अब तक दुनिया कम से कम इस बात के लिए भारतीयों को विस्मयभरे सम्मान की दृष्टि से देखती थी कि वे शाकाहारी होते हैं, ज़िंदा रहने के लिए किसी जीव की जान नहीं लेते. किंतु अब, विशेषकर पश्चिमी जगत को, इस बात से हैरानी हो रही है कि भारतीय भी मांसाहार के मोहजाल में फंसते जा रहे हैं. मांस खाने को वे आधुनिकता, संपन्नता और अपना आहार चुनने की स्वतंत्रता से जोड़ने लगे हैं. यहां तक कि वे अपनी ‘गऊमाता’ के मांसभक्षण में भी अब कोई दोष नहीं देखना चाहते!

पिछले कुछ वर्षों में हुए सर्वे यही बताते हैं कि भारत का एक शाकाहारी देश होना मिथक बनता जा रहा है. ‘राष्ट्रीय सैंपल सर्वे ऑफ़िस’ (एनएसएसओ) के 2011-12 के आंकड़े दिखाते हैं कि उस समय भारत में करीब आठ करोड़ लोग, यानि औसतन हर 13 में से एक भारतीय, गोमांस या भैंस का मांस भी खा रहा था. इन आठ करोड़ लोगों में सात प्रतिशत सवर्णों सहित सवा करोड़ हिंदू थे. लेकिन बाद के वर्षो में हुए तीन बड़े सरकारी सर्वे कहते हैं कि भारत में शाकाहारियों का अनुपात अब केवल 23 से 37 प्रतिशत के बीच रह गया है. यानी, देश में मांसाहारियों का अब भारी बहुमत हो गया है.

हिंदू अब सबसे बड़ा मांसाहारी समुदाय

अमेरिका में रहने वाले मानवशास्त्री बालमुरली नटराजन और भारत में उनके अर्थशास्त्री सहयोगी सूरज जैकब का एक अध्ययन कहता है कि 23 से 37 प्रतिशत वाला अनुपात भी ‘सांस्कृतिक-राजनैतिक दबाव’ के कारण बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया गया है. अप्रैल 2018 में प्रकाशित इस अधअययन के मुताबिक सच्चाई यह है कि केवल 20 प्रतिशत भारतीय अब शाकाहारी हैं. हिंदू अब सबसे बड़ा मांसाहारी वर्ग बन गये हैं. यही नहीं, 18 करोड़, यानी क़रीब 15 प्रतिशत भारतीय गोमांसभक्षी हैं – सरकारी दावे की अपेक्षा 96 प्रतिशत अधिक! भारतीय लोगों के स्वास्थ्य के बारे में अपने एक विश्लेषण में ‘इंडिया-स्पेन्ड’ का कहना है कि 80 प्रतिशत भारतीय पुरुषों और 70 प्रतिशत महिलाओं को यदि हर सप्ताह नहीं, तब भी बार-बार किसी न किसी मांसाहार का चस्का लगने लगा है.

पिछले कुछ ही वर्षों में भारत में शाकाहार की अपेक्षा कहीं महंगे मांसाहार के प्रति तेज़ी से बढ़ रहे इस मोह से संकेत मिलता है कि आलोचक कुछ भी कहें, भाजपा के शासनकाल में जनसाधारण की आय निश्चित रूप से बढ़ी है. आय के साथ संपन्नता में वृद्धि सराहनीय तो है, पर साथ ही शाकाहार पर मांसाहार के बढ़ते हुए वर्चस्व को लोगों के स्वास्थ्य और पर्यावरण की रक्षा के लिए तेज़ी से बढ़ते हुए ख़तरे के रूप में भी देखने की आवश्यकता है. इसे समझने के लिए हमें विज्ञान में हुई नई खोजों और उन पश्चिमी देशों के अनुभवों पर नज़र डालनी होगी, जहां के लोग अपने स्वास्थ्य और पर्यावरण के प्रति चिंता के कारण मांसाहार से दूर हटने लगे हैं.

