प्रेम के अंतरंग पलों के दरमियान क्या धनिए का कोई महत्व हो सकता है? जिसकी हरी पत्तियों को हम महीन काटकर सब्जियों के ऊपर गार्निश करने के काम में लेते हैं, क्या वो धनिया दूर खड़े दो प्रेमियों को बेहद कलात्मक अंदाज में करीब ला सकता है? मास्टर शेफ संजीव कपूर या यूट्यूबर निशा मधुलिका जी से आप पूछेंगे तो वे साफ इंकार कर देंगे! लेकिन अगर ‘वन्स अगेन’ देखेंगे, तो पता चलेगा कि धनिया और उसकी खुशबू भी प्रेम करने वाले वयस्कों के लिए लाल गुलाब हो सकती है.

कुछ फिल्में ऐसे ही अपनी इमेजरी से चौंकाती हैं. वे कहानी देखने की आपकी ललक से आगे बढ़कर कविता की तरह इन्टिमेट हो जाती हैं. उन्हें एक अनुभव की तरह जीने का मन करता है न कि अच्छी, बहुत अच्छी, थोड़ी और अच्छी होती तो अच्छा होता के फेर में पड़कर देखने-परखने का. ऐसी फिल्में खुद को हर दर्शक की पसंद अनुरूप ढालने की कोशिश भी नहीं करतीं, इसलिए अगर आप बतौर दर्शक प्रयास थोड़ा-सा अधिक कर लेते हैं तो बदले में ऐसा सिनेमा मिलता है जो कि एकांत में पढ़ी जाने वाली किताबों बराबर सुख देता है.

नेटफ्लिक्स पर हाल ही में रिलीज हुई ‘वन्स अगेन’ इन सब खासियतों को ओढ़े दो प्रौढ़ प्रेमियों की इन्टिमेट दास्तान है. अमर और तारा पास तो आ जाते हैं, लेकिन साथ आने में खुद भी हिचकते हैं और समाज भी उनके सपनों को कुचलने से चूकता नहीं है. कहानी के लिहाज से फिल्म रितेश बत्रा की बेमिसाल ‘द लंचबॉक्स’ (2013) से काफी करीब की फिल्म है, बस कि कहानी कहने का रास्ता दूसरा चुनती है. भोजन की खूबसूरती यहां भी पूरे शबाब पर है लिहाजा उस स्तर की गहराई व खतों के माध्यम से बयां फिलॉसफी यहां नहीं मिलती. लेकिन जिस ठहराव का तोहफा इरफान खान के किरदार साजन फर्नांडिस ने ‘द लंचबॉक्स’ को दिया था, यहां उसी दर्जे का दुर्लभ ठहराव कहानी कहने के तरीके व नीरज कबी के अभिनय की वजह से फिल्म का स्तर ऊंचा उठाता है.

वयस्कों का संजीदा प्यार परदे पर अभिव्यक्त करना वैसे भी आसान नहीं होता. सिनेमाई चकाचौंध उसमें होती नहीं है और पटकथा का खांचा भी कॉन्फ्लिक्ट्स के नाम पर केवल घर-परिवार व समाज की घिसी-पिटी नाराजगी को ही कहानी में ढालने का आदी होता है. इस वजह से बचता केवल प्यार का ट्रीटमेंट है जो कि अगर सुघड़ता से किया जाए तो फिल्म को सजीव कर देखने वाले के एकदम करीब ला देता है. ‘वन्स अगेन’ में यह ट्रीटमेंट प्रेम के उस ठहराव का है जो हमने देखना, सुनना तो छोड़िए महसूस तक करना बंद कर दिया है. बिस्तर पर पहुंचने को आतुर प्यार वाले इस दौर में (कश्यप जिसे अपनी अगली पिक्चर में ‘फ्यार’ कह रहे हैं) इसीलिए ‘वन्स अगेन’ पर वे आंखें जरूर ठहरेंगी, जो जीवन में और प्रेम में ठहराव ढूंढ़ती हैं. जिनके लिए कहानी के निर्णायक मोड़ पर खत्म होने से ज्यादा जरूरी दो अजनबी पात्रों की इत्मीनान से दिखाई गई यात्रा होती है और उसी में उन्हें फिल्म का मर्म दिखाई भी दे जाता है.

नीरज कबी और शेफाली शाह इस ठहराव वाले प्यार को आप तक पहुंचाते भी बड़े प्यार से हैं. दोनों के बीच की बातचीत, चाहे वो फोन पर हो या आमने-सामने, गुजरे वक्त की याद में बनी इस ऑफ-बीट फिल्म की जान बनती है. कई सारे प्यारे मोमेंट्स दोनों मिलकर फिल्म में रचते हैं और एक घोर मैथड एक्टर (कबी) व एक पूर्णत: नैचुरल एक्टर (शाह) के बीच की संगत कभी कोई बेसुरा सुर नहीं छेड़ती.

