निर्देशक : अनुराग कश्यप

लेखक : कनिका ढिल्लन

कलाकार : तापसी पन्नू, विकी कौशल, अभिषेक बच्चन, सौरभ सचदेवा, विक्रम कोचर

रेटिंग : 3.5/5

हरिवंश राय बच्चन से जुड़ा एक किस्सा शायद सुना हो आपने. कहा जाता है कि जब ‘मधुशाला’ के रचयिता पहली बार तेजी सूरी (बच्चन) से मिले थे तो उन्होंने कहा था कि मैं आग हूं, और अगर तुम पानी बनकर रह सको तो हमारी शादी हो सकती है. ‘मनमर्जियां’ के ‘चोंच लड़ियां’ गाने में भी इसी मिजाज का एक सुंदर थॉट मौजूद है जिसमें ‘बंदे के अंदर पैगंबर नाचे’ जैसी सूफियाना बात करने से पहले गाना कहता है –‘सतलुज में एक समंदर नाचे’. यहां सतलुज वो शांत नदी है जो एक नायक के किरदार का पर्याय है और समंदर की तरह तूफानी तापसी पन्नू का किरदार रूमी है. कहने का मतलब है कि ज्यादातर पारंपरिक प्रेम-कहानियों और प्रेम-त्रिकोणों में मर्द व औरत के बीच जिस रिश्ते को सर्वोत्तम मानने का चलन है उसमें से एक आग होता है तो दूसरा पानी, एक नदी तो दूसरा समंदर. भले ही आपको फ्यार के नाम पर आग और आग का मेल दिखाया जाए, लेकिन इतिश्री आग और पानी के संगम से ही होती है.

घोर अपारंपरिक फिल्में बनाने वाले निर्देशक अनुराग कश्यप ने इसी पारंपरिक थॉट को अपनी फिल्म का सेंटर ऑफ ग्रेविटी बनाया है, लेकिन उनका कमाल देखिए कि कहानी आज के उलझे रिश्तों की एकदम कंटेम्पररी और प्रोग्रेसिव कही है. ऐसी कहानी किसी टूटे हुए या दो रिश्तों के बीच पिसते रहे दिल की कलम से ही निकल सकती है, क्योंकि तभी कोई मौजूदा समय के सही-गलत के पार पाए जाने वाले रिश्तों की इतनी महीन व्याख्या कर सकता है. कनिका ढिल्लन की कलम ने वाकई रेशा-रेशा रिश्तों को उधेड़ा है.

‘मनमर्जियां’ आपको कई पुरानी हिंदी फिल्मों की याद जरूर दिलाएगी. ‘हम दिल दे चुके सनम’ से लेकर ‘तनु वेड्स मनु’ तक से इसकी समानता आसानी से नजर आएगी, और अभिषेक बच्चन के ‘राम’ सरीखे सहृदय किरदार की भी ‘वो सात दिन’ के नसीर साहब से लेकर ‘हम दिल दे चुके सनम’ के अजय देवगन व ‘तनु वेड्स मनु’ के आर माधवन से तुलना होगी ही. लेकिन इन समानताओं के बावजूद ‘मनमर्जियां’ की सबसे बड़ी खासियत है – जो इसे इन पुरानी ‘फिल्मी’ और ‘पलायनवादी’ फिल्मों से अलग बनाती है - कि अनुराग कश्यप ने जैसे यथार्थ की कठोर जमीन पर पनपने वाले प्रेम-त्रिकोण के बीच कहीं अपना कैमरा छिपा दिया है, और हम दर्शक बस प्रेम में उलझी तीन जिंदगियों का सूक्ष्म पोस्टमार्टम देख रहे हैं.

यह भी क्या कम दिलचस्प है कि करियर में पहली बार मुख्यधारा की इंटेंस त्रिकोणीय प्रेम-कहानी कहने के बावजूद कश्यप (‘मुक्काबाज’ व ‘देव डी’ भी लव-स्टोरीज थीं लेकिन हटके), इम्तियाज अली या करण जौहर या यश चोपड़ा के मिजाज वाली रूमानी-रूहानी अतिरेक में सनी फिल्म बनाने के मोह में कैद नहीं हुए. उन्होंने ठीक प्रोसीजरल फिल्मों की तरह पग पग पर प्यार की पड़ताल की है और अगर फ्यार से जुड़ा रंगीन फलसफा पहले हिस्से में विस्तार से दिखाया है तो दो रिश्तों के बीच फंसे होने की मुश्किलों को भी दूसरे हिस्से में गजब अंदाज में अभिव्यक्त किया है. लेकिन अगर आपने प्यार हमेशा सलीके वाला ही किया है, साफ-सुथरा सा, तो ‘मनमर्जियां’ का इंटरवल के बाद वाला हिस्सा आपको बेहद लंबा, थोड़ा इंडल्जेंट और आसानी से 15-20 मिनट कम करने लायक लगेगा. लेकिन अगर आपने डूबकर प्यार किया है, या कभी आपके रिश्तों में भसड़ मची है, या दिल टूटा है, या टूटे दिल की किरचें आप आज तक पूरी समेट नहीं पाए हैं, तो जनाब, ‘मनमर्जियां’ हर फ्रेम में आपके मन की मर्जी की ही कहानी कहती हुई जान पड़ेगी!