जर्मनी में 10 प्रतिशत लोग शाकाहारी बन गये

सवा आठ करोड़ की आबादी वाला जर्मनी जनसंख्या की दृष्टि से यूरोप का सबसे बड़ा और संपन्नता की दृष्टि से भी एक सबसे अग्रणी देश है. यूरोप में सर्वोच्च जीवनस्तर वाले देशों के एक सर्वे में वह 2016 में तीसरे नंबर पर था. पूरी तरह मांसाहारी संस्कृति और परंपरा वाले जर्मनी में अब कम से कम 10 प्रतिशत लोग पूरी तरह शाकाहारी बन गये हैं. कुछ तो इतने विशुद्ध या कट्टर शाकाहारी बन गये हैं कि वे दूध-दही-मक्खन जैसी उस हर चीज़ से परहेज़ करते हैं, जो पशुओं या मधुमक्खियों जैसे जीव-जंतुओं से मिलती है.

ऐसे कठोर निरामिषों के लिए 1944 में अंग्रेज़ी में ‘वीगन’ नाम का एक नया शब्द गढ़ा गया था. इस बीच जर्मनी ही नहीं, अनेक पश्चिमी देशों में भी फैल रहे ‘वीगन-वाद’ को, जनसाधारण के खान-पान की आदतों में परिवर्तन लाने की एक ऐसी नयी विचारधारा भी कहा जा सकता है, जो शाकाहार को भी पूर्णतः अहिंसक बनाने के आंदोलन का रूप लेने लगी है. सुपर बाज़ारों में ‘वीगन-वादियों’ के लिए अलग से स्टैंड बनने लगे हैं और उनके लिए विशेष रेस्त्रां भी खुलने लगे हैं.

मांसाहार के पक्ष में तर्क

मांसाहार के पक्ष में सबसे बड़ा तर्क यह दिया जाता है कि हमारा शरीर पशु-पक्षियों के मांस के रूप में वह सब लगभग बना-बनाया पाता है, जो उसे अपनी ऊर्जा और शारीरिक विकास के लिए चाहिये. यह मांस उस जैविक संरचना से बहुत मिलता-जुलता है, जो हमारे शरीर की अपनी जैविक संरचना भी है, जबकि पेड़-पौधों की जैविक संरचना बहुत भिन्न प्रकार की होती है. मांस में अनेक प्रकार के अमीनो ऐसिड (अमीनो अम्ल), अनसैचुरेटेड फ़ैटी ऐसिड (असंतृप्त वसा अम्ल) ), विटामिन बी वर्ग के कई विटामिन और लौह (आयरन), जस्ते (ज़िंक) जैसे अनेक खनिज तत्व भी होते हैं जो हमारे शरीर के लिए बहुत आवश्यक हैं. हमारा 20 प्रतिशत शरीर प्रोटीन से बना होता है और प्रोटीन अमीनो ऐसिड से बनता है.

मांस और मानव शरीर में जैविक समानता

यह भी कहा जाता है कि मांस में इन सभी चीज़ों का घनत्व वनस्पतियों की अपेक्षा कहीं अधिक होता है. हमारा शरीर जैविक संरचना में काफ़ी समानता के कारण जिस सीमा तक मांसाहार को पचा कर सोख लेता है, उसी सीमा तक वह शाकाहार को पचा कर सोख नहीं कर पाता. इस संदर्भ में एक आम उदाहरण यह दिया जाता है कि 100 ग्राम गोमांस में आधा मिलीग्राम लोहा होता है, जबकि लोहे की इसी सूक्ष्म मात्रा को पाने के लिए हमें 700 ग्राम पालक खाना होगा. हमारे शरीर का 70 प्रतिशत लोहा लाल रक्तकणों और हीमोग्लोबिन तथा मांसपेशियों की मायोग्लोबीन कोशिकाओं में रहता है.

यब बात सच है कि हमारी आंतें किसी मांस में निहित 20 प्रतिशत तक लोहा सोख लेती हैं, जबकि दालों और अनाज़ों में निहित लोहे की वे केवल तीन से आठ प्रतिशत मात्रा ही सोख पाती हैं. लेकिन इस मात्रा को भोजन के साथ ऐसे फल आदि खाने से बढ़ाया जा सकता है, जिनमें विटामिन सी की अधिकता हो. यानी, लोहे के लिए मांस खाना ज़रूरत कम, बहाना अधिक है.

