बीते हफ्ते राजस्थान की 14वीं विधानसभा का आख़िरी सत्र था. देश की सबसे खूबसूरत सरकारी इमारतों में शुमार इस विधानसभा में कुछ महीनों पहले सत्ताधारी भाजपा के विधायकों और मंत्रियों ने भूतों का साया होने की बात कहकर सनसनी फैला दी थी. तब प्रदेश के कई दिग्गज जनप्रतिनिधियों ने खुलकर अपने डर का इज़हार भी किया था. लेकिन इस सत्र की कार्यवाही के दौरान संकेत मिला कि इस सदन में भूतों के अलावा ऐसा कुछ और भी था जिससे सत्ताधारी दल के नेता कम भयभीत नहीं थे. यह और कुछ नहीं बल्कि विपक्षी या निर्दलीय विधायकों द्वारा सरकार से पूछे गए ‘सवाल’ थे. सत्र के दौरान महसूस हुआ कि जैसे सत्ताधारी भाजपा एकबारगी किसी भूत से तो जैसे-तैसे निपट लेगी लेकिन इन सवालों का सामना करना उसके बूते से बाहर था. शायद इसीलिए आख़िरी सत्र में कई विधायकों के महत्वपूर्ण प्रश्न एन मौके पर स्थगित कर दिए गए.

सीकर जिले के फतेहपुर विधानसभा क्षेत्र से आने वाले निर्दलीय विधायक नंदकिशोर महरिया उन्हीं विधायकों में शामिल हैं. महरिया का सवाल था कि इसी साल सात जुलाई को जयपुर में आयोजित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लाभार्थी जनसंवाद सभा में ख़र्च हुई रकम किस मद से ली गई. इस सवाल में आगे यह भी जोड़ा गया था कि उस कार्यक्रम से संबंधित कितने ठेकेदारों को कितनी-कितनी राशि का भुगतान किया जा चुका है और कितना भुगतान किया जाना बाकी है. महरिया का सवाल लॉटरी के ज़रिए सदन में पूछा जाना तय हुआ. प्रश्नावली में छपने के साथ इस सवाल से जुड़ी अन्य औपचारिकताएं भी पूरी हो गईं. लेकिन कार्यवाही से ठीक पहले वाली रात को एक बजे अरदली के ज़रिए मिली चिठ्ठी से महरिया को उनके सवाल के स्थगित होने की सूचना मिली. सरकारी ख़र्च पर हुए इस लाभार्थी जनसंवाद कार्यक्रम के आयोजन के बाद से विरोधी दल भाजपा को लगातार आड़े हाथों लेते रहे हैं. नियमानुसार चुने गए सवाल के इस तरह स्थगित किए जाने को महरिया सरकार की तानाशाही करार देते हैं.

विधानसभा की प्रश्नावली में छपा नंदकिशोर महरिया का सवाल और उसे स्थगित करने को लेकर उन्हें मिला पत्र
विधानसभा की प्रश्नावली में छपा नंदकिशोर महरिया का सवाल और उसे स्थगित करने को लेकर उन्हें मिला पत्र

इसी तरह विपक्षी दल कांग्रेस के मुख्य सचेतक गोविंद सिंह डोटासरा ने सत्र के दूसरे दिन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की गौरव यात्रा में सरकारी धन और संसाधनों के दुरुपयोग के बाबत सदन के समक्ष स्थगन प्रस्ताव रखा था. इसे भी स्थगित कर दिया गया. बता दें कि बीते दिनों राजस्थान हाईकोर्ट ने भी मुख्यमंत्री राजे की इस रैली में सरकारी संसाधनों का उपयोग न करने को लेकर सख़्त निर्देश ज़ारी किए थे. सत्र के तीसरे और आख़िरी दिन डोटासरा ने किसानों की कर्ज़ माफी की घोषणा में अनियमितता और पेट्रोल-डीज़ल की बढ़ती कीमतों की वजह से किसानों को हो रही परेशानियों से जुड़ा स्थगन प्रस्ताव दिया. लेकिन यह भी स्थगित हो गया.

राजस्थान विधानसभा में चली आ रही परंपराओं का हवाला देते हुए डोटासरा बताते हैं कि सूबे में हमेशा से विपक्षी दल ही स्थगन प्रस्ताव लाता रहा है. इसके नियमानुसार होने पर प्रश्नकाल के तुरंत बाद सदन की अन्य कार्यवाही को रोकते हुए स्थगन प्रस्ताव पर प्राथमिकता से चर्चा की जाती है जिस पर सरकार का जवाब आवश्यक होता है. डोटासरा आगे जोड़ते हैं कि किसान हितैषी होने का दावा करने वाली भाजपा ने उनसे जुड़े प्रस्ताव को स्थगित कर अपनी नीयत को उज़ागर कर दिया है. सत्याग्रह से बातचीत में वे कहते हैं, ‘सरकार घोटालों का जवाब नहीं देना चाहती... आखिरी सत्र को छोड़ कर मुख्यमंत्री राजे राजनैतिक यात्राओं में मशगूल हैं. यह दिखाता है कि विधानसभा के प्रति सरकार कितनी गंभीर है.’

विधानसभा में जिन अन्य विधायकों के सवाल निरस्त किए गए उनमें नागौर जिले के खींवसर क्षेत्र से आने वाले विधायक और कद्दावर जाट नेता हनुमान बेनीवाल भी शामिल हैं. बेनीवाल का सवाल सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद राजस्थान में पूर्व मुख्यमंत्रियों द्वारा सरकारी बंगले खाली नहीं करने से जुड़ा था. बीते दिनों सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी बंगले खाली करने का आदेश दिया था. लेकिन राजस्थान में कांग्रेस के अशोक गहलोत और मौजूदा मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने अपने पिछले कार्यकाल में आवंटित बंगले अभी तक खाली नहीं किए हैं. इस तरह राजे के पास अब दो सरकारी बंगले हैं जिनमें से वे मौजूदा की बजाय पुराने बंगले में ही रहती हैं. विधानसभा के अलावा राजधानी जयपुर के जिन सरकारी भवनों में किसी ‘ऊपरी चक्कर’ से जुड़ी अफवाहों की चर्चा गर्म रहती हैं उनमें मौजूदा मुख्यमंत्री का नया बंगला भी शामिल है.

