कहा जाता है कि लिखने वालों के लिए खुद को अभिव्यक्त करने का सबसे प्योर, सबसे शुद्ध माध्यम कविता होती है. आर्ट के दूसरे मुख्तलिफ रूपों में किसी के लिए नृत्य अभिव्यक्ति का ‘प्योरेस्ट फॉर्म ऑफ एक्सप्रेशन’ होता है तो किसी के लिए पेंटिंग. लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि फिल्मों के परिप्रेक्ष्य में किसे ‘प्योर’ सिनेमा कहा जाएगा? ‘प्यासा’ से लेकर ‘स्वदेश’ तक, और पिछले हफ्ते आई ‘गली गुलियां’ जैसी फिल्मों तक के लिए हम कहते तो हैं कि इनमें सिनेमा अपने शुद्धतम रूप में मौजूद है, लेकिन आखिर इसका मतलब क्या होता है?

1920 और 30 के दशक के फ्रांस में एक नए फिल्म मूवमेंट ने जन्म लिया था. नाम था प्योर सिनेमा (CinémaPur). उस वक्त यूरोप के कुछ प्रयोगधर्मी व रेडिकल फिल्मकारों ने मिलकर फैसला लिया कि वे सिनेमा की विशेषताओं का ही उपयोग फिल्में बनाने के लिए करेंगे, और किसी दूसरे आर्ट फॉर्म को इसमें शामिल नहीं करेंगे. चाहे वो साहित्य हो, नाटक हो या किसी भी दूसरी तरह की विजुअल आर्ट. यह मूवमेंट मूल रूप से तब की राजनीतिक उठापटक से उपजा था और कैरेक्टर, सेटिंग, संवाद व प्लॉट जैसे प्रचलित टूल्स के सिनेमा में उपयोग को बुर्जुआ चलन का हिस्सा मानता था. इसलिए इस मूवमेंट से निकली लघु व फीचर फिल्मों में केवल फॉर्म, मोशन, लाइट, विजुअल कम्पोजिशन और रिदम जैसी शुद्ध सिनेमाई विशेषताओं का उपयोग हुआ. बाद में चलकर, इस विचार के तराशे हुए स्वरूप को ही ‘आर्ट सिनेमा’ के नाम से जाना गया.

शुद्ध रूप के सिनेमा की परिभाषा वक्त के साथ बदलती रही है. अल्फ्रेड हिचकॉक का मानना था कि साइलेंट फिल्में ही सिनेमा का शुद्धतम रूप हुआ करती थीं. उनके अनुसार बोलती फिल्मों ने संवादों को इस कदर खुद में भर लिया है कि ‘सिनेमैटिक’ तरीकों से कहानी कहने की जगह पटकथा-लेखक हर थॉट को संवादों से ही व्यक्त करने का आलस दिखाने लगे हैं. जबकि सिनेमा एक ‘विजुअल मीडियम’ है और उसे छवियों के माध्यम से ही गढ़ा जाना चाहिए. संवाद सिर्फ तभी उपयोग होने चाहिए जब किसी भी दूसरे तरीके से बात समझाई न जा सके. हिचकॉक की केवल ‘साइको’ (1960) देख लीजिए, यह समझ आ जाएगा कि वे खुद भी इन विचारों पर कितना अधिक विश्वास रखते थे.

Play

आज के समय में, यथार्थ को इस तरह परदे पर रचना कि वो यथार्थ ही होने का भ्रम दे, प्योर सिनेमा की यूनिवर्सल परिभाषा सी बन गई है. संवादों की मौजूदगी जरूरी तो हो गई है, लेकिन अधिकता नहीं होनी चाहिए, और ‘सिनेमैटिक’ तरीकों से कहानी कहने पर जोर होना चाहिए. कैरेक्टर, सेटिंग और प्लॉट भी अहम हो गए हैं लेकिन लक्ष्य वही है – विजुअल मीडियम की शुद्धता सर्वोपरि है. हाल के समय में कुछ ऐसी प्रयोगधर्मी हिंदी फिल्में दोबारा देखने को मिलने लगी हैं जिनमें इस तरह के प्योर सिनेमा की झलक मिलती है या फिर वे उसके फलसफे का उपयोग कर बनाई हुई मालूम पड़ती हैं. इसलिए इस लेख में ‘तीन और आधा’ नामक फीचर फिल्म पर बात करने से पहले सिनेमा के शुद्ध रूप का लंबा-चौड़ा विवरण देना जरूरी लगा हमें.