शाकाहार में भी सभी विकल्प उपलब्ध

मांसाहार के कुछ फायदों के बावजूद जर्मनी के आहार-विशेषज्ञों की संस्था ‘डीजीई’ की सलाह है कि वयस्कों को एक सप्ताह में 600 ग्राम से अधिक मांस नहीं खाना चाहिये. इस संस्था के आहार वैज्ञानिक मार्कुस केलर कहते हैं, ‘वास्तव में समझबूझ के साथ जुटाये गये शाकाहार से भी सभी आवश्यक पोषक तत्व मिल सकते हैं. उदाहरण के लिए उनमें उच्च रक्तचाप और रक्तवसा (कोलेस्ट्रोल) को घटाने वाले और पाचनक्रिया पर अनुकूल प्रभाव डालने वाले ऐसे माध्यमिक (सेकेंडरी) पदार्थ भी हो सकते हैं, जो केवल शाकाहार में ही संभव हैं.’

‘डीजीई’ के विशेषज्ञों का कहना है कि शाकाहार में भी उन विटामिनों और सूक्ष्म मात्रा वाले खनिज तत्वों के विकल्प उपलब्ध हैं, जिन्हें मांसाहार की विशेषता बताया जाता है. उदाहरण के लिए पालक में लोहा ही नहीं कैल्शियम भी होता है. यही कैल्शियम करमसाग (अंग्रेज़ी में केल) और बथुआ (अरूगुला) में भी होता है. दालों से भी लोहे की सारी कमी पूरी की जा सकती है. आयोडीन के लिए आयोडीन वाला नमक लिया जा सकता है. जस्ता (ज़िंक) मिलेगा गेहूं और जौ के चोकरदार आटे तथा कुम्हड़े (कद्दू) के बीज में. विटामिन बी2 और विटामिन डी मशरूम (खुमी, कुकुरमुत्ता) में मिलता है.

अमेरिका और यूरोप में हुए अध्ययन

अमेरिका में हारवर्ड विश्वविद्यालय के महामारी विशेषज्ञों ने 12 लाख लोगों पर हुए 20 अध्ययनों का विश्लेषण किया. 2012 में उन्होंने बताया कि गाय, भैंस, भेड़, बकरी और सूअर जैसे जानवरों के लाल रंग के मांस (रेड मीट) को य़दि औद्योगिक ढंग से प्रसंस्कृत (प्रॉसेस) किया गया है, तो ऐसे मांस की प्रतिदिन केवल 50 ग्राम मात्रा भी हृदयरोगों की संभावना 42 प्रतिशत और मधुमेह (डायबिटीज) की संभावना 19 प्रतिशत बढ़ा देती है. अनुमान है कि ऐसा संभवतः नमक, नाइट्रेट और उन अन्य पदार्थों के कारण होता है, जो प्रसंस्करण के दौरान मांस में मिलाये जाते हैं.

यूरोप में पांच लाख से अधिक लोगों के बीच एक दीर्घकालिक अध्ययन में पाया गया कि जो लोग गाय, भैंस, भेड़, बकरी इत्यादि वाले ‘प्रोसेस्ड रेड मीट’ के बजाय घर में पकाये गये सादे ‘रेड मीट’ के रसिया हैं, वे भी अपने आप को सुरक्षित नहीं मान सकते. उन्हें आंत का कैंसर होने की संभावना बढ़ जाती है. ‘ यूरोपियन पर्स्पेक्टिव इनवेस्टिगेशन इनटू कैंसर’ (यूरोपीय कैंसर संभावना जांच/ ईपीआईसी) नाम के इस अध्ययन में पाया गया कि जो लोग प्रतिदिन 100 ग्राम ‘रेड मीट’ खाते हैं, उनके लिए आंत का कैंसर होने का ख़तरा 49 प्रतिशत तक बढ़ जाता है.

शाकाहारी प्रायः दीर्घजीवी होते हैं

जर्मनी के गीसन विश्वविद्यालय, हाइडेलबेर्ग के परमाणु शोध संस्थान और जर्मन स्वास्थ्य कार्यालय ने 1980 वाले दशक में शाकाहार के लाभ-हानि के बारे में एक-दूसरे से अलग तीन बड़े अध्ययन किये. वे यह देख कर चकित रह गये कि शाकाहारियों का रक्तचाप और शारीरिक वज़न बहुत अनुकूल पाया गया. उन्हें कैंसर और हृदयरोग होने की संभवना बहुत कम थी और उनके दीर्घजीवी होने की संभावना उतनी ही अधिक.