और अगर इसके 14 गीत आप पर पहले से चढ़े होंगे, तो यकीन जानिए कि इनका फिल्म में उपयोग देखकर आप गदगद हो जाएंगे. लंबी चोटी वाली दो लड़कियों और स्लो-मोशन के साथ निर्णायक क्षणों में इनका आना ‘देव-डी’ के जमाने में आपको पहुंचा देगा.

‘सेक्रेड गेम्स’ में नजर आए दो कलाकारों ने ‘मनमर्जियां’ में प्रभावी उपस्थिति दर्ज कराई है. शादियां फिक्स कराने का कारोबार करने वाले काका जी के रोल में सौरभ सचदेवा ने शादियों की पॉलिटिक्स में जान फूंक दी है तो अभिषेक बच्चन के किरदार रॉबी के घर में रहने और घर का सारा काम करने वाले मुंहफट भाई के रोल में विक्रम कोचर ने दर्शकों को ठहाके प्रदान करने का मुश्किल काम अंजाम दिया है. हालांकि उनका किरदार आनंद एल राय (इस फिल्म के निर्माता) की ‘तनु वेड्स मनु’ के पप्पी जी (दीपक डोबरियाल) जैसा ही है और इस तरह की कुछ समानताएं ‘मनमर्जियां’ की मौलिकता में टाट का पैबंद भी लगाती हैं. अभिषेक बच्चन का किरदार भी विदेश से हिंदुस्तान के छोटे शहर आकर लड़की ढूंढ़ने वाले शांत-चित्त के आर माधवन की याद दिलाता ही है और तिस पर दोनों फिल्मों की कहानी में भी समानता नकारी नहीं जा सकती.

अभिषेक बच्चन अभी भी संवाद बोलते वक्त कसर छोड़ ही जाते हैं, लेकिन जब अपनी आंखों से अभिनय करते हैं तो लगता है कि भेद ही डालेंगे! कश्यप ने उनकी इस खासियत का काफी सटीक उपयोग भी किया है और उनके चेहरे पर आक्रोश के उबलने का व उसे दबाते चलने के प्रयास का जो मिलाजुला भाव बनता है वो ‘मनमर्जियां’ में उनका देखने लायक अभिनय है. फिल्म के दूसरे हिस्से में उनका बहुत काम है और वे पूरी तरह प्रभाव नहीं छोड़ पाते तो पूरी तरह निराश भी नहीं करते. यह कम बड़ी बात नहीं है.

विकी कौशल इंटरवल से पहले तो जैसे कहर ढाने का दूसरा नाम बन जाते हैं. पंजाब से ताल्लुक रखने वाले नशे में डूबे रहने वाले यो! शख्स की भूमिका आजकल कई स्टार निभाने लगे हैं इसलिए उनके अभिनय में दोहराव की आशंका थी, लेकिन वो निराधार निकलती है. ‘ध्यानचंद’ गाने में उनका नृत्य मन मोह लेता है और अतरंगी भावों को वे इतनी आसानी से चेहरे पर ले आते हैं कि जैसे हीरो बनने से पहले ठीक इसी किरदार वाली जिंदगी जीते रहे हों. तापसी का किरदार जब उन्हें कई दृश्यों में डांटता है, समझाता है, तब बिना कुछ बोले सिर्फ चेहरे के मासूम भावों से वे अद्भुत के स्तर का अभिनय करते हैं. वो तो फिल्म ने उनके साथ थोड़ी नाइंसाफी कर दी और इंटरवल के बाद वाले हिस्से में बीच-बीच में भूलती गई, वरना तापसी और वे दोनों इस फिल्म में सर्वश्रेष्ठ अभिनय के साथ हकदार बनते.

रूमी के किरदार में तापसी पन्नू ‘मनमर्जियां’ की आत्मा हैं और ‘बिजली गिरेगी’ गीत असल में उनके किरदार की सटीक व्याख्या है! कश्यप की पुरानी फिल्मों में मौजूद हर मजबूत नायिका की छवि आपको रूमी में मिलेगी लेकिन तापसी का उस आजाद ख्याली, उस दुनिया को मिडिल फिंगर दिखाने वाली नायिका को प्ले करने का तरीका सबसे मुख्तलिफ और निराला है. लाउड होने से लेकर एकदम मासूम हो जाने तक, हर बात पर लड़ने को तैयार रहने से लेकर शून्य में ताकते चले जाने तक, और प्यार व फ्यार के बीच फंसी उलझन को लंबे समय के लिए चेहरे पर उतारने तक में वे कहीं भी सुर से भटकती नहीं हैं.

‘पिंक’, ‘नाम शबाना’ और कुछ-कुछ ‘मुल्क’ के कम बोलने वाले संकोची किरदारों का विलोम होते हुए तापसी अपने अभिनय के जिस ताप से हमारा परिचय ‘मनमर्जियां’ में करवाती हैं, उसकी गर्माहट लंबे समय तक दर्शकों को याद रहेगी.

वैसे भी, महान कविता ‘मैं तैनूं फिर मिलांगी’ का फिल्म में उच्चारण करने वाली नायिका को भला कौन भूल पाएगा. ‘मनमर्जियां’ इसलिए भी अप्रतिम है, कि उसमें अमृता प्रीतम हैं!