तमिलनाडु की एआईएडीएमके (अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम) सरकार ने फिर एक नई बहस को हवा दी है. उसने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या की साज़िश में शामिल सात दोषियों- मुरुगन, सांथन, एजी पेरारिवलन, नलिनी, रॉबर्ट पायस, रविचंद्रन और जयकुमार को रिहा कराने की पहल की है. बीते रविवार को मुख्यमंत्री ईके पलानिसामी की अध्यक्षता में राज्य मंत्रिमंडल की बैठक में इस बाबत एक संकल्प पारित किया गया है. इसकी प्रति राज्यपाल बनवारीलाल पुरोहित के पास पहुंचा दी गई है.

राज्य के मत्स्य विभाग के मंत्री डी जयकुमार ने मीडिया को बताया, ‘सरकार ने संविधान के अनुच्छेद-161 के तहत राज्यपाल से सिफारिश की है. इस अनुच्छेद के तहत राज्यपाल को किसी अपराधी की सजा माफ करने का अधिकार मिला हुआ है. लेकिन चूंकि राज्यपाल की कार्यपालक शक्तियां (एक्जीक्यूटिव पावर) राज्य सरकार में निहित हैं. साथ ही राज्य सरकार के फैसले मानने के लिए राज्यपाल बाध्य भी होते हैं. इसलिए हम उम्मीद कर रहे हैं कि वे सरकार के फैसले पर भी जल्द मुहर लगाएंगे.’

तमिलनाडु सरकार ने यह कदम सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के बाद उठाया है. शीर्ष अदालत के न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली बेंच ने बीते गुरुवार को पेरारिवलन की याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्यपाल को सुझाव दिया था. इसमें अदालत ने कहा था कि पेरारिवलन की क्षमादान याचिका पर विचार किया जाए. पेरारिवलन ने अपनी याचिका में दलील दी थी कि वह 27 साल से जेल में बंद है. जबकि जेल नियमों के मुताबिक आजीवन कारावास की सजा 20 साल की ही होती है. इसलिए उसे रिहा किया जाए.

यानी सुप्रीम कोर्ट के निर्देश की आड़ में तमिलनाडु सरकार ने एक के साथ सातों दोषियों को रिहा कराने की कम से कम अपनी ओर से तैयारी कर ही दी है. अब सवाल उठता है कि उसने ऐसा क्यों किया. तमिलनाडु के लिए राजीव गांधी के हत्यारों काे रिहा करने का मसला कितना मायने रखता है? क्या राज्य सरकार पहले भी इस तरह की कोई पहल कर चुकी है? और क्या राज्यपाल वाक़ई यह सिफारिश मानेंगे? ऐसे ही कुछ अन्य सवाल भी हैं. लिहाज़ा सवाल-ज़वाब की ही शक्ल में दूसरे वाले प्रश्न से शुरुआत करते हुए एक-एक कर इस मसले से जुड़े अहम पहलुओं को समझने की कोशिश करते हैं.

तमिलनाडु के लिए राजीव गांधी के हत्यारों काे रिहा करने का मसला कितना मायने रखता है?

इस सवाल का ज़वाब सबसे पहले दिया जाना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि यहीं से अन्य सभी चीजों का उद्भव हो रहा है. और इसका ज़वाब यह है कि राजीव गांधी की हत्या की साज़िश में शामिल रहे सात दोषी वे हैं जिनके तार श्रीलंका के उग्रवादी संगठन लिबरेशन टाइगर ऑफ तमिल ईलम यानी लिट्टे से जुड़ते हैं. यानी वह संगठन जिसने राजीव गांधी की हत्या की थी. और वह संगठन भी जिसने श्रीलंका में तमिल समुदाय पर होने वाले कथित अत्याचारों के ख़िलाफ़ हथियार उठाए थे. हालांकि अब संगठन लगभग ख़त्म हो चुका है लेकिन इसके और इससे जुड़े कार्यकर्ताओं के प्रति सुहानुभूति तमिलनाडु में अब भी बड़े पैमाने पर क़ायम है. यही कारण है कि राजीव गांधी के हत्यारों की रिहाई के मसले पर राज्य के लगभग सभी राजनीतिक दल एकमत हैं. वहां के मुख्य विपक्षी दल डीएमके (द्रविड़ मुनेत्र कड़गम) के नए प्रमुख एमके स्टालिन द्वारा भी इनकी रिहाई की मांग करना इसका बात का पुख्ता और सबसे ताज़ा सबूत है.

राजीव गांधी के हत्यारों की रिहाई की मांग और सिफारिश के पीछे मक़सद क्या हो सकता है?

जैसा कि पहले सवाल के ज़वाब में ही बताया गया, तमिलनाडु में राजीव गांधी के हत्यारों के प्रति सुहानुभूति अब तक क़ायम है. वहां इन लोगों के बारे में यह मानने वाला वर्ग काफी बड़ा है कि इन्होंने तमिल समुदाय के उत्पीड़न के ख़िलाफ़ झंडा बुलंद करते हुए अपना जीवन कुर्बान कर दिया. लिहाज़ा सभी पार्टियां इस बड़े वर्ग की सुहानुभूति हासिल करने के लिए राजीव गांधी के हत्यारों के साथ हमदर्दी जता रही हैं. यानी मक़सद विशुद्ध तौर पर राजनीतिक नफ़े-नुक़सान का माना जा सकता है.

नफ़ा-नुक़सान तो ठीक पर रिहाई का मसला अभी क्यों?