लंदन के ‘स्कूल ऑफ़ हाइजिन ऐन्ड ट्रॉपिकल मेडिसिन’ ने भी 11 हज़ार शाकाहारियों के साथ 12 वर्षों तक चला एक ऐसा ही अध्ययन किया. इन शाकाहारियों की तुलना एक ऐसे ग्रुप के लोगों से की गयी, जो मांसाहारी थे, पर उनका रहन-सहन और सामाजिक दर्जा शाकाहारियों जैसा ही था. इस अध्ययन के परिणाम भी, 1980 वाले दशक में जर्मनी में हुए, ऊपर वर्णित परिणामों जैसे ही निकले.

शाकाहारियों की मृत्यु दर मांसाहारियों से कम

लंदन के शोधकर्ताओं ने पाया कि शाकाहारियों में रक्तचाप, रक्तवसा (कोलेस्ट्रोल) और यूरिक ऐसिड (मूत्राम्ल) का स्तर मांसाहारियों से बेहतर निकला. उनके हृदय और गुर्दे मांसाहारियों की अपेक्षा अधिक स्वस्थ थे. शाकाहारियों के बीच मृत्यु दर मांसाहारियों की तुलना मे 20 प्रतिशत कम और कैंसर होने के मामले 40 प्रतिशत कम देखे गये. अध्ययनकर्ताओं ने यह भी कहा कि अध्ययन में शामिल शाकाहरियों में विटामिन, प्रोटीन या खनिज तत्वों जैसी किसी भी महत्वपूर्ण चीज़ का अभाव नहीं था. उनका स्वास्थ्य औसत से कहीं बेहतर था.

अमेरिका का राष्ट्रीय कैंसर संस्थान (एनसीआई) हाल ही में इस नतीजे पर पहुंचा है कि मांसाहार कैंसर, हृदयरोगों, सांस की बीमारियों, लकवे (ब्रेनस्ट्रोक), मधुमेह (डायबेटीस) , अल्त्सहाइमर (विस्मृति रोग), यकृत (लीवर) और गुर्दे (किडनी) की बीमारियों जैसी कम से कम नौ प्रकार की बीमारियों का कारण बन सकता है.

पाचनतंत्र के बैक्टीरियाओं में अंतर

अमेरिका की ही ‘यूनिवर्सिटी ऑफ़ न्यूयॉर्क’ के शोधकर्ताओं को सामान्य शाकाहारियों और ‘वीगन’ कहलाने वाले परम शाकाहारियों के पाचनतंत्र की आंतों में, मांसाहारियों की आंतों की अपेक्षा, ऐसे बैक्टीरिया अधिक मात्रा में मिले, जो आंतों को सुरक्षा प्रदान करते हैं. हमारे शरीर के पाचनतंत्र में एक किलो से कुछ अधिक ही विभिन्न प्रकार के ऐसे सूक्षम जीवाणु भी होते हैं, जो भोजन को पचाने में सहायक बनते हैं. उनमें से कुछ ऐसे भी हैं, जो प्रकिण्वन क्रिया (फ़र्मन्टेशन) लायक फलों या अन्य खाद्यपदार्थों को गला कर विटामिन बी12 भी बना सकते हैं. यह एक ऐसा विटामिन है, जो अन्यथा केवल मांस में ही मिलता है.

कई दूसरे अध्ययनों से यह बात बार-बार सिद्ध हो चुकी है कि मांसाहारियों की अपेक्षा शाकाहारियों को उच्च रक्तचाप और मधुमेह की शिकायत होने तथा गुर्दे (किडनी) या पित्ताशय (गालब्लैडर) में पथरी बनने की संभावना कम होती है.

एक ऐसी भी खोज है, जो विचित्र और अविश्वसनीय भले ही लगे, पर सच हैः चेक गणराज्य में प्राग विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने जानना चाहा कि शाकाहारी और मांसाहारी महिलाओं तथा पुरुषों के शरीर की गंध में भी क्या कोई अंतर होता है. उन्होने पाया कि अंतर होता है. शाकाहारी पुरुषों- महिलाओं के शरीर की ही नहीं, उनके पसीने की गंध भी मांसाहारी पुरुषों- महिलाओं की अपेक्षा सुखद होती है! मनोवैज्ञानिक अध्ययनों में देखा गया कि शाकाहरियों का हृदय अपेक्षाकृत जल्दी द्रवित होता है और मांसाहारियों में हिंसाभाव कुछ ज़्यादा ही होता है.

