हम अपने प्यारे लोकतंत्र की एक भयावह विडंबना के सामने हैं. लोकतांत्रिक राज्य असहमति को क्रूरता से दबाने पर उतारू है. पुणे पुलिस ने कथित रूप से संदिग्ध और अपर्याप्त साक्ष्य के आधार पर पांच असहमत और विख्यात सामाजिक कार्यकर्ताओं को शहरी नक्सलवादी मानकर गिरफ़्तार किया है. सर्वोच्च न्यायालय ने यह कहते हुए कि ‘असहमति लोकतंत्र का सेफ़्टीवाल्व है’ इस गिरफ़्तारी को घर पर नज़रबंदी तक सीमित रखने का आदेश दिया है और केंद्र और महाराष्ट्र की सरकारों को नोटिस जारी किया है. न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि अगर ऐसे सेफ़्टीवाल्व की इजाज़त नहीं हुई तो प्रेशर कुकर फट जायेगा.

इस समय की अनेक सरकारों को अपनी निरंकुश आज़ादी इस क़दर रास आ रही है कि वे अपने से अलग या विरुद्ध सोचनेवालों का दमन करना अपना लोकतांत्रिक अधिकार मानने लगी हैं. यों तो सभी क़िस्म की राजसत्ताएं मुश्किल से असहमति को बरदाश्त कर पाती हैं पर इधर कुछ बरसों से असहमति को देशद्रोह, राष्ट्रविरोधी, असह्य आदि क़रार देने की वृत्ति तेज़ी से बढ़ी-फैली है. नयी दुर्घटना उसका एक ताज़ा दुर्भाग्यपूर्ण उदाहरण है. ऐसा लग रहा है कि अब लोकतंत्र की चौकसी करने का काम राज्य या मीडिया नहीं न्यायालय ही कर पा रहा है. यह राज्य के साथ मीडिया के नैतिक और लोकतांत्रिक अधपतन का भी एक विचलित करनेवाला लक्षण है.

इस विडंबना के कई पक्ष हैं. विकास दर बढ़ रही है पर कई तरह की असमानताएं और अन्याय भी साथ-साथ बढ़ रहे हैं. कुछ ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि अगर प्रगति करना है तो असहमति और विरोध को दबाना ज़रूरी है. अपनी लोकतांत्रिक मर्यादा का लोकतांत्रिक राज्य ही पूरी हेकड़ी से उल्लंघन करता चले और इसको मान लिया जाये ऐसी मानसिकता को बढ़ावा मिल रहा है. बावजूद सर्वोच्च न्यायालय की सख़्त हिदायतों के गोरक्षा के नाम पर पीट-पीटकर मारे जाने की घटनाएं अब भी रोज़ हो रही हैं. दलितों, स्त्रियों और अल्पसंख्यकों के विरुद्ध अन्याय, प्रहार आदि भी रोज़ाना हो रहे हैं. सिविल सेवाएं, पुलिस, अनेक सार्वजनिक संस्थाएं आदि अपनी निष्पक्षता और नैतिक ज़िम्मेदारी से विरत होते जा रहे हैं.

चूंकि मामला न्यायालय के विचाराधीन है उस पर कुछ और कहना उचित न होगा. पर इतना तो साफ़ दिखायी दे रहा है कि हमारे लोकतंत्र में असहमति ख़तरे में है, बावजूद इसके कि असहमति का होना ही लोकतंत्र के सशक्त और अटल होने का प्रमाण होता है. एक और स्तर पर यह संकट व्यापक भारतीय समाज का संकट भी है. एक ऐसे समाज का जो अब तक मतों-आस्थाओं-विश्वासों आदि की बहुलता से ही अपनी प्राणशक्ति ग्रहण करता रहा है. उसकी रंगारंग विविधता धूसर हो जायेगी अगर उसने असहमति के इस सत्ता-अस्वीकार को अपनी सहमति या समर्थन भी दे दिया. इस समय सिर्फ़ सिविल समाज को ही नहीं समूचे भारतीय समाज को सजगता और नैतिक ज़िम्मेदारी से असहमति के पक्ष में एकजुट होना चाहिये.

