कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी कई बार कह चुके हैं कि अगले चुनाव का समीकरण बड़ा सीधा है - एक तरफ नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और दूसरी तरफ बाकी दल. अपने हालिया विदेश दौरे में राहुल ने यह घोषणा भी कर दी कि अगले चुनाव का निर्णय उत्तर प्रदेश और बिहार की 120 सीटों से होगा.

लेकिन ऐसा नहीं है कि जो बात राहुल को इतनी आसान लगती है वह भाजपा के नेतृत्व को समझ नहीं आ रही. उत्तर प्रदेश और बिहार के उपचुनावों में हुई हार ने पार्टी के लिए खतरे की घंटी पहले ही बजा दी थी. उत्तर प्रदेश से भाजपा के एक सांसद की बातों से पार्टी के अंदरखाने चल रही सुगबुगाहट का अंदाज़ा लगता है. वे कहते हैं, ‘अगर उपचुनाव में न हारते तो मुगालते में रहते कि उत्तर प्रदेश में मोदी के नाम पर चुनाव जीत जाएंगे, उपचुनाव के नतीजे ने साबित कर दिया कि अगले चुनाव में मोदी लहर पर जाति का असर भारी पड़ने वाला है.’

वे आगे जोड़ते हैं, ‘इसलिए पार्टी नेतृत्व अब डैमेज कंट्रोल के मूड में आ गया है. अभी से छोटी-छोटी जातियों का एक ऐसा गठजोड़ तैयार किया जा रहा है जो राहुल-मायावती और इनके साथ अगर अखिलेश भी आ जाएं तो इस महागठबंधन का बंधन ढीला कर सके.’

सुनी-सुनाई है कि राहुल को अब भी मायावती और अखिलेश के एक टेबल पर आने का इंतजार है. उत्तर प्रदेश में मायावती अभी महागठबंधन की बात अखिलेश से करना नहीं चाहतीं और अखिलेश फिलहाल राहुल के साथ गठबंधन से बचना चाहते हैं. उधर, उत्तर प्रदेश में महागठबंधन अभी बना नहीं लेकिन उसकी हवा निकालने के लिए भाजपा ने तीन कोशिशें शुरू कर दी हैं.

भाजपा को गोरखपुर में हराने वाले सांसद भाजपा में जाएंगे!

2014 से 2018 के बीच सबसे बड़ा सियासी उलटफेर गोरखपुर में ही हुआ. निषाद पार्टी के मुखिया संजय निषाद के बेटे प्रवीण निषाद ने भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार को करीब 22 हजार वोट से चुनाव हरा दिया. जिस सीट से योगी आदित्यनाथ 1998 से लगातार सांसद थे वह समाजवादी पार्टी ने तब छीनी जब राज्य के मुख्यमंत्री खुद योगी आदित्यनाथ थे.

जब इस हार की समीक्षा हुई तो भाजपा को पूरी बात समझ में आई. 1998 से लेकर 2014 तक के आंकड़े खंगाले गए. इनसे पता चला कि गोरखपुर में कोई भी मजबूत निषाद उम्मीदवार भाजपा को हरा सकता है. आंकड़े पेश किए गए कि 1998 में योगी की जीत भी मुश्किल हो गई थी. योगी के पहले ही चुनाव में सामने समाजवादी पार्टी के जमुना निषाद थे और योगी सिर्फ 26 हजार वोट से जीत पाए. 1999 में तो इन्हीं जमुना निषाद ने योगी को करीब-करीब हरा ही दिया था. वह तो बहुजन समाजवादी पार्टी ने डीपी यादव को चुनाव लड़ाया तब जाकर सिर्फ योगी महज सात हजार वोट से जीत पाए थे. 2014 में भी सपा और बसपा के निषाद उम्मीदवारों को कुल मिलाकर करीब चार लाख वोट मिले थे.

पिछड़े वर्ग से ताल्लुक रखने वाले भाजपा के एक वरिष्ठ नेता बताते हैं, ‘गोरखपुर सीट पर पहले निषाद जाति किंगमेकर थी जो अब खुद किंग बन गई है. इसलिए भाजपा को भी अपनी रणनीति बदलनी पड़ी है. गोरखपुर में भी भाजपा अब सिर्फ योगी-मोदी के भरोसे नहीं रहना चाहती.’

सुनी-सुनाई है कि लखनऊ और दिल्ली दोनों जगह भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने सीधे-सीधे निषाद पार्टी के मुखिया संजय निषाद से बात की है और वे भाजपा के साथ गठबंधन करने के लिए तैयार दिखते हैं. यानी अखिलेश ने जो चाल योगी के खिलाफ उपचुनाव में चली थी ठीक वही तीर 2019 के चुनाव में भाजपा चलाने वाली है. सूत्रों के मुताबिक अगर संजय निषाद की कुछ मांगें मान ली गईं तो उनके बेटे और अभी गोरखपुर से समाजवादी पार्टी के सांसद प्रवीण निषाद भाजपा से अगला चुनाव लड़ सकते हैं.