संतुलित शाकाहारी भोजन

सवाल उठता है कि क्या अच्छे स्वास्थ्य और लंबे जीवनकाल के लिए शाकाहारी होना ही पर्याप्त है? पश्चिमी देशों के डॉक्टरों और आहार विशेषज्ञों का कहना है कि मात्र शाकाहारी भोजन ही सब कुछ नहीं है. अच्छे स्वास्थ्य के लिए संतुलित शाकाहारी भोजन होना चाहिये.

संतुलित शाकाहारी भोजन का अर्थ है, भोजन में दाल-चावल, साग-सब्ज़ी और रोटी ही नहीं, अदल-बदल कर दूध-दही, फल-फूल, कंदमूल इत्यादि का भी स्थान होना चाहिये. इस बात पर भी ध्यान दिया जाना चाहिये कि किस खाद्यपदार्थ में कौन-सा विटामिन है, कितना प्रोटीन है और कौन-सा खनिज तत्व किस चीज़ से मिलेगा. उदाहरण के लिए दालों से सबसे अधिक प्रोटीन, फलों और सब्ज़ियों से सबसे अधिक विटामिन और सूखे मेवों से सैचुरेटेड फैट मिलते है. प्रोटीन की औसत दैनिक आवश्यकता 50 ग्राम के बराबर बतायी जाती है, जो दालों से आसानी से पूरी की जा सकती है.

यह भी देखना चाहिये कि किस चीज़ को किस तरह पकाया जाये कि उसके विटामिन, प्रोटीन इत्यादि बने रहें, नष्ट न हों. काली चाय, कॉफ़ी और चॉकलेट से बचना तथा प्याज़ और लहसुन का अधिक उपयोग नहीं करना चाहिये, क्योंकि ये चीज़ें लोहे के अवशोषण में बाधा डालती हैं. शाकाहारी होने के साथ-साथ सिगरेट और शराब जैसी चीज़ों से दूर रहना, खुली हवा में चलना-फिरना और थोड़ा-बहुत व्यायाम करना भी अच्छे स्वास्थ्य और लंबी आयु के लिए ज़रूरी है.

मांसाहार संसाधनों की बर्बादी है

मांसाहारियों की भूख मिटाने के लिए जुगाली करने वाले जिन पशुओं को पाला जाता है, वास्तव में वे सब घास-पात खाने वाले शाकाहारी पशु हैं. वे अपने शरीर में अधिकांशतः उन्हीं शाकाहारी चीज़ों को मांस में बदलते हैं, जिन्हें अंशतः हम भी खाते हैं. यानी हम और अधिक ऊर्जा, श्रम, संसाधन और समय लगा कर मांस के रूप में मिल-मिलाकर वही चीज़ें खा रहे होते हैं, जिन्हें इस सारे झमेले के बिना, शाकाहार के रूप में, सीधे-सीधे भी खा सकते थे. यह ऊर्जा और संसाधनों की बर्बादी नहीं तो और क्या है?

मांस देने वाले पशुओं को कम से कम समय में अधिक से अधिक बड़ा और मोटा-तगड़ा करने के लिए तरह-तरह के हॉर्मोन और एन्टीबायॉटिक दवाएं भी दी जाती हैं. उनके मांस के साथ इन दवाओं का कुछ न कुछ अंश मांस खाने वाले के शरीर में भी पहुंचता है और कई बार वह भी किसी बीमारी या शारीरिक विकृति का कारण बनता है.

मांस में हॉर्मोन और दवाएं

जर्मनी के अधिकारियों का मानना है कि जर्मन पशुपालक अपने सूअरों को प्रतिवर्ष औसतन छह बार तथा गायों-बछड़ों व अन्य दुधारु पशुओं को दो बार एन्टीबायॉटिक दवाएं देते हैं. हर मुर्गे-मुर्गी को भी काटने का दिन आने तक औसतन दो बार यही दवाएं दी जाती हैं. ‘जर्मन पर्यावरण और प्रकृतिरक्षा संघ’ का मानना है कि जर्मनी के पशुपालक, देश के अस्पतालों की अपेक्षा, 40 गुना अधिक एन्टीबायॉटिक दवाएं खपाते हैं. इन दवाओं का एक बड़ा अंश घूमफिर कर मांसाहारियों के पेट में ही पहुंचता होगा! यही स्थिति अन्य पश्चिमी देशों में भी है.

