जब हम नौजवान थे तब राजनैतिक सामाजिक आंदोलनों का ज़ोर था. अंतरजातीय या अंतरधार्मिक शादी करवाने में सहयोग देना बड़ा महत्वपूर्ण काम माना जाता था. औरंगज़ेब के शासनकाल में भारत आए फ़्रांसीसी यात्री फ़्रांसिस बर्नियर ने लिखा था, ‘भारत में प्रेम करना वैसा नहीं है, जैसा यूरोप में है. यहां प्रेम करने में बड़ा जोखिम है जिसमें जान भी जा सकती है.’

300 साल बाद भी यह बात कमोबेश सही है. ऐसे में प्रेम और प्रेम विवाह को प्रोत्साहित करना समाज में रूढ़ियों के ख़िलाफ़ क्रांतिकारी काम माना जाता था और इसमें राजनैतिक सामाजिक रूप से जागरूक नौजवान बडे उत्साह से हिस्सेदारी करते थे. अगर प्रेम विवाह अंतरजातीय या अंतरधार्मिक हो तो वह ज्यादा बड़ा विद्रोह माना जाता था.

इस तरह के कामों को राजनैतिक पार्टियों ख़ासकर समाजवादी और कम्युनिस्ट पार्टियों से जुड़े युवा और कांग्रेसी भी एक राजनैतिक काम की तरह मान कर उतनी ही लगन और निष्ठा से करते थे. बल्कि भारतीय जनसंघ और आरएसएस के लोगों को छोड़कर सभी ऐसी शादियों में दिलचस्पी दिखाते थे. यह एक प्रगतिशील, समाज सुधार का काम माना जाता था और तब सामाजिक और धार्मिक रूढ़ियों से लड़ना भी राजनैतिक पार्टियां अपना काम मानती थीं.

यह परंपरा आज़ादी के आंदोलन से आई थी जहां महात्मा गांधी के नेतृत्व में भारतीय समाज में सामाजिक-सांस्कृतिक-धार्मिक सुधारों को राजनैतिक आज़ादी की लड़ाई का महत्वपूर्ण हिस्सा बना दिया गया था. छुआछूत का निषेध, संपत्ति के दिखावे और फ़िज़ूलख़र्ची का विरोध, सार्वजनिक सफ़ाई, लोगों को शिक्षित करना, धार्मिक रूढ़िवादिता का विरोध और सर्वधर्मसमभाव, ये सब आज़ादी के आंदोलन के महत्वपूर्ण हिस्से थे. इन कार्यक्रमों को भारत की आज़ादी के आंदोलन से जोड़ने का एक नतीजा यह हुआ कि यह सब भारतीय सार्वजनिक जीवन की मुख्यधारा में शामिल हो गए.

इससे यह तो नहीं हुआ कि ये सारी बुराइयां समाज से ख़त्म हो गईं, लेकिन उन्हें बुराई की तरह देखा गया. जैसे जाति के आधार पर भेदभाव ख़त्म नहीं हुआ, न ही सांप्रदायिकता ख़त्म हुई, लेकिन व्यापक समाज में इन्हें बुराइयों की तरह देखा गया और इनका आचरण करने वाले भी कुछ हद तक नजर की शर्म से बचकर यह सब करते रहे.

आज़ादी के बाद भी आंदोलन की कुछ परंपराएं बाक़ी रहीं इसलिए समाज में सुधार राजनैतिक पार्टियों के एजेंडे में बने रहे. इसलिए ही जैसे ऊपर ज़िक्र किया गया है अंतरजातीय और अंतरधार्मिक शादियां कराना एक क्रांतिकारी काम माना गया. सार्वजनिक जीवन में सादगी बरतने का जो आग्रह था उसके चलते कम से कम राजनेता पैसे का प्रदर्शन करने से बचते थे. आज से लगभग 30 साल पहले एक कांग्रेसी नेता और पूर्व राजा के घर पर हुई एक भव्य शादी पर सारी पत्र पत्रिकाओं में बहुत शोर मचा था. सारे मीडिया ने उनकी इस शादी में आडंबर और दिखावे को लेकर आलोचना की थी. आजकल उससे कई गुना भव्य शादियां छुटभैया नेताओं और उद्योगपतियों के यहां होती हैं और मीडिया में उनका चटकारे लेता हुआ रंगीन चित्रण होता है.