शिवपाल से अखिलेश की काट

अखिलेश के सगे चाचा शिवपाल सिंह ने नई पार्टी का ऐलान कर दिया है. समाजवादी सेक्युलर मोर्चा नाम का यह दल अगले लोकसभा चुनाव में पूरे 80 सीटों पर उम्मीदवार उतारेगा. गणित यह है कि अगर अखिलेश-मायावती और राहुल गांधी का महागठबंधन हुआ तो कम से कम 40-45 ऐसी सीटें होंगी जहां अखिलेश अपनी ही पार्टी के नेताओं को टिकट नहीं दे पाएंगे. ऐसे 45 असंतुष्ट टिकट कटने से नाराज़ नेता वोटकटुआ बनकर मैदान में उतर सकते हैं. शिवपाल के एक एक करीबी नेता बताते हैं, ‘ये नाराज़ सपाई खुद भले चुनाव ने जीतें लेकिन महागठबंधन के उम्मीदवार का 5-10 हजार वोट का नुकसान जरूर कर सकते हैं.’

लखनऊ से लेकर दिल्ली तक चर्चा गर्म है कि शिवपाल ने अपने अपमान का बदला लेने के लिए अखिलेश के खिलाफ चाल चल दी है और इसके पीछे भाजपा के एक बड़े नेता का दिमाग है. नई पार्टी बनाने से पहले शिवपाल ने पूरी तैयारी की. वे लखनऊ में लोहिया ट्रस्ट के दफ्तर में अपने समर्थकों से खूब मिलते थे. अखिलेश से जो नाराज़ होता था वह इस इमारत की तरफ खींचा चला आता था. शिवपाल के कहने पर लखनऊ में उस व्यक्ति के काम भी हो जाते थे. समाजवादी पार्टी के अंदर खबर गर्म है कि शिवपाल यादव पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की खास कृपा है. पिछले दिनों शिवपाल खुद मुख्यमंत्री से मिले थे. मामला बेहद व्यक्तिगत था. शिवपाल अपने बेहद करीबी रिश्तेदार आईएएस अफसर का डेपुटेशन उत्तर प्रदेश में रखना चाहते थे. लेकिन ऐसा करने में कई नियम आड़े आ रहा था. योगी ने शिवपाल की पैरवी को तरजीह दी और शिवपाल का मन जीत लिया. उस दिन से शिवपाल आपसी बातचीत में योगी की जमकर प्रशंसा करते सुनाई देते हैं.

और शिवपाल अकेले नहीं हैं, उनके साथ राज्यसभा सांसद अमर सिंह भी हैं. इन दोनों को ही अखिलेश से पुराना हिसाब बराबर करना है. इटावा-मैनपुरी, कन्नौज से फिरोजाबाद तक का इलाका समाजवादी पार्टी का गढ़ माना जाता है. यहां शिवपाल का भी अपना प्रभाव है. सुनी-सुनाई है कि शिवपाल यहां समाजवादी पार्टी को तगड़ा डेंट मारने का काम करेंगे.

राहुल को अमेठी में घेरने की तैयारी

राहुल गांधी की पार्टी चाहती है कि वे अगला चुनाव दो सीटों से लड़ें. उत्तर में अमेठी के अलावा दक्षिण में कर्नाटक की एक सीट से भी उन्हें चुनाव लड़ाने का विचार किया जा रहा है. लेकिन राहुल अभी तक सिर्फ अमेठी से ही मैदान में उतरने पर अड़े हैं. कांग्रेस के वॉर रूम की खबर रखने वाले एक सूत्र का कहना है, ‘अगर प्रियंका गांधी ने रायबरेली से चुनाव लड़ने का फैसला कर लिया तब राहुल को अमेठी से ही उतरना चाहिए. लेकिन अगर प्रियंका ने 2024 तक इंतजार करने का फैसला किया तो राहुल को एक और सीट ढूंढनी चाहिए.’

भाजपा में स्मृति इरानी भले ही अभी हाशिए पर हों लेकिन अमेठी के मामले में उनकी पूरी सुनवाई होती है. भाजपा की तरफ से यह करीब करीब तय है कि स्मृति ही अगला चुनाव अमेठी से लड़ेंगी. कुछ हफ्ते पहले वे अमेठी में कुछ पत्रकारों से मिली थीं और बातचीत के केंद्र में राहुल ही थे. उन्होंने कहा कि पिछली बार उन्हें महीने भर का वक्त भी नहीं मिला था तो राहुल सिर्फ एक लाख वोट से जीत पाए. स्मृति ईरानी का आगे कहना था कि पिछले चार साल में उन्होंने अमेठी सीट पर मेहनत की है तो इसका नतीजा भी दिखेगा. इसलिए कई बार ऐसा होता है कि जब राहुल विदेश में होते हैं तो स्मृति ईरानी अमेठी में एक बड़ी योजना का फीटा काटती हैं.