हो सकता है कि भारत की गायों-भैंसों को ऐसी दवाएं न दी जाती हों. पर, चारे के नाम पर जो गाय-बकरियां कूड़ा-करकट खाती दिखती हैं, क्या उस कूड़े के हानिकारक पदार्थ मांस के साथ मांसभक्षियों के पेट में नहीं पहुंचते होंगे? वे कैंसर जैसी बीमारियों का कारण नहीं बनते होंगे? कूड़ा-करकट खाने वाले पशुओं को स्वयं भी तो कैंसर जैसी बीमारियां हो सकती हैं, जिनका बाहर से देखने पर पता नहीं चले, पर जो उनका मांस खाने वालों को भी बीमार कर सकती हैं. अफ्रीकी देशों में अत्यंत प्रणघातक ‘इबोला’ ओर ‘हांटा’ वायरस वाले रोग तथा अन्य देशों में आतंक फैला चुकी ‘बर्ड फ्लू’ और ‘श्वाइन फ्लू’ जैसी महामारियां पशुओं को होने वाली या उनके शरीर में छिपी बीमारियों के ऐसे ही भयावह उदाहरण हैं.

जलवायु और पर्यावरण को क्षति

मांसाहार की मांग बढ़ने से न केवल बीमारियां बढ़ती हैं, जलवायु और पर्यावरण को पहले से ही पहुंच रही क्षति में भी भारी बढ़ोतरी होती है. विशेषकर गोमांस-भक्षियों को सोचना चाहिये कि गायें-भैंसें केवल घास-फूस खाकर ही नहीं जीतीं. उन्हें चारे के रूप में गेहूं, मकई, जौ इत्यादि उन अनाजों के दाने भी खिलाने पड़ते हैं, जो शाकाहारी भोजन का भी हिस्सा हैं.

पर्यावरणरक्षक संस्था ‘वर्ल्ड वाइल्डलाइफ़ फ़न्ड’ (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ़) ने, उदाहरण के लिए, यूरोपीय गायों के बारे में हिसाब लगाया है कि उनमें एक किलो मांस बनने में कई-कई किलो चारा और 15,455 लीटर पानी लग जाता है. ‘वर्चुअल वॉटर’ (परोक्ष पानी) या ‘वॉटर फुटप्रिन्ट’ (जल-पदचिन्ह) कहलाने वाला यह पानी चारे को उगाने, गायों को पिलाने, उनकी और गौशाला की साफ़-सफ़ाई करने जैसे उन अनेक कामों के रूप में ख़र्च होता है, जो मांस में दिखाई नहीं पड़ता. वधशाला में कटने तक हर गाय औसतन 1,300 किलो अनाज और 7,200 किलो भूसा इत्यादि खा चुकी होती है. कटने तक हर गाय ने औसतन 24 घनमीटर पानी पीया होता है और सात घनमीटर पानी गौशाला में उसे बांधने की जगह को साफ़ करने पर ख़र्च हो चुका होता है.

भूगर्भीय पेयजल प्रदूषित होता है

गायों पर ख़र्च हुए पानी का अधिकांश भाग ग़ंदा पानी बन कर ज़मीन में रिसता और भूगर्भीय पेयजल को प्रदूषित करता है. गायों को दी गयी दवाओं का एक बड़ा हिस्सा भी उनके मल-मूत्र के साथ भूगर्भीय पानी में मिश्रित होता है. यूरोप के अधिकांश शहरों में पेयजल की आपूर्ति का मुख्य स्रोत भूगर्भीय जल ही है. जो कुछ गायों के बारे में सच है, भारत के संदर्भ में वह भैंसों के बार में भी सच होना चाहिये. पश्चिमी देशों में भैंसें नहीं पाली जातीं.

गायों को इतना अधिक चारा चाहिये कि यूरोप में उस चारे का एक बड़ा हिस्सा अफ्रीका ओर लैटिन अमेरिका के देशों से आयात किया जाता है. इन देशों में और स्वयं यूरोप में भी चारे को उगाने के लिए वनों की कटाई होती है. इससे न केवल कार्बन डाईऑक्साइड को बांधने वाले पेड़ घट रहे हैं, वनों की ह्युमस मिट्टी में बंधा कार्बन डाईऑक्साइड भी हवा में मुक्त हो कर वैश्विक तापमान बढ़ा रहा है. यह सारी बातें यूरोप-अमेरिका जितनी न सही, तब भी संसार का सबसे बड़ा पशुपालक देश होने के नाते भारत में भी तो हो रही होंगी!

