पाकिस्तान की पहली महिला प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो के बचपन का यह किस्सा उनकी आत्मकथा ‘मेरी आपबीती’ से लिया गया है.


मैं तब केवल आठ वर्ष की थी, जब मुझे पापा और मां के जाने के बाद घर सौंप दिया जाता था. मां मुझे सामान वगैरह के लिए पैसे देकर जाती थीं, जो मैं अपने तकिए के नीचे रखती थी. रसोई में स्टूल पर बैठकर, अपने पुराने वफादार नौकर बाबू के साथ हिसाब मिलाती थी. सब हिसाब और बचे हुए पैसे ठीक जुड़ते थे या नहीं, यह मुझे याद नहीं है क्योंकि उस समय मैं स्कूल में बस हिसाब करना सीख ही रही थी. वह सस्ते का ज़माना था, पैसे भी बहुत ज्यादा नहीं हुआ करते थे. बस, कुछ सिक्के और दस रुपये भर में पूरे घर का सामान आ जाता था.

हमारे घर में मेरे पिता के भी पहले, उनके पिता के समय से पढ़ाई सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती थी. मेरे पिता चाहते थे कि वे आने वाली पीढ़ी को पढ़े-लिखे प्रगतिशील पाकिस्तानियों की पौध सौंपें. इसके चलते तीन साल की उम्र में मैं लेडी जेनिंग नर्सरी स्कूल जाने लगी और पांच बरस की उम्र में कराची के एक बहुत अच्छे स्कूल में मेरा नाम लिखवाया गया जिसका नाम जीसस मेरी कॉन्वेंट था. स्कूल में पढ़ाई अंग्रेजी में होती थी. घर में हम अपने माता-पिता की भाषा सिंधी या फारसी में बात करते थे, या उर्दू में जो हमारी राष्ट्र भाषा है.

स्कूल में आयरलैंड की ईसाई अध्यापिकाएं हमें पढ़ाती थीं. उन्होंने बच्चों के अलग-अलग हाउस बना रखे थे जिनके नाम बड़े प्रेरणादायी थे. जैसे ‘अनुशासन’, ‘नम्रता’, ‘साहस’, ‘सेवा’ वगैरह. हालांकि वे ईसाई अध्यापिकाएं थीं लेकिन किसी ने भी कभी किसी को ईसाई बनाने की कोशिश नहीं की. वह स्कूल ईसाई मिशनरियों के लिए आमदनी का अच्छा जरिया था और खतरा उठाते हुए उन कुछ गिने-चुने रईस मुसलमान बच्चों को पढ़ा रहा था जिनके परिवार वाले दूरदर्शी थे.

मेरे पिता हमसे बार-बार बस यही कहते थे, ‘मैं बस तुम लोगों से एक बात चाहता हूं कि तुम लोग पढ़ाई में अच्छे निकलो’. जैसे-जैसे हम बड़े हुए उन्होंने हमारे लिए गणित और अंग्रेजी की ट्यूशन का इन्तजाम किया जिससे कि हम शाम को स्कूल के बाद भी पढ़ा करें. वह दुनिया में चाहे किसी भी कोने में रहे, उन्होंने हमेशा हमारी स्कूल रिपोर्ट्स का ध्यान रखा.

सौभाग्य से मैं पढ़ाई में अच्छी थी और मेरे पिता के मन में मेरे लिए बड़े सपने थे. वे चाहते थे कि मैं पाकिस्तान से जाकर विदेश में पढ़ने वाली पहली महिला बनूं. जब से मुझे याद है, वे अक्सर कहते थे, ‘तुम लोग अपने-अपने सूटकेस लगाओ और मैं तुम लोगों को एयरपोर्ट पहुंचाकर आऊंगा.’ कभी-कभी हंसते हुए वे कहते, ‘पिंकी (बेनज़ीर भुट्टो) छोटी नन्हीं बच्ची की तरह जाएगी और एक सुंदर सी साड़ी में सजी युवती बनकर लौटेगी. शाहनवाज़ (बेनज़ीर के भाई) अपने सूटकेस में इतने कपड़े भर लेगा कि फिर सूटकेस बंद नहीं कर पाएगा और हर बार उसे बाबू को बुलाना होगा कि इस सूटकेस पर बैठो ताकि इसे बंद किया जा सके.’

