हाल ही में मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक चिट्ठी लिखी. इसमें उन्होंने देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के संग्रहालय और लाइब्रेरी के तौर पर पहचाने जाने वाले तीन मूर्ति भवन परिसर के स्वरूप के साथ किसी तरह की छेड़छाड़ न करने की अपील की. मनमोहन सिंह के मुताबिक पंडित नेहरू को सिर्फ कांग्रेस पार्टी के साथ जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए, उनका नाता पूरे देश के साथ था.

पंडित नेहरू को स्वतंत्र भारत का वास्तुकार बताते हुए मनमोहन सिंह ने यह भी लिखा है कि देश के दिए उनके योगदान को मिटाया और भुलाया नहीं जा सकता, इसलिए तीन मूर्ति भवन को उनकी याद में, उन्हीं के नाम पर समर्पित रहने दिया जाए. इसमें कोई बदलाव न किया जाए. पूर्व प्रधानमंत्री ने लिखा है, ‘ऐसा करके हम अपने इतिहास और विरासत दोनों का सम्मान करेंगे.’ इस चिट्ठी की ज़रूरत कांग्रेस पार्टी को इसलिए पड़ी क्यूंकि इस साल जून में भाजपा सरकार ने घोषणा की कि थी तीन मूर्ति भवन को सभी प्रधानमंत्रियों के संग्रहालय के रूप में विकसित किया जाएगा.

तीन मूर्ति भवन का निर्माण ब्रिटिश इंडिया के सेनाध्यक्ष के निवास के उद्देश्य से किया गया था. तब इसे ‘फ्लैगस्टाफ़ हाउस’ कहा जाता था. आज़ादी के बाद ही इसके साथ विवाद जुड़ते चले गए. आइए, सिलसिलेवार तरीके से इन पर नज़र डालते हैं.

जब माउंटबेटन को इसमें रहने का सुझाव दिया गया

देश के आख़िरी वायसराय और पहले गवर्नर जनरल लार्ड माउंटबेटन को गांधी ने वायसराय भवन के बजाए कहीं और रहने की सलाह दी थी. जेबी कृपलानी की किताब ‘पॉलिटिकल थिंकर्स ऑफ़ मॉडर्न इंडिया’ में ज़िक्र है कि गांधी की सलाह पर विचार करते हुए माउंटबेटन ने नेहरू को सुझाया कि वे फ्लैगस्टाफ़ हाउस (यानी तीन मूर्ति भवन) को अपना निवास स्थान बनाने पर विचार रहे हैं. नेहरू ने यह कहकर मना कर दिया कि वे (माउंटबेटन) कुछ ही महीनों के लिए देश में रहेंगे और इतने कम समय के लिए निवास बदलना बेहतर सुझाव नहीं है.

माउंटबेटन तो उसमें रहने नहीं गए पर हां, नेहरू ने इसे अपना आवास बना लिया और उनके साथ इंदिरा गांधी भी इसी में रहने लगीं. ज़ाहिर था यह इमारत प्रधानमंत्री आवास के लिए बिलकुल मुफ़ीद थी क्योंकि वायसराय हाउस के बाद फ्लैगस्टाफ़ हाउस ही दूसरी सबसे ताक़तवर बिल्डिंग थी.

पाकिस्तान के भौतिकशास्त्री परवेज़ हुडबॉय ने मिलिट्री पत्रकारिता के स्तंभ कहे जाने वाले स्टीवन विलकिंसन के साथ एक इंटरव्यू में इस बारे में बात की थी. उनके मुताबिक नेहरू इससे यह संकेत देना चाहते थे कि भारत में संसद सेनाध्यक्ष से ऊपर है. लेकिन बहुत से लोगों के मुताबिक यह सही आकलन नहीं है क्योंकि नेहरू इस प्रकार के किसी भी आडंबर से दूर ही रहते थे. वे जानते थे कि इससे कुछ भी साबित नहीं किया जा सकता. भारत के पहले प्रधानमंत्री इस इमारत में तकरीबन 16 साल रहे और इस तरह तीन मूर्ति भवन प्रधानमंत्री आवास बन गया या कहें कि, जाने-अनजाने, यह एक शक्ति केंद्र बन गया. मई 1964 में उनके निधन के बाद इसे लेकर राजनीतिक हलचल शुरू हो गयी.

