बिहार में अभी भारतीय जनता पार्टी की तीन सहयोगी पार्टियां हैंः नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू), रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी और उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी. 2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा के साथ जेडीयू नहीं थी. लेकिन राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) और जेडीयू के अलग-अलग चुनाव लड़ने की वजह से भाजपा और उसके सहयोगी दलों लोजपा और रालोसपा ने मिलकर 40 में से 30 से अधिक सीटों पर कामयाबी हासिल की थी.

अब जेडीयू भी भाजपा के साथ है. ऐसे में चारों पार्टियों के बीच सीटों का बंटवारा बेहद मुश्किल हो गया है. कारण? इसके पहले जब भी भाजपा जेडीयू के साथ रही है उसकी हैसियत बिहार के अंदर जूनियर पार्टनर की रही है. इस नाते जदयू अधिक सीटों पर और भाजपा कम सीटों पर चुनाव लड़ती आई है.

लेकिन इस बार स्थिति अलग है. 20 से अधिक लोकसभा सीटों पर भाजपा के सांसद हैं. बागी तेवर अपनाए हुए शत्रुघ्न सिन्हा और कीर्ति आजाद की सीटों को अगर हटा भी दें तो भाजपा को अपने सभी मौजूदा सांसदों को चुनाव लड़ाने के लिए 20 सीटें चाहिए होंगी. अगर ऐसा होता है तो बची हुई 20 सीटों का बंटवारा तीनों सहयोगियों जेडीयू, लोजपा और रालोसपा के बीच करना होगा. इसमें कोई भी ऐसा फाॅर्मूला बनता नहीं दिख रहा है जिसमें तीनों पार्टियों की सहमति हो.

ऐसे में बिहार भाजपा के एक धड़े को लगता है कि भाजपा को 2019 का लोकसभा चुनाव जेडीयू से अलग होकर लड़ना चाहिए. बिहार भाजपा का जो वर्ग ऐसा सोचता है उसे सुशील कुमार मोदी विरोधी खेमा भी कहा जा सकता है. इस वर्ग का यह कहना है कि अलग होकर चुनाव लड़ने के कई फायदे हैं.

पहला फायदा तो यह है कि भाजपा अपने 2014 के सहयोगियों के साथ ही एक बार फिर से बिहार में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभर सकती है, क्योंकि अब बिहार में 2015 वाली स्थिति आनी मुश्किल लग रही है जब जेडीयू और आरजेडी एक साथ हो गए थे और विधानसभा चुनावों में भाजपा की बुरी हार हुई थी. इन नेताओं को लगता है कि आरजेडी के दरवाजे नीतीश कुमार के लिए बंद हैं और ऐसे में उसके और जेडीयू के वोट अलग-अलग होने का सबसे अधिक फायदा भाजपा को मिलेगा. जैसे 2014 में मिला था.

भाजपा के एक नेता बताते हैं, ‘ऐसा करने से पार्टी के अंदर जिन सांसदों का टिकट कटने का खतरा है और इससे उनके बागी होने का जोखिम है, उसका भी समाधान हो जाएगा. क्योंकि अगर जेडीयू के साथ भाजपा चुनाव लड़ी तो जाहिर है कि कुछ पार्टी सांसदों का टिकट तो कटेगा ही. ऐसे में जिन सांसदों का टिकट कटेगा उनमें असंतोष पनपने का खतरा है और ये जोखिम भी है कि वे बागी होकर चुनाव मैदान में उतरें या चुनाव के दौरान सक्रिय न होकर गठबंधन के उम्मीदवार को नुकसान पहुंचाएं.’

बिहार भाजपा के एक विधायक कहते हैं, ‘अगर पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने जेडीयू से अलग होने का जोखिम लिया तो बिहार में हमारे पास स्थायी तौर पर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में स्थापित होने का अवसर है.’ वे आगे जोड़ते हैं, ‘नीतीश कुमार के पास अपने पहले दो कार्यकाल में काम करने की पूंजी तो है लेकिन वोट बैंक नहीं है. ऐसे में अगर वे कमजोर होंगे तो सिर्फ भाजपा और आरजेडी ही बिहार की राजनीति में मुख्य भूमिका में रहेंगे. अगला लोकसभा चुनाव इस नाते बिहार भाजपा के लिए एक अवसर है.’

हालांकि, बिहार में भाजपा के जेडीयू से अलग होकर चुनाव लड़ने के जोखिम भी कम नहीं हैं. जानकारों के मुताबिक सबसे बड़ा जोखिम तो यही है कि अगर भाजपा ने जेडीयू से नाता तोड़ा और अगर अंतिम समय में जेडीयू और आरजेडी के बीच कोई सहमति बन गई तो जिस तरह से 2015 के विधानसभा चुनावों में भाजपा का सूपड़ा साफ हुआ था, वही स्थिति अगले लोकसभा चुनावों में हो सकती है. पहले से ही उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के महागठबंधन के चलते सीटों में कमी की आशंका से परेशान भाजपा के लिए बिहार की यह स्थिति 2019 में केंद्र की सत्ता में लौटने की बड़ी बाधा बन जाएगी.

कुल मिलाकर स्थिति यही बनती दिख रही है कि भाजपा के कुछ नेता भले ही गठबंधन तोड़ने के पक्ष में हों, लेकिन बहुतों का यही मानना है कि अगले चुनावों की चुनौतियों को देखते हुए पार्टी का शीर्ष नेतृत्व जेडीयू के साथ ही बाकी सहयोगियों को साथ लेकर चलने का कोई फाॅर्मूला निकाले.