28 मई 2008 को जब नेपाल में राजशाही का अंत हुआ था तो वहां की सड़कों पर लाखों लोगों की खुशी देखने लायक थी. दो साल तक आंदोलन करने वाले नेपाल के लोग तब हर हाल में एक लोकतांत्रिक व्यवस्था चाहते थे. हालांकि, राजशाही के अंत के बाद भी अगर नेपाल में कोई विशेष बदलाव नहीं देखने को मिला तो इसकी बड़ी वजह राजनीतिक स्थिरता का न होना था. राजशाही खत्म होने के बाद बीते 10 सालों में यहां के लोग 10 प्रधानमंत्री देख चुके हैं.

इस साल की शुरुआत में हुए चुनाव में भी सबसे बड़ा मुद्दा यही था. नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एनसीपी) के कद्दावर नेता केपी ओली इस दौरान कई बार लोगों को यह समझाते दिखे कि देश के विकास के लिए राजनीतिक स्थिरता का होना बहुत जरूरी है. चुनाव में जनता ने उनकी सुनी भी और दो-तिहाई बहुमत के साथ देश की कमान उनके हाथ में सौंप दी.

राजशाही के बाद पहली बार बनी पूर्ण बहुमत की इस सरकार से लोगों को काफी उम्मीदें थीं. लेकिन, शुरुआती छह महीनों में इस सरकार ने जो काम किए हैं उसने नेपाल के लोगों को देश के आखिरी राजा ज्ञानेंद्र के समय की याद दिला दी है. ओली सरकार ने जिस तरह की नीतियां बनाई हैं, उनसे देश में नागरिक स्वतंत्रता के लिए खतरा पैदा हो गया है.

गैर सरकारी संगठनों पर सरकार का शिकंजा

बीते अप्रैल में सरकार ने नई नेशनल इंटेग्रिटी पॉलिसी पेश की. इसका मकसद सरकारी और निजी क्षेत्र में भ्रष्टाचार, हितों के टकराव और सार्वजनिक पदों के दुरुपयोग को रोकना है. लेकिन, इसमें मौजूद नियमों का न सिर्फ देश में बल्कि पूरी दुनिया में विरोध हो रहा है. जानकारों की मानें तो इस नीति के लागू होने के बाद नेपाल में देशी-विदेशी समाजसेवी संस्थाओं (एनजीओ) की लगभग सभी गतिविधियों पर सरकार का नियंत्रण हो जाएगा.

प्रस्तावित नीति के मुताबिक अंतरराष्ट्रीय एनजीओ को नेपाल में उन परियोजनाओं में शामिल होने की अनुमति नहीं होगी जिनसे नेपाल में कानून और नीतियां प्रभावित होती हैं. साथ ही उन्हें अपने देशों में स्थित मुख्यालयों को कोई रिपोर्ट भेजने से पहले नेपाल सरकार की मंजूरी लेना अनिवार्य होगा. इसमें यह भी कहा गया है कि सभी एनजीओ के लिए किसी प्रोजेक्ट में फंड खर्च करने से पहले सरकार की मंजूरी लेना जरूरी होगा. इसके अलावा उन्हें नियमित रूप से अपने कर्मचारियों से जुड़ी वित्तीय जानकारियां देने के लिए भी कहा गया है. सरकार का यह भी कहना है कि अगर कोई एनजीओ देश में किसी धर्म का प्रचार करता है तो उसे तुरंत बैन कर दिया जाएगा.

नेशनल इंटिग्रिटी पॉलिसी-2018 को लेकर विदेशी एनजीओ से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि अगर यह प्रस्तावित नीति पारित होती है तो इससे नेपाल में उनके द्वारा चलाए जा रहे विकास कार्य बुरी तरह प्रभावित होंगे. 200 से ज्यादा देशों में कार्यरत स्विस एनजीओ ‘कर्टिस’ के नेपाल मामलों के निदेशक बर्ड स्काफेर एक समाचार पत्र से कहते हैं, ‘यह जो कुछ हो रहा बहुत अजीब है. अगर यह नीति दस्तावेज इसी रूप में पारित होता है तो हम में से अधिकांश अपना बोरिया बिस्तर बांधकर अपने देश लौटने को मजबूर हो जायेंगे.’

संयुक्त राष्ट्र और कई देशों ने नेपाल सरकार से प्रस्तावित नीति को बदलने की अपील की है. लेकिन, नेपाल सरकार ने इस अपील पर जो प्रतिक्रिया दी है उससे नहीं लगता कि सरकार इस नीति में कोई बदलाव करेगी. इस अपील पर नेपाल के प्रधानमंत्री केपी ओली का कहना था, ‘अभी तो यह नीति लागू नहीं हुई है और इन सभी ने चिल्लाना शुरू कर दिया है...इन्हें समझना होगा कि नेपाल एक स्वतंत्र देश है और हम अच्छे से जानते हैं कि हमें अपने देश को कैसे आगे ले जाना है.’

