नक्सलवाद की चुनौती धीरे-धीरे कमज़ोर पड़ रही है. इस बात का संकेत केंद्रीय आरक्षित पुलिस बल (सीआरपीएफ) की एक आंतरिक रिपोर्ट से मिलता है. द टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक इस रिपोर्ट से पता चलता है कि नक्सलियों में शीर्ष नेताओं के प्रति असंतोष बढ़ रहा है. इसलिए वे आत्मसमर्पण की राह अख़्तियार कर रहे हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक 2017 में 1,888 नक्सली पकड़े गए थे. जबकि 685 नक्सलियों ने आत्मसपर्मण किया था. वहीं 2018 में अब तक 1,178 नक्सली पकड़े गए और 359 आत्मसमर्पण कर चुके हैं. ऐसे ही स्थानीय आदिवासियों का रुझान भी अब नक्सलवाद के बजाय पुलिस व सुरक्षा बलों में शामिल होने की तरफ बढ़ा है. मसलन- अभी हाल में सीआरपीएफ ने ही अपनी बस्तरिया बटालियन (स्थानीय आदिवासियों की पलटन) के 188 पदों के लिए आवेदन आमंत्रित किए थे. इसके लिए 8,000 से अधिक आवेदन मिले हैं.

बताया जाता है कि नक्सलियों के निचले कैडर में ख़ास तौर पर अपने नेतृत्व के प्रति असंतोष और असहमति दोनों में वृद्धि हो रही है. इसके दो-तीन प्रमुख कारण हैं. पहला- ज़्यादातर समूहों का नेतृत्व अब भी पुराने और वरिष्ठ नक्सली कमांडरों के हाथ में है. युवाओं का नेतृत्व का मौका या तो कम मिल रहा या बिल्कुल भी नहीं. दूसरा- बड़े नेता अक़्सर अच्छा जीवन जीते हैं और निचले कैडर के लोगों काे मुश्किल अभियानों की तरफ धकेलने की कोशिश करते हैं. युवाओं की बातों, उनके सुझावों को ज़्यादा तवज्ज़ो भी नहीं देते.

इन्हीं कारणों से युवा और निचले स्तर के कार्यकर्ता मुश्किल अभियानों में जाने से बचने लगे हैं. नक्सलियों की सशस्त्र इकाई- पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) के पास हथियारों और गोला-बारूद की भी कमी हो रही है. इस बाबत वरिष्ठ कमांडरों को जानकारी है. मगर बताया जाता है कि वे इस तरफ ध्यान नहीं दे रहे हैं. आत्मसमर्पण कर चुके जम्पन्ना और पहाड़ सिंह जैसे शीर्ष नक्सलियों से यह भी पता चला है कि उनका नेतृत्व आंदोलन की मूल विचारधारा (आदिवासी और शोषित वर्गों का हित) से भी हट गया है.