ऐसी फिल्मों में एक तो मनोज बाजपेयी की ‘गली गुलियां’ हैं, जो बेहद कम संवादों के साथ छवियों के माध्यम से ही अपनी पूरी कथा कहती है. नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई नीरज कबी और शेफाली शाह की ‘वन्स अगेन’ भी कई प्यारे सिनेमैटिक मोमेंट्स रचती है. इसी साल के अप्रैल में आई ‘अक्टूबर’ एक कमाल का प्योर सिनेमा था जो कि मुख्यधारा के दर्शकों तक की पसंद बना. ध्यान देने वाली बात है कि नेटफ्लिक्स और दूसरे मुख्तलिफ डिजिटल मंचों के आ जाने से प्रयोगधर्मी निर्देशकों के लिए जो नए रास्ते खुल रहे हैं उनकी वजह से वे ऐसी ऑफ-बीट फिल्में बनाना दोबारा शुरू कर चुके हैं जो कुछ वक्त पहले तक बनना पूरी तरह बंद हो चुकी थीं. इंडी या हटके फिल्मों को भी त्वरित मनोरंजक होना जरूरी हो गया था ताकि उस बहाने दर्शकों को सिनेमाघरों तक लाया जा सके. लेकिन इस वजह से यह होना ज्यादा शुरू हो गया था कि निर्देशकों ने आर्ट सिनेमा के करीब वाला प्योर सिनेमा बनाना लगभग बंद कर दिया था.

‘तीन और आधा’ 2017 से कई देसी-विदेशी फिल्म फेस्टिवलों में शिरकत कर चुकी है और जल्द ही भारत में रिलीज की जाएगी. यह वो फिल्म है जिसमें जोया हुसैन का अभिनय देखकर ही अनुराग कश्यप ने उन्हें अपनी आलातरीन फिल्म ‘मुक्काबाज’ की मुख्य नायिका बनाने का निर्णय लिया था, और जोया ने हम सभी को मूक लड़की सुनैना बनकर अभिभूत कर दिया था.

अनुराग कश्यप ही ‘तीन और आधा’ के प्रस्तोता हैं (प्रजेंटेटर) और इसे यूक्रेनी मूल की डर गाई (Dar Gai) ने निर्देशित किया है. डर गाई पिछले कई वर्षों से हिंदुस्तान को अपनी कर्मभूमि बना चुकी हैं और उनकी अगली फिल्म ‘नामदेव भाऊ इन सर्च ऑफ साइलेंस’ का वर्ल्ड प्रीमियर जल्द ही बेहद प्रतिष्ठित बुसान इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में होने वाला है. (दिलचस्प है कि इन दिनों विदेशी मूल के कई निर्देशक हिंदुस्तानी संवेदनाओं में रची-बसी हिंदी फिल्में बना रहे हैं. ‘तीन और आधा’ के अलावा नेटफ्लिक्स की हाल ही में रिलीज हुई मिनी-सीरीज ‘घूल’ को लंदनवासी पैट्रिक ग्रैहम ने निर्देशित किया है, तो कुछ महीने पहले ईरानी निर्देशक माजिद मजीदी ने मुंबई आधारित ‘बियॉन्ड द क्लाउड्स’ बनाई थी.)

‘तीन और आधा’, तीन कहानियां से मिलकर बनी दो घंटे की इंडी फिल्म है, जो कि अलग-अलग कालखंडों में एक ही इमारत में घटती है. पचास साल पहले एक कहानी मृत्युशय्या पर लेटे नाना और नाती के दरमियां घटती है (अंजुम राजाबली व आर्य दवे). कुछ बीस साल बाद दूसरी में एक वेश्या और एक नौजवान रातभर के लिए साथ होते हैं (जोया हुसैन व जिम सार्ब). और आज में स्थापित तीसरी कहानी बुजुर्ग पति-पत्नी के दोबारा प्यार तलाशने के दौरान की इन्टेमेसी बयां करती है (एमके रैना व सुहासिनी मुले). तीनों कहानियां पूरी इमारत घूम-फिरने के बाद एक कमरे और उसकी चारदीवारी में सिमट जाती हैं और फिल्म की खासियत है कि चालीस मिनट से ऊपर की हर कहानी एक सिंगल लॉन्ग शॉट में फिल्माई गई है. ‘बर्डमैन’ (2014) अगर आपको याद हो तो ठीक उसी की तरह इस फिल्म का कैमरा (आकाश राज) तंग जगहों से होता हुआ किरदारों के आगे-पीछे तैरता-सा चलता है, और यह कोई गिमिक्री न होकर ऐसा तरीका बन जाता है कि आप खुद को पात्रों और कहानियों के बीच खड़ा पाते हैं. सिनेमा अपने शुद्ध रूप में ऐसा ही तो होता है!

Play

सतही सलीके से देखने पर ये तीनों कहानियां आम लग सकती हैं. बूढ़ा नाना और नाती कितनी ही कहानियों में साथ बैठकर दार्शनिक होते हुए अपना मन हल्का कर चुके हैं. कितनी ही कहानियों में डरी-सहमी वेश्या सहृदय नायक से मिलकर प्यार में पड़ चुकी है. और कितनी ही दफा उकताहट के मारे बुजुर्ग दंपती जिंदगी में रोमांस को दोबारा खोज चुके हैं. लेकिन ‘तीन और आधा’ की खासियत उसकी पटकथा की वो बारीकियां हैं जो जिंदगी को फिलॉसाफिकल नजर से देखने पर ही लिखी जा सकती हैं. मुख्य किरदारों की बेहद दिलचस्प बातचीत में तमाम तरह के दर्शन हैं जो परत दर परत धीरे-धीरे ही खुलते हैं. कई सारे सिनेमाई मेटाफर मौजूद हैं जिन्हें स्पॉट करने और समझते वक्त आप निर्देशक की समझ के कायल होते हैं. खासकर जब समंदर आपके घर चलकर आ जाता है, कैमरा खिड़की के बाहर हर कहानी में एक बार देर तक जरूर ठिठकता है, और जब फिल्म अपने शीर्षक में ‘आधा’ जुड़ा होने का अर्थ आखिर में बताकर अपनी फिल्म का जीवन-दर्शन पूरा बयां करती है.