देश में विरोध प्रदर्शनों पर रोक

नेपाल की वामपंथी सरकार ने पिछले दिनों एक और ऐसा निर्णय लिया है जिसकी पूरे देश में जमकर आलोचना हो रही है. सरकार ने सार्वजनिक स्थानों पर किसी भी तरह का विरोध जताने पर प्रतिबंध लगा दिया है. बीते अप्रैल में सरकार ने इसकी शुरुआत करते हुए केवल काठमांडू में ही ऐसा किया था. लेकिन, पिछले दिनों उसने देश के 77 जिलों में प्रदर्शन करने पर रोक लगाने का फरमान जारी कर दिया. नेपाली मीडिया के मुताबिक अब हालात यह हैं कि देश में कहीं भी कोई शांति से भी प्रदर्शन करता है तो उसे तुरंत पुलिस उठा ले जाती है.

न्यायपालिका में सरकार का दखल

केपी ओली सरकार ने बीते अगस्त में एक और ऐसा काम किया जो इससे पहले कोई भी सरकार करने की हिम्मत नहीं जुटा पायी थी. ओली सरकार ने देश के सबसे स्वतंत्र संस्थानों में से एक ‘सुप्रीम कोर्ट’ के मामले में भी दखल दे दिया. सत्ताधारी पार्टी के वर्चस्व वाली एक संसदीय समिति ने मुख्य न्यायाधीश के लिए की गई दीपक राज जोशी के नाम की सिफारिश को मानने से इनकार कर दिया. सांसदों का कहना था कि जोशी इस पद के योग्य नहीं हैं. इस पूरे मामले में चौंकाने वाली बात यह भी है कि इससे एक महीने पहले ही सरकार ने दीपक राज जोशी को बेहद ईमानदार और सिद्धांतवादी बताते हुए उन्हें मुख्य न्यायाधीश के पद के लिए सबसे योग्य उम्मीदवार बताया था.

नेपाल बार एसोसिएशन ने संसदीय समिति के इस फैसले निंदा करते हुए गंभीर चिंताएं जताई हैं. उसने इसे न्यायपालिका के मामलों में सरकार का सीधा हस्तक्षेप करार दिया है. बार एसोसिएशन के पदाधिकारियों ने दावा किया है कि सरकार का यह फैसला पूरी तरह से राजनीतिक विचारधारा और पार्टी राजनीति से प्रेरित है.

मीडिया पर भी शिकंजा

एनजीओ और न्यायपालिका में दखल देने के बाद ओली सरकार का अगला टारगेट देश का मीडिया बना है. बीते 17 अगस्त को सरकार ने देश में नया आपराधिक कानून लागू किया है जिसने पूरे मीडिया जगत की नींद उड़ा कर रख दी है. विश्लेषकों का कहना है कि यह कानून नेपाल में प्रेस की आजादी को खत्म कर देगा.

इस कानून में कहा गया है कि किसी व्यक्ति विशेष की निजी जानकारी या किसी अन्य गोपनीय जानकारी को सार्वजनिक रूप से बताना एक अपराध माना जाएगा. दो या दो से अधिक लोगों के बीच की बातचीत को उनकी सहमति के बिना सुनना या रिकॉर्ड करना और किसी की सहमति के बिना उसकी फोटो खींचना भी अपराध की श्रेणी में आएगा. नए कानून में किसी व्यक्ति पर व्यंग्य लिखने को भी सजा योग्य अपराध माना गया है. कानून का उल्लंघन करने वाले पत्रकारों को 30 हजार रुपये तक का जुर्माना और तीन साल तक की जेल का सामना करना पड़ सकता है.

नेपाल के वरिष्ठ पत्रकार और नेपाल प्रेस यूनियन के अध्यक्ष बद्री सिगदल एक साक्षात्कार में कहते हैं, ‘यह पूरी तरह संविधान का उल्लंघन है जिसका एक मात्र लक्ष्य प्रेस को नियंत्रित करना है. यह एक संकेत भी है कि कैसे कम्युनिस्ट सरकार धीरे-धीरे देश में तानाशाही शासन लागू कर रही है.’

पत्रकारों को संरक्षण देने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था सीपीजे ने नेपाल सरकार से इसे बदलने की मांग की है. सीपीजे के एशिया मामलों के प्रमुख स्टीवन बटलर का कहना है, ‘नेपाल का नया आपराधिक कानून प्रेस की आजादी खत्म कर देगा. सांसदों को इसमें बदलाव करना ही चाहिए क्योंकि यह कानून तो खबरें जुटाने के साधारण तौर-तरीकों को भी अपराध बता रहा है.’

नेपाल सरकार के इस रवैये पर कुछ जानकार कहते हैं कि नेपाल के आखिरी राजा ज्ञानेंद्र को अपदस्थ किए जाने की सबसे बड़ी वजह उनके द्वारा प्रेस और नागरिक समाज की आवाज को कुचलने के लिए लाई गईं दमनकारी नीतियां थीं. इन नीतियों की वजह से ही जनता ने आंदोलन कर राजशाही का अंत कर दिया था. ये लोग कहते हैं कि ऐसे में सत्ता के मद में चूर केपी ओली की सरकार को याद रखना चाहिए कि उसकी ये नीतियां और कानून सीधे तौर पर जनता के उस आंदोलन की उपलब्धियों को खत्म करने का काम कर रही हैं. इनके मुताबिक सरकार को ये भी नहीं भूलना चाहिए कि जिन नेपालियों ने भगवान विष्णु का दर्जा दिए जाने वाले अपने राजा को नहीं बख्शा, वह अपने द्वारा चुनी गई सरकार की तानाशाही को कैसे बर्दाश्त कर सकेगी.