मामला चूंकि सियासी मक़सद साधने का है, इसलिए चुनावी भी है. प्रदेश की एआईएडीएमके सरकार पर मद्रास उच्च न्यायालय का दबाव है कि जल्द से जल्द पंचायतों और नगरीय निकायों के चुनाव कराए जाएं. अब तक एआईएडीएमके कोई न कोई बहाना बनाकर ये चुनाव टाल रही थी क्योंकि पार्टी प्रमुख जयललिता के अवसान के बाद वह सक्षम नेतृत्व के साथ मुद्दों के संकट से भी जूझ रही है. इसीलिए वार्डाें के सीमांकन की आड़ में पिछली बार अदालत से तीन महीने की मोहलत ले ली गई थी. यह मोहलत अब ख़त्म हो रही है और वार्डों के सीमांकन की प्रक्रिया भी पूरी होने को है. लिहाज़ा आने वाले तीन-चार महीनों के भीतर राज्य सरकार को पंचायतों और निकायों के चुनाव कराने पड़ सकते हैं. इसलिए एक बार फिर इस भावनात्मक मुद्दे को उछालने की कोशिश की गई है. ताकि डीएमके के पास स्टालिन के रूप में मौज़ूद तुलनात्मक रूप से सक्षम नेतृत्व की चुनौती से कुछ हद तो निपटा ही जा सके.

क्या सरकार पहले भी ऐसा कर चुकी है?

हां, इससे पहले जब एआईएडीएमके की मुखिया जयललिता मुख्यमंत्री थीं तो उन्होंने अपने मंत्रिमंडल की बैठक में फैसला कर दो बार केंद्र सरकार से इस बाबत सिफारिश की थी. आख़िरी बार 2014 में फरवरी 2014 में इस तरह की सिफारिश की गई थी. उस वक़्त लोक सभा के चुनाव सिर पर थे और विधानसभा के भी कुछ समय बाद आने वाले थे. इसी आधार पर कांग्रेस सहित तमाम राजनीतिक दलाें ने जयललिता सरकार के इस फैसले को राजनीति से प्रेरित बताया था और इसकी तीखी आलोचना की थी.

क्या राजीव गांधी की रिहाई के मुद्दे पर कांग्रेस का रुख़ बदला है?

बीते दिनों इस तरह की कुछ ख़बरें आई थीं. इनमें कहा गया था कि राजीव गांधी के हत्यारों को अगर रिहा किया जाता है कि कांग्रेस अध्यक्ष इसका राहुल गांधी विरोध नहीं करेंगे. लेकिन ये ख़बरें आधा सच सामने रखने वाली ही हैं. क्योंकि वास्तव में राहुल गांधी ने कहा यह था कि इस ‘मसले पर फैसला केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को करना है. मेरी इस बारे में कोई निजी राय नहीं है.’ दरअसल इस तरह कांग्रेस अध्यक्ष ने एक परिपक्व राजनेता की तरह गेंद केंद्र सरकार के पाले में खिसका दी है. साथ ही उन्होंने इस पर हाेने वाले किसी भी तरह के फैसले से अपनी पार्टी के लिए लाभ सुनिश्चित करने की कोशिश भी की है. राजीव गांधी के हत्यारों को रिहा किया गया तो वे उन्हें माफ करने का श्रेय लेने की कोशिश कर सकते हैं. और अगर नहीं किया गया तो मोदी सरकार पर दोष मढ़ सकते हैं.

तो फिर अब राज्यपाल के साथ-साथ मोदी सरकार का रुख़ क्या हो सकता है?

जानकारों के मुताबिक इस सवाल के ज़वाब के लिए दो-तीन चीजें ध्यान में रखना ज़रूरी है. पहली- राज्यपाल भले राज्य सरकार की सिफारिश पर काम करते हों पर प्रदेशों में होते तो केंद्र के प्रतिनिधि ही हैं. इसलिए केंद्र सरकार की मर्ज़ी और सहमति के बिना वे कोई बड़ा फैसला शायद ही करेंगे. दूसरी बात- केंद्र सरकार पिछले दो मौकों पर तमिलनाडु सरकार की ओर से की गई ऐसी ही सिफारिशों को ख़ारिज़ कर चुकी है. सुप्रीम कोर्ट में भी उसने साफ कहा है किराजीव गांधी के हत्यारों को रिहा नहीं किया जा सकता. उसने यह भी कहा था, ‘दोषियों में तीन भारतीयों के साथ शामिल चार विदेशियों को रिहा करना एक खतरनाक नज़ीर स्थापित करेगा. इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विवाद भी पैदा हो सकता है.’ इस सबके ऊपर तीसरी बात- जिस सुप्रीम कोर्ट ने अभी पेरारिवलन की क्षमादान याचिका पर विचार करने का राज्यपाल को सुझाव दिया है, वही दिसंबर-2015 में व्यवस्था दे चुका है कि राज्य सरकार को राजीव गांधी के हत्यारों को रिहा करने का अधिकार नहीं है.

यानी कुल मिलाकर राजीव गांधी के हत्यारों की रिहाई का मसला अब भी सियासी ही ज़्यादा नज़र आ रहा है. काेई चमत्कारिक विरोधाभासी परिस्थिति नहीं बनी तो मौज़ूदा स्थितियों में इनकी रिहाई मुश्किल लगती है. अलबत्ता जेल में जीवन काटते हुए राजीव गांधी की हत्या के दोषी राजनीतिक दलों को संजीवनी ज़रूर देते रह सकते हैं और यह मामला अभी ‘अ से त्र तक’ ही अटका रह सकता है.