चौदहवीं विधानसभा में राजस्थान सरकार ने न सिर्फ सवालों को स्थगित किया बल्कि एक कदम आगे जाते हुए इसी जुलाई में पिछली चार विधानसभाओं से चले आ रहे चार हज़ार से ज्यादा सवालों को पूरी तरह ख़त्म यानी ड्रॉप भी कर दिया. जानकार बताते हैं कि इन सवालों में सरकार के इस कार्यकाल से जुड़े सवाल भी बड़ी संख्या में शामिल थे. प्रदेश के राजनीतिकारों की मानें तो राजस्थान में पहली बार किसी सरकार द्वारा इतनी बड़ी संख्या में सवालों को इस तरह ख़त्म किया गया है.

इस निर्णय के पीछे प्रदेश भाजपा नेताओं के पास अलग-अलग तर्क़ हैं. इनमें सवालों का औचित्य ख़त्म होने से लेकर विधायकों के पद पर नहीं रहने या उनके गुज़र जाने जैसी दलीलें शामिल हैं. इस पर राजनीतिकारों का कहना है कि शायद भाजपा के नेता यह भूल गए हैं कि वे सवाल जनता और उसके मुद्दों से जुड़े थे न कि किसी विधायक से. उनका आरोप है कि सवालों को निरस्त करने की जल्दबाजी में सरकार ने अधिकतर सवालों की प्रासंगिकता जांचे बिना ही उन्हें औचित्यहीन घोषित कर दिया जो कि सरासर गलत है.

सत्याग्रह से बातचीत में नंदकिशोर महरिया बताते हैं कि यह पूरे देश में अपनी तरह का पहला मामला है जब इतने सारे सवालों को निरस्त कर सदन की कार्यवाही से ही हटा दिया गया. वे कहते हैं, ‘सदन के पटल पर आने के बाद कोई भी सवाल सदन की जवाबदेही होता है जिसका जवाब दिया जाना आवश्यक है. फिर चाहे उसमें कितनी ही देर क्यों न हो. लेकिन जनहित से जुड़े मुद्दों की जानकारी हर हाल में मिलनी चाहिए. भाजपा सरकार का यह कदम पूरी तरह अलोकतांत्रिक है.’ वहीं गोविंद सिंह डोटासरा का इस बारे में कहना है कि सवालों को निरस्त करने का प्रस्ताव पिछली (कांग्रेस) सरकार के समय भी आया था लेकिन तत्कालीन अध्यक्ष ने उसे स्वीकार नहीं किया. इस बारे में हनुमान बेनीवाल भी कुछ-कुछ ऐसी ही बात दोहराते हैं. वे कहते हैं कि भाजपा की सरकार ने सदन की शक्तियों का खुला दुरुपयोग किया है. बेनीवाल मौजूदा विधानसभा अध्यक्ष कैलाश मेघवाल पर भाजपा सरकार की तरफ से फैसले लेने का खुलकर आरोप लगाते हैं.

भाजपा से बाग़ी हो चुके वरिष्ठ विधायक घनश्याम तिवाड़ी को भी पिछले करीब पांच साल के दौरान सदन में उठाए अपने 25 से ज्यादा सवालों के जवाब का इंतजार है. सत्याग्रह से हुई बातचीत में तिवाड़ी कहते हैं कि उनके सभी सवाल सदन में ग्राही (स्वीकार) हो गए थे. लेकिन अध्यक्ष महोदय ने सरकार के इशारे पर उन्हें अग्राही कर दिया. तिवाड़ी की मानें तो इन सवालों में से कई उनके क्षेत्र और प्रदेश के लोगों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण थे. लेकिन उन्हें अकारण ही रोक दिया गया. इस पूरी प्रक्रिया को तिवाड़ी संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली के काले अध्याय के तौर पर देखते हैं.

वहीं नेता प्रतिपक्ष रामेश्वर डूडी का इस बारे में कहना है कि सरकार ने अपनी नाकामी छिपाने के लिए प्रश्न स्थगित करवाए हैं. डूडी कहते हैं कि जनहित के सवालों पर सरकार ने जो पलायनवादी रुख अपनाया है वह किसी सूरत में उचित नहीं ठहराया जा सकता. राजस्थान की राजनीति को लंबे समय से देख रहे वरिष्ठ पत्रकार नारायण बारेठ भी मानते हैं कि सवाल पूछना किसी भी लोकतंत्र की मजबूत बुनियाद के लिए बहुत ज़रूरी है. वे कहते हैं, ‘जनता के सवालों को इस तरह खत्म किए जाने के अभ्यास का लोकतंत्र के मंदिरों में शुरू होना न सिर्फ प्रदेश बल्कि देशभर के लिए एक खतरनाक संकेत है.’

बहरहाल, राजस्थान विधानसभा में मौजूद ‘भूतों’ ने तो शायद प्रदेश भाजपा के नेताओं को डराना छोड़ दिया है. लेकिन प्रदेश के राजनीतिकारों की मानें तो सरकार द्वारा सदन में हमेशा के लिए दफ़न किए गए सवालों का काला साया मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और उनके नेताओं को रह-रहकर सताता रहेगा.