यह भी दिलचस्प लगता है कि एक कहानी के बालक पात्र का नाम राज तो दूसरी के जवान पात्र का नाम नटराज होता है. फिल्म में हर कहानी का एक नाम है और उस नाम के अंत में भी ‘राज’ शब्द जुड़ा होता है. फिल्म कहीं नहीं कहती कि एक इमारत में दशकों के अंतराल में घटी बच्चे, जवान और बूढ़े की तीन कहानियां आपस में जुड़ी हैं, लेकिन आप आखिर तक तीनों कहानियों को आपस में जोड़ने के लिए बेचैन रहते हैं. यह देखने वाले के मन के घोड़े नहीं हैं जिनपर अंकुश नहीं है, वरन यह फिल्म की होशियारी है कि वो कई सिनेमैटिक मेटाफरों के इस्तेमाल से इस तरह सोचने का मनोवैज्ञानिक दबाव दर्शकों पर डालने में कामयाब रहती है.

फिल्म का कला निर्देशन भी जोरदार है. एक ही इमारत को और उसके घरों को – और खासकर उस कमरे को जहां सारी कहानियां मुख्य रूप से घटती हैं – इतनी कुशलता से हर कहानी में एकदम अलग रचा गया है कि वो कहानियों को मुख्तलिफ फील देने के अलावा यह भी स्थापित कर देता है कि मुंबई जैसे शहर में वक्त पुरानी चीजों का नामोनिशां नहीं छोड़ता. वहां बदलाव सतत नहीं है सरफिरा है, इसलिए बहुत जल्दी-जल्दी शहर को बदलता है.

इमारत में आवाजाही के उलझे रास्तों का फिल्मांकन भी फिल्म को सिनेमैटिकली रिच करता है. इन रास्तों से होकर गुजरते वक्त ही हमें यह बेहतर समझ आता है कि 40-45 मिनट की कहानियों को लंबे सिंगल शॉट में फिल्माते वक्त एक भी गलती पूरी कहानी को दोबारा शुरू से शूट करने का कई-कई बार कारण बनी होगी. भले ही वो गलती कहानी के खत्म होने की दहलीज पर खड़े 40वें मिनट में हुई हो और नायिका को गले लगाकर अंतिम विदाई लेते वक्त नायक बस अपने आंसू सलीके से पोंछना भूल गया हो! यानी कि एक सूक्ष्मतम गलती भी इस तरह के कम बजट वाले सिनेमाई अनुष्ठान की एक तिहाई फिल्म में टाट का पैबंद लगा सकती थी.

इसी वजह से शायद, ‘तीन और आधा’ के ज्यादातर मुख्य कलाकार या तो थियेटर बैकग्राउंड के हैं या उनके पास अथाह अनुभव है. जोया हुसैन और जिम सार्ब मुंबई रंगमंच में कई सालों से सक्रिय हैं तो एमके रैना दिल्ली रंगमंच का जाना-पहचाना चेहरा है. अंजुम राजाबली को सिनेमा राइटिंग का अथाह अनुभव है तो सुहासिनी मुले इतनी ज्यादा अनुभवी हैं कि 17 साल की उम्र में मृणाल सेन की मास्टरपीस ‘भुवन शोम’ (1969) में नायिका बनने से लेकर अब तक सिनेमा से जुड़ी हुई हैं. इन अनुभवी कलाकारों की वजह से, और सिंगल शॉट में कहानियां शूट करने के निर्णय की वजह से, ‘तीन और आधा’ देखते वक्त ऐसा मालूम होता है कि जैसे हम पहली पंक्ति में बैठकर कोई उत्कृष्ट नाटक देख रहे हों. फिल्म नाटक की तरह ही इन्टिमेट हो जाती है और खूबसूरत संगीत, बेमिसाल सिनेमेटोग्राफी और यथार्थवादी अभिनय के दम पर शुद्ध सिनेमा का रूप धर लेती है. और आधा-पौना नहीं, पूरा तृप्त करती है.

इस फिल्म के रिलीज होने का इंतजार कीजिए, और जब वो खत्म हो जाए तब सुहासिनी मुले और एमके रैना वाली कहानी को खास चाव से देखिएगा. ऐसे प्रेम-आलिंगन हिंदी फिल्मों में देखने को नहीं मिलते.