रेखा जैन का ‘यादघर’

सूर्य प्रकाशन मंदिर बीकानेर द्वारा प्रकाशित रेखा जैन का संस्मरण-वृत्तांत ‘यादघर’ इस मायने में अनोखा है कि उसमें संस्मरणों के माध्यम से एक सामान्य परिवार में जन्मी, 12 बरस की उम्र में विवाहित स्त्री की जीवनगाथा और संघर्षगाथा अत्यन्त रोचक और आत्मीय ढंग से कही गयी है. इस बहाने आगरा के रावतपाड़ा से लेकर शुजालपुर, कलकत्ता,बम्बई, इलाहाबाद और दिल्ली में बिताये बरसों का, पारिवारिक जीवन और सार्वजनिक सक्रियता का, उस समय के इप्टा जैसे प्रमुख आंदोलनों का बखान है. बाद में बालरंगमंच से जुड़ाव और विदेश यात्राओं का. रेखा जी अपने पति नेमिचन्द्र जैन के साथ साहित्य, संगीत, नृत्य, रंगमंच आदि अनेक कलाओं के भारतीय संसार में गहरे रमी रहीं और उस दौरान उनका परिचय और संगसाथ कई हस्तियों से हुआ जिनमें मुक्तिबोध, शमशेर, अज्ञेय, शम्भु मित्र, तृप्ति मित्र, शान्ति वर्धन, ब व कारंत आदि से हुआ और रहा. उन सबकी बहुत दिलचस्प शबीहें भी बीच-बीच में गुंथी हुई हैं. पुस्तक में बिरले छायाचित्रों की क़तार सी है.

रेखा जी की यात्रा निपट औसत साधारणता से शुरू होकर गुरुस्थानीय होने तक, घरेलूपन से लेकर सांस्कृतिक सार्वजनिकता तक, लोकगीत संगीत से लेकर बालरंगमंच तक की रही है. उसमें जो उतार-चढ़ाव आये, जो विडम्बनाएं उभरीं, कठिनाइयां पेश आयीं, राजनीति ने संस्कृति को प्रभावित किया. उस सबका अन्तरंग लेखा-जोखा इस पुस्तक में है. रेखा जी लोगों पर फ़ैसला नहीं देतीं और न ही कभी इतना निराश होती हैं कि निष्क्रियता अपना लें. वे सब कुछ को स्वाभाविक, कभी वत्सल, कभी हिस्सेदार, नज़र से देखतीं और अपनी स्मृति में दर्ज़ करती रहीं. यह निजी और पारिवारिक वृत्तांत है पर उस दौरान सांस्कृतिक जीवन में जो महत्वपूर्ण घटा उसका सूक्ष्म और सजग बखान भी. यह देखकर अचरज होता है कि अभी कुछ समय पहले तक सांस्कृतिक जीवन में सहयोग-सौहार्द्र-सहकार का सहज खुला हुआ माहौल था और उसमें ईर्ष्या-स्पर्धा के बावजूद कटुता और इतना ज़हर नहीं था जो अब दिखायी देता है.

अपने जीवन के उत्तरकाल में पहली बार नेमिजी और रेखा जी का अपना घर हुआ भारती आर्टिस्ट कालोनी में. उनकी ज़्यादातर जिन्दगी किराये के मकानों में बीती थी. उन्होंने जंगपुरा में जब अपना किराये का मकान छोड़ा तो उन्हें लगा कि ‘प्राणियों, पड़ोसियों की बात तो अलग उस घर की खिड़कियां, दीवारें, अलमारियां तक जैसे मुझसे प्यार करती थीं. खाने की मेज़ के पास की अलमारी, जिसमें से हर आनेवाले को खोलकर कुछ भी खाने का अधिकार था. वह अपने खाने के अधिकार से वंचित न रह जायें, इसलिए उस अलमारी में सभी तरह की चीज़ें सभी की रुचि को ध्यान में रखकर रखती थी. जीवन में उस अलमारी से अलग होने की कल्पना तक मैंने नहीं की थी. ‘... मैं खुद कमज़ोर दिल की रही हूं. घर तो घर, एक ज़माने में अपनी गुड़ियों तक से बिछुड़ने ने मुझे परेशान कर दिया था.’