रेस्टोरेंट चलाने वाली तारा का रोल शानदार अंदाज में निभाने वाली शेफाली शाह की बड़ी-बड़ी आंखें इतनी खूबसूरत लगती हैं, कि अचरज होता है कि आज से पहले जिन फिल्मों व धारावाहिकों में वे नजर आती थीं उनमें आखिर किस की आंखें लगाकर आती थीं! मतलब, बदकिस्मती हमारी ही है कि हमारी फिल्मों ने उनकी आंखों का प्रभावी उपयोग करने में अरसा लगा दिया. ‘वन्स अगेन’ में उनकी आंखें खूब बोलती हैं और चाहे प्यार का भाव हो या गुस्से का, या फिर अपमान का घूंट पीने का और उससे पहले नटखट अंदाज में फ्लर्ट करने का, उनकी आंखों की अभिव्यक्ति संवादों से ज्यादा असरदार सिद्ध होती है. उनकी उपस्थिति भी पूरी फिल्म में इस कदर प्रभावी है कि एक छुटकू से सीन में जब वे सिर्फ गाल पर उतर आए आंसू को हाथ से पोंछती हैं तो वह सीन भी हमें फिल्म खत्म हो जाने के बाद तक याद रहता है.

शाह के बनिस्बत नीरज कबी की आंखें छोटी हैं. लेकिन चूंकि उनके किरदार अमर कुमार की उदासी बहुत बड़ी है, इसलिए अभिनय में पारंगत यह थियेटर एक्टर उसे अपने पूरे चेहरे पर बिछा लेता है. अपनी असरदार बेरीटोन आवाज से कबी किरदार के खालीपन को भी बखूबी व्यक्त करते हैं और प्रेम के हर चरण को चेहरे पर उतारने की उनकी कारीगरी उन्हें फिल्म की ‘सेंटर ऑफ ग्रेविटी’ बनाती है. एक मशहूर अभिनेता के रोल में वे कभी भी अपने किरदार को कैरीकेचर नहीं होने देते और उसे वो गरिमा देते हैं जो उन जैसा संजीदा एक्टर ही एक्टर का किरदार प्ले करते वक्त दे सकता है. इसलिए, अभिनय उनका काबिले-तारीफ है ये कहना तो छोटी तारीफ होगी, असल में नियंत्रित अभिनय की चलती-फिरती कक्षा हैं वे इस फिल्म में.

फिल्म का पार्श्व-संगीत भी निहायत सुंदर है. तबले और बांसुरी जैसे पारंपरिक हिंदुस्तानी वाद्य-यंत्रों के सहारे रचा गया स्कोर दर्जनों मसाला फिल्मों के कर्कश बैकग्राउंड स्कोर से दहले हमारे कान के परदों को सहलाता भी है और फिल्म के कई दृश्यों को यादगार भी बनाता है. नीरज कबी का किरदार जब एक सीन में अपने आलीशान अपार्टमेंट की खिड़की से समंदर को निहारता है तो भले ही हमें उसकी केवल पीठ दिखती है, लेकिन बांसुरी से निकला संगीत बता देता है कि यह उदास आदमी समंदर में शून्यता खोज रहा है. एक दूसरे सीन में जब तारा और वो पहली बार बाजार घूमने निकलते हैं तो यही पार्श्व-संगीत नाराजगी से शुरू हुई उस मुलाकात को रूमानी और खुशनुमा बनाता है.

‘वन्स अगेन’ की सबसे बड़ी कमी इसका अंतिम हिस्सा है. जैसा कि ऊपर वर्णित है, यहां भी मुख्य ‘कॉन्फ्लिक्ट’ के नाम पर केवल घर-परिवार व समाज की घिसी-पिटी नाराजगी ही दिखाई जाती है. वो भी बेहद सतही तरीके से, जो कि रोचकता का अभाव पैदा कर देती है. फिल्म खिंचती इसी हिस्से में है और हम सभी जानते हैं कि जब तक मुख्य कॉन्फ्लिक्ट जोरदार नहीं होता तब तक कोई भी फिल्म क्लाइमेक्स अच्छा नहीं रच पाती. ‘वन्स अगेन’ इसी हिस्से में खुद को काबिल साबित नहीं कर पाई, जिस वजह से कई दर्शकों को अधूरेपन का अहसास भी होगा. वैसे भी हमारे यहां क्लाइमेक्स से मिलने वाली तृप्ति को ही सर्वोपरि मानने का चलन है, वो न मिले तो जनता फिल्म को कमजोर मान बैठती है.

‘वन्स अगेन’ लेकिन,कमजोर फिल्म नहीं है. बस अपने आखिरी हिस्से में मजबूत नहीं है. इसलिए फिल्मों को तुरंत नकार देने वालों को कम प्रभावित भले करे लेकिन संयम और सिनेमा को पर्यायवाची मानने वाले सिनेप्रेमियों को पसंद आएगी. जैसे कि हमें आई!