इसका एक बडा नुक़सान हमारे सामने है. हर समाज में बडी विविधता होती है और होना भी चाहिए. लेकिन अच्छा समाज वह होता है जिसमें हर चीज़ अपनी उचित जगह पर और उचित अनुपात में हो. जैसे संतुलित और मध्यमार्गी विचारों की जगह हर समाज में होनी चाहिए वैसा ही अतिवादी विचारों के साथ भी है. लेकिन इनकी जगह हाशिये पर होनी चाहिए, अगर वे समाज की मुख्यधारा बन गए तो यह समाज के लिए नुक़सानदेह है. हाल के समय में हो रही हिंसा की घटनाओं में हम इसका प्रत्यक्ष प्रमाण देख ही रहे हैं.

भारत में समाजवादी और साम्यवादी विचारधारा के ढहने की कुछ ऐतिहासिक अनिवार्यता थी लेकिन इसके साथ ही यह हुआ कि भारतीय सार्वजनिक जीवन से विचार और आदर्शों की विदाई हो गई जिनमें समाज सुधार के आदर्श भी थे. इसके बाद भारतीय राजनीति और समाज में लाभ और सफलता ही मानक बन गए. जब मूल्यों की बात होती तो किन्हीं आदर्शों की तरह नहीं बल्कि राजनीति के बाज़ार में सिक्कों की तरह होतीं जिनका एकमात्र महत्व सफलता पाने के लिए होता था. और सिक्के की तरह जितनी क़ीमत बराबरी की थी उतनी ही गैरबराबरी की, जितनी क़ीमत सर्वधर्मसमभाव की थी उतनी ही सांप्रदायिकता की, बल्कि कभी कभी ज्यादा भी हो सकती थी

यही वजह है कि जो बातें भारतीय समाज की मुख्यधारा में नहीं थीं बल्कि हाशिये पर थीं वे मुख्यधारा बन गईं. जिन मुद्दों पर आम सहमति तय मानी जाती थी वे अब विवादित हो गईं. मसलन धर्मनिरपेक्षता या धर्म के नाम पर भेदभाव न करना एक सर्वमान्य मूल्य था, भले ही उसका पूरी निष्ठा से पालन न होता हो. धर्म के नाम पर भेदभाव करने में यकीन करने वाले समूह थे, लेकिन वे भी खुल कर उसकी वकालत नहीं करते थे. अब धर्मनिरपेक्षता एक विवादित मूल्य मान लिया गया है और बहुत मुखर रूप से यह कहने वाले लोग मुख्यधारा में हैं कि धर्म के आधार पर भेदभाव करना जायज़ ही नहीं, देशहित में है. एक ख़ास धर्म को देशभक्ति का और अन्य धर्मों को देशविरोधी होने का पर्याय मानना सिर्फ़ कुछ संकीर्ण उन्मादी लोगों का लक्षण नहीं माना जाता बल्कि अब ऐसे लोग आत्मविश्वास के साथ खुद को देश की मुख्यधारा घोषित कर रहे हैं.

यह सिर्फ़ राजनीति में नहीं हो रहा है. समाज में भी जिन बातों को सामाजिक ग़ैरज़िम्मेदारी और पिछड़ेपन का पर्याय माना जाता था वे अब स्वीकृति पा रही हैं. मसलन शादियों में फ़िज़ूलख़र्ची अब गर्व का विषय है. अब जाति का गौरव प्रचारित करना पिछड़ापन या संकीर्णता नहीं माना जाता. यह संयोग नहीं कि 60-70 के दशक में जिन लोगों ने अपने नाम से जाति सूचक संज्ञाएं हटा ली थीं वे अब फिर से गर्व के साथ अपनी जाति लिखने लगे हैं. पहले क्रांतिकारी नौजवान अंतरधार्मिक विवाह करवाने में सक्रिय रहते थे, अब जगह जगह ऐसे युवाओं के समूह हैं जो घोषित रूप से ऐसे विवाह न होने देने के लिए प्रयत्नरत रहते हैं.

अब भारतीय समाज में संकीर्णता और उदारता, रूढ़िवादिता और खुलापन, बराबरी और गैरबराबरी, धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिकता, सच और झूठ, ऐसे तत्व नहीं बचे जिनके सही या गलत होने के बारे में कोई संदेह नहीं हो. अब ये ऐसे तत्व हैं जिनका एक बराबर वज़न और वैधता है. यह समाज के लिए अच्छा नहीं है कि उसमें सच और झूठ एक ही वज़न और वैधता रखते हों.

जिन प्रगतिशील सामाजिक मूल्यों की हमने बात की है उनके पालन में पाखंड बहुत देखने में आया. लेकिन अच्छी बात का पाखंड भी नंगी बुराई से बेहतर होता है. अगर आंख की शर्म भी बाक़ी हो तो उसके आगे कुछ तो उम्मीद बचती है इसलिए भारतीय समाज में फिर से सामाजिक सुधार की बात करना ज़रूरी है.