जब शास्त्री इसमें रहना चाहते थे

जवाहर लाल नेहरू के बाद लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी में प्रधानमंत्री बनने के लिए खींचतान मची थी. प्रधानमंत्री बनने के बाद शास्त्री ने तीन मूर्ति भवन को अपना निवास बनाने का विचार किया. रामचंद्र गुहा, ‘इंडिया आफ़्टर गांधी’ में लिखते हैं कि जब इंदिरा को ख़बर मिली कि प्रधानमंत्री कार्यालय उन्हें इस भवन को खाली करने के का आदेश दे सकता है तो उन्होंने अपने शुभचिन्तकों के साथ मिलकर इसे राष्ट्रीय स्मारक बनाने का प्रस्ताव दे डाला.

शास्त्री चाहते हुए भी इस प्रस्ताव के ख़िलाफ़ नहीं जा सकते थे. कांग्रेस ने अगस्त 1964 को नेहरु मेमोरियल फंड की स्थापना की. राष्ट्रपति और इंदिरा गांधी को क्रमशः चेयरमैन और सचिव नियुक्त किया गया और हारकर शास्त्री को दूसरा निवास स्थान चुनना पड़ा. उसी साल तीन मूर्ति भवन में नेहरु स्मृति और संग्रहालय बना दिया गया जिसका प्रबंधन सरकार के सांस्कृतिक मंत्रालय के अधीन किया गया.

कांग्रेस सरकार के बाद आई जनता पार्टी की सरकार ने इसके प्रबंधन में कोई दखल नहीं दिया. यानी तब भी गांधी-नेहरू परिवार ही इसका सर्वेसर्वा था. 1991 में प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के कार्यकाल के दौरान सोनिया गांधी नेहरू स्मृति स्मारक और संग्रहालय (एनएमएमएल) की चेयरमैन नियुक्त की गईं. इस प्रकार गांधी-नेहरू परिवार ने इस भवन पर अघोषित कब्ज़ा कर लिया.

पर जानकारों के मुताबिक यहां एक पेंच था और वह यह कि सोनिया की देवरानी, यानी मेनका गांधी, भाजपा में शामिल होकर राजनीतिक पटल पर आ चुकी थीं. वे भी इस सत्ता केंद्र में अपनी हिस्सेदारी चाहती थीं. उनकी सोच के मुताबिक़ सोनिया से ज़्यादा तीन मूर्ति भवन पर उनका हक था क्योंकि संजय गांधी को इंदिरा गांधी का असली राजनैतिक वारिस माना जाता था.

सोनिया और मेनका के बीच रस्साकशी

एक बार वापस मनमोहन सिंह की चिठ्ठी पर आते हैं. मनमोहन सिंह ने लिखा था, ‘पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने देश पर छह वर्षों तक शासन किया. अपने शासनकाल के दौरान उन्होंने इस संग्रहालय और परिसर के साथ कोई छेड़छाड़ करने की कोशिश नहीं की. लेकिन अब ऐसा लगता है कि तीन मूर्ति भवन और परिसर के स्वरूप में बदलाव किया जाना मौजूदा सरकार के एजेंडे में शामिल हो गया है.’ मनमोहन सिंह के इस कथन में आधा सच है. जो सच नहीं है वही तीनमूर्ति भवन से जुड़ा तीसरा विवाद था.

1999 में भाजपा सरकार के आने के कुछ समय बाद एनएमएमएल में उठापटक शुरू हो गयी. सबसे पहले एक सितंबर, 2001 को मेनका गांधी को संस्कृति मंत्रालय का स्वतंत्र प्रभार दिया गया. जैसा ऊपर जिक्र हुआ एनएमएमएल की देखभाल इसी मंत्रालय के अधीन आती है. नवंबर में सोनिया गांधी को हटाकर प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी इसके अध्यक्ष बन गए. सोनिया की हैसियत महज़ एक ट्रस्टी के तौर पर रह गयी. जानकार इस खींचतान को जेठानी बनाम देवरानी की लड़ाई के तौर पर देख रहे थे. लोगों को मेनका जीतती हुई नज़र आ रही थीं कि तभी 18 नवंबर को प्रधानमंत्री ने उनसे संस्कृति मंत्रालय का कार्यभार लेकर उन्हें दूसरा मंत्रालय दे दिया.