नयी धार्मिकता

अच्छे दिन आये हों या नहीं, कम से कम एक क़िस्म की नयी धार्मिकता दिन-ब-दिन खूब प्रगट, हृष्ट-पुष्ट और सक्रिय हो रही है. इसका कोई राजनैतिक वायदा तो नहीं किया गया था. बिना किसी घोषणा के पर बेहद सुनियोजित ढंग से वह बढ़ रही है. इस नयी धार्मिकता का पहला सूत्र यह है कि हमारा धर्म सबसे ऊंचा और श्रेष्ठ है और अन्य सभी धर्म नीचे और त्याज्य हैं. उन्हें इस देश में उन्हीं शर्तों पर रहने दिया जा सकता है जो हम तय करें. यह धार्मिकता पूरी मुस्तैदी और मुनासिब बेरहमी से यह तय करती है कि इन ‘दोयम दर्ज़े’ के धर्मों के अनुयायियों को किन मर्यादाओं में रहना पड़ेगा, स्वयं वह मर्यादाहीन है- परम स्वतंत्र न सिर पर कोऊ. इस धार्मिकता का भारतीय परम्परा, धर्म, शास्त्र, मानवीयता आदि से कुछ लेना-देना नहीं है.

इस नयी धार्मिकता का अस्तित्व संविधान से परे या ऊपर है. वह स्वयं क़ानून बनाती और उन्हें आक्रामक ढंग से लागू करती है. यह धार्मिकता स्वयं अपनी विधायिका है. देश के सर्वोच्च न्यालय के प्रतिकूल और सख़्त निर्देशों का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता. यह आकस्मिक नहीं है कि पीट-पीटकर मारने याने लिंचिंग की घटनाएं बाक़ायदा ज़ारी हैं. संविधान ने स्वतंत्रता-समता-न्याय की जो मूल्यत्रयी और उनके माध्यम से एक नए सामाजिक धर्म का प्रस्ताव किया है, उसका यह धार्मिकता दिनदहाड़े उल्लंघन करना अपनी नैतिक ज़िम्मेदारी मानती है.

यह शायद हमारी भारतीय परम्परा में पहली बार हो रहा है कि एक ऐसी धार्मिकता उभार पर है जो हिंसा को अपने वर्चस्व, विस्तार और अस्तित्व के लिए अनिवार्य मानती है. यह कुछ-कुछ उसी तर्ज पर है कि ‘वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति.’ इस धार्मिकता का दूसरा नियामक तत्व है भय– उसे फैलाना, उसका आतंक पैदा करना. हिंसा और भय की नयी आचरण-संहिता ही उसे रच और निर्धारित कर ली है. तीसरा नियामक तत्व है- असहमति के प्रति शून्य सहिष्णुता. चूंकि उसकी मूल प्रेरणा इस आत्मविश्वास से आती है कि सत्य उसके पास है, सत्ता भी उसके पास है. उससे असहमत होने का अधिकार किसी को नहीं है. इसलिए हर तरह से वाचिक और शारीरिक दोनों तरफ से वह असहमति को कुचलने का प्रयत्न करना अपना नैतिक कर्तव्य मानती है.

इस धार्मिकता का एक पहलू इसकी अदम्य आत्मरति भी है. और धार्मिकताओं की तरह इसकी कोई दिलचस्पी आत्म के अतिक्रमण में नहीं है. यह किसी विराट सचाई से तदाकार होने के प्रपंच में नहीं पड़ती. इसकी आस्था है कि वह विराट सच्चाई है. इसलिए उसकी मांग अपार भक्ति की है, उसके प्रति सम्पूर्ण समर्पण की. यह धार्मिकता इस अर्थ में थोड़ी विचित्र है उसके केन्द्र में कोई देवता या ईश्वर नहीं है. वह सच पर नहीं अफ़वाह पर भरोसा करती है. हमारा भाग्य या दुर्भाग्य है कि हम अपने समय में इस धार्मिकता को उभरते,सफल-सशक्त और व्याप्त होते लगभग निरुपाय देख रहे हैं.