गायें मीथेन गैस उत्सर्जित करती हैं

‘वर्ल्ड वाइल्डलाइफ़ फ़न्ड’ का यह भी कहना है कि हर गाय हर दिन 200 लीटर मीथेन गैस उत्सर्जित करती है. मीथेन की तापमान बढ़ाने की क्षमता कार्बन डाईऑक्साइड की अपेक्षा 25 गुना ज्यादा होती है. दूसरे शब्दों में, हर गाय हर दिन अपनी मीथेन गैस द्वारा जलवायु को जो नुकसान पहुंचा रही है, वह किसी छोटी कार द्वारा पूरे साल में 18,000 किलोमीटर चलने से निकले धुएं से हुए नुकसान के बराबर है.

जर्मनी के संघीय पर्यावरणरक्षा कार्यालय ने 2016 की अपनी एक रिपोर्ट मे कहा कि मांस के लिए पशुपालन ही जर्मनी में मीथेन गैस और डाईनाइट्रस-मोनो ऑक्साइड के उत्सर्जन का मुख्य स्रोत है. रिपोर्ट के अनुसार, एक किलो गोमांस बनने की प्रक्रिया में 7 से 28 किलो तक तापमानवर्धक गैसें उत्सर्जित होती हैं, जबकि एक किलो फल या साग-सब्ज़ियां पैदा करने से एक किलो से भी कम ऐसी गैसें बनती हैं. तब भी, बिक्रीकर में रियायत के रूप में मांस को जर्मनी में जो मूल्यसमर्थन मिल रहा है, वह 57 अरब यूरो है. ध्यान देने की बात यह है कि यह रियायत जर्मनी के रक्षाबजट से भी 20 अरब यूरो अधिक है!

इसी प्रकार की एक दूसरी तुलना यह है कि पृथ्वी पर हम अपने भोजन के द्वारा जो तापमानवर्धक गैसें पैदा करते हैं, उनकी 70 प्रतिशत मात्रा के लिए मांसाहारी और केवल 30 प्रतिशत के लिए शाकाहारी खाद्यपदार्थ ज़िम्मेदार हैं. अकेले इसी अनुपात को उलट देने से न केवल अनेक बीमारियों से मुक्ति मिल सकती है, तापमान बढ़ाने वाली गैसों के उत्सर्जन में प्रतिवर्ष अरबों टन की कमी भी लायी जा सकती है.

सभी लोग शाकाहारी बन जायें, तब क्या होगा?

ब्रिटेन में ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय के डॉ. मार्को स्प्रिंगमैन वैश्विक आहार रूझानों के सबसे जाने-माने शोधकों में से एक हैं. उनका कहना है कि लोगों की आय बढ़ने, शहरीकरण और वैश्वीकरण के कारण विकासशील देशों के लोगों का खान-पान मांसाहारी पश्चिमी देशों जैसा ही बनता जायेगा. इससे विश्व के आहारतंत्र को भविष्य में भारी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा. लेकिन दुनिया के सभी लोग यदि मांसाहार त्याग दें, तो परिणाम चमत्कारिक होंगे!

मार्को स्प्रिंगमैन की टीम ने पाया कि तब 2050 आने तक हर वर्ष 73 लाख मौतें कम हो जायेंगी. वैश्विक मृत्युदर सात प्रतिशत घट जायेगी. ऐसा इसलिए, क्योंकि जो लोग मांस के बदले फल-फूल और सब्ज़ियां खा कर जीते हैं, उन्हें मोटापे की शिकायत और हृदयरोग काफ़ी कम होते हैं. खाद्य पदार्थों के उत्पादन के कारण इस समय जितनी तापमानवर्धक गैसें वायुमंडल में पहुच रही हैं, सब के शाकहारी बन जाने से उनकी मात्रा भी दो-तिहाई कम हो जायेगी. 70 प्रतिशत पानी की भी बचत होगी. पृथ्वी पर रहना-जीना आज की अपेक्षा काफ़ी सुखद बन जायेगा.

मांसाहार के अंत से पैसे की भारी बचत

मार्को स्प्रिंगमैन की टीम ने हिसाब लगाया कि मांसाहार का अंत हो जाने से स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाले ख़र्च और जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाले नुकसानों में 2050 तक इतनी कमी आ जायेगी कि पूरे विश्व में हर साल कुल मिला कर डेढ़ खरब डॉलर की बचत हो सकती है. अकेले स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाले ख़र्च में ही जो कमी आयेगी, वह 2050 के लिए अनुमानित सभी देशों के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) को जोड़ देने से प्राप्त धनराशि के तीन प्रतिशत के बराबर होगी.