मेनका गांधी ने इस पर काफी हो-हल्ला मचाया. उनका कहना था कि वे एनएमएमएल को सोनिया और उनके चहेते लोगों से आज़ाद कर उसे सही मायनों में स्वायत्त संस्थान बना रही थीं, तो संभव है सरकार में कुछ लोगों को यह बात रास नहीं आई. दरअसल, वे अटल बिहारी और सोनिया गांधी के बीच हुए एक समझौते की ओर इशारा कर रही थीं.

आपको याद होगा कि तबकी भाजपा सरकार के पास किसी बिल या विधेयक को संसद में पास कराने के लिए पर्याप्त संख्या बल नहीं था. प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी संसद के दोनों सदनों में आतंकवाद से संबंधित बिल को बिना कांग्रेस के समर्थन से पारित नहीं करा सकते थे. बताते हैं कि इसलिए उनके और सोनिया के बीच समझौता हो गया.

हालांकि मेनका के संस्कृति मंत्रालय से जाने के बाद ऐसा नहीं था कि सोनिया गांधी दोबारा एनएमएमएल की चेयरपरसन बन गयी हों. वाजपेयी ही यह कुर्सी संभाल रहे थे पर संस्कृति मंत्रालय से मेनका की छुट्टी हो जाना एक तरह से सोनिया की जीत की तरह देखा गया. अटल बिहारी वाजपेयी ने एनएमएमएल की राजनीति में ज़्यादा तीन-पांच नहीं किया. वे नेहरू की विरासत के साथ छेड़-छाड़ नहीं करना चाहते थे क्योंकि नेहरू उनके भी आदर्श थे.

देखा जाए तो तीन मूर्ति भवन राष्ट्रीय स्मारक है और इसमें अगर सभी प्रधानमंत्रियों को जगह मिलती है तो इसका सम्मान ही बढ़ेगा. पर कांग्रेस को डर है कि भाजपा की हालिया पेशकश उसकी सबसे मज़बूत विरासत को ढहा दे देगी. अगर अब तक बने 14 प्रधानमंत्रियों का ज़िक्र इसमें होता है तो नेहरू और इस भवन का रिश्ता लोगों की निगाहों में कमज़ोर हो जाएगा. और यही नहीं, एनएमएमएल और जवाहर लाल नेहरू मेमोरियल फंड (जेएमएफ़) के तहत कांग्रेस द्वारा किए जाने वाले कार्यक्रमों पर भी असर पड़ेगा. आपको बता दें कि एनएमएमएल के तहत कांग्रेस पार्टी नेहरू पर व्याख्यान करवाती है और जेएमएफ़ के ज़रिये स्कालरशिप प्रदान की जाती है. एक तरह से कहा जा सकता है कि यह कांग्रेस के प्रचार का हिस्सा है. तो ज़ाहिर है कांग्रेस अपनी तथाकथित विरासत को गिरने से बचाने की पुरज़ोर कोशिश करेगी.

जानकारों के मुताबिक सोनिया और राहुल गांधी की मजबूरी यह है कि वे अगर इस मुद्दे पर भाजपा के ख़िलाफ़ मोर्चा खोलते हैं तो इससे जनता में यह संदेश जाएगा कि नेहरू-गांधी परिवार उस भवन को अपनी मिल्कियत समझता है. इसीलिए सोनिया ने मनमोहन सिंह को आगे करके अपना पक्ष रखा.

भाजपा बड़ी समझदारी से सरदार पटेल और संघ की विचारधारा में समानता पैदा करने में कामयाब हो गयी है. महात्मा गांधी को हर पार्टी ने हाशिए पर डाल दिया है. भीमराव अंबेडकर हर पार्टी की ‘आत्मा’ और ‘विचारधारा’ में बसते हैं. बचे नेहरू, जो कांग्रेस के हिस्से में रह गए और किसी भी तरह भाजपा के पाले में नहीं लाए जा सकते थे. अब भाजपा ने इसका भी तोड़ निकाल लिया है. क्या इसका नामकरण भी दीनदयाल उपाध्याय भवन हो जाएगा? वक़्त ही बताएगा.