इन वैज्ञानिकों ने यह भी पाया कि अगरदुनिया मांसाहार छोड़ कर 2050 तक शाकाहारी बन सके, तो 20 अरब मुर्गे-मुर्गियों, डेढ़ अरब गायों, एक-एक अरब भेड़ों और सुअरों की न तो जान लेनी पड़ेगी और न इन सब को रखने-पालने की ज़रूरत रह जायेगी. इस समय इन सभी जानवरों को रखने-पालने से तीन करोड़ 30 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल के बराबर ज़़मीन फंसी हुई है. अकेले यह ज़मीन ही, जिस पर फिर पेड़ लगाकर तापमानवर्धक गैसों की मात्रा को और अधिक घटाया जा कता है, पूरे अफ्रीका महाद्वीप के क्षेत्रफल के बराबर है, चरागाहों की ज़मीन इसमें शामिल नहीं है.

जलवायु को बचाना है, तो मांसाहार का संहार हो

संयुक्त राष्ट्र कृषि संगठन ‘एफ़एओ’ का भी यही मानना है कि यदि शाकारहार के बदले मांसाहार का वर्चस्व बना रहा, तो विश्व की बढ़ रही जनसंख्या की आहार समस्या 2050 तक और भी विकराल हो जायेगी. जिन के पास पैसा होगा, वे मांस खा-खा कर मोटे और बीमार होंगे, और जिनके पास पैसा नहीं होगा वे कुपोषण के शिकार होंगे.

हमारा खान-पान ही जलवायु बदलने वाले उस उत्सर्जन के आधे हिस्से के लिए ज़िम्मेदार होगा, जो वैश्विक तापमान को दो डिग्री से अधिक बढ़ने से रोकने की सीमारेखा है. यानी, जलवायु को बचाना है, तो मांसाहार का संहार करना होगा. मांसाहार का विकल्प शाकाहार है, पर जलवायु का कोई विकल्प नहीं है. जलवायु साथ नहीं देगी, तो मांस हेतु पशुपालन के लिए चारा-पानी जुटाना भी दूभर हो जायेगा.

हर साल 30 करोड़ टन मांस की डकार

इस समय संसार भर के मांसाहारी हर साल 30 करोड़ टन मांस डकार जाते हैं. आशंका यही है कि यह अकल्पनीय मात्रा घटने की जगह बढ़ते हुए, 2050 तक, 50 करोड़ टन हो जायेगी. इसके लिए जिन पशुओं को पहले पाला और फिर काटा जायेगा, उनके चारे के लिए अकेले सोयाबीन की विश्वव्यापी उपज को दोगुना कर देना पड़ेगा. अकेले सोयाबीन की खेती के लिए और अधिक भूमि, और अधिक पानी तथा और अधिक खादों की ज़रूरत पड़ेगी. यह साब खा कर मांस देने वाले पशु और अधिक तापमानवर्धक गैसें हवा में फैलायेंगे.

जब भीषण गर्मी से लोग कराहेंगे, आंधी-पानी के साथ बाढ़ आयेगी या भीषण सूखा पड़ेगा, तब कोई मांसाहारी याद नहीं करेगा कि इसमें उसके अपने पेट में गये चिकन, मटन या गोमांस का कितना अनावश्यक योगदान है! वह बड़े गर्व के साथ और संभवतः मुंहफट हो कर बॉलीलुड अभिनेता ऋषि कपूर की तरह यही कहेगा कि ‘मैं क्या खाता हूं, यह मेरा निजी मामला है. दूसरों को इससे कोई मतलब नहीं होना चाहिये.’ दूसरों को, यानी शाकाहारियों को, इससे बेशक कोई मतलब नहीं होता, यदि उन पर भी बढ़े हुए तापमान और उन्मत्त मौसम की मार नहीं पड़ती. कार चलाने वाले भी यही सोचते हैं कि कार चलाना उनका स्वतंत्र निर्णय व निजी अधिकार है. पर उनकी कार से निकले धुंए की मार उन सब लोगों के फेफड़ों पर भी पड़ती है, जिन्हें बिना-कार स्वच्छ हवा में जीने का जन्मसिद्ध अधिकार है.