हमारे परिवार में ऐसा कोई विचार नहीं था कि हम बहनों को भाईयों से कुछ कमतर मिले. न ही ऐसा कुछ इस्लाम में लिखा है. हमें बहुत बचपन में बताया गया था कि यह केवल धर्म के बारे में पुरुषों की सोच है कि औरतों पर पाबंदियां लगाई जाएं, वरना इस्लाम शुरू से ही स्त्रियों के प्रति बहुत खुली सोच रखता आया है. हज़रत मोहम्मद साहब ने अरब में उस समय भी लड़कियों को पैदा होते ही मार डालने की प्रथा पर पांबदी लगाई थी और लड़कियों की पढ़ाई पर ज़ोर दिया था. औरतों को जायदाद में हक के लिए इस्लाम ने उससे पहले ही राय दी थी जब पश्चिम में इस पर सोच-विचार किया जा रहा था.

अगर महिलाओं के मामले में हमारे खानदान की बात करें तो मुझे याद आता है कि उस समय तक भुट्टो परिवार की शादियां केवल भुट्टो में ही, परिवार के चचेरे-ममेरे दायरे में होती थीं. इस्लाम में औरतों को जायदाद में उनका हक दिया जाता है और इस तरह की शादी होने के चलते परिवार की सम्पत्ति परिवार में ही रहती थी. एक दिन मैंने अपनी मां को पिता से यह पूछते हुए सुन लिया कि ‘क्या मेरे बच्चे भी परिवार में ही शादी करेंगे?’ यह अनायास ही हुआ, मैं सामने नहीं थी. मेरे पिता अपने देश और अपने बच्चों को बीसवीं सदी में ले जाना चाहते थे, यह जानते हुए भी मैं सांस रोककर उनका जवाब सुनने को बेताब हो गई.

उनका जवाब सुनकर मुझे बहुत राहत महसूस हुई, वे बोले, ‘मैं नहीं चाहता कि बेटे अपनी ही किसी चचेरी-ममेरी बहनों से शादी करें और फिर उन्हें हमारी ही चारदीवारी में पड़ा रहने दें. न ही यह कि मेरी बेटियां यहां से जाकर किसी दूसरे रिश्तेदार की दीवारों के बीच ज़िंदा दफन हो जाएं.’ उन्होंने आगे कहा, ‘उन्हें पहले अपनी पढ़ाई कर लेने दो, फिर वे खुद तय कर लेंगे कि उन्हें ज़िंदगी में क्या करना है.’

उनका यह कहना आगे वह दिन लाया, जब मेरी मां ने मुझे पहले-पहल बुरका पहनाया. हम रेलगाड़ी से कराची से लरकाना जा रहे थे थे. रास्ते में मेरी मां ने अपने बैग में से काला बुर्का निकाला और मुझे ओढ़ा दिया. उन्होंने बुर्का ओढ़ाते हुए कहा था, ‘अब तुम बच्ची नहीं रहीं.’ यह कहते हुए उनकी आवाज में एक बारीक-सा रंज था. जैसे ही उन्होंने पुराने विचारों वाले मालदार परिवारों की सदियों पुरानी यह रस्म अदा की वैसे ही मैं बचपन की दहलीज़ पार करके बड़ों में शुमार हो गई.

लेकिन इस बुर्के ने मेरी दुनिया को कैसी निराशा से भर दिया. आसमान, फूल और हरी घास सब एकदम बदरंग होकर छितर गए. सारा नजारा एकदम धुंधला-सा गया. जैसे ही मैं रेलगाड़ी से उतरी, उस लिबास ने, जिसने मुझे सिर से पैर तक ढक दिया था. मेरा कदम बढ़ाना तक दूभर कर दिया. बंद कर दिए वे सारे रास्ते, जहां से हवा आ सकती थी. मेरा चेहरा पसीने से तर होने लगा.

जब हम लरकाना में अपने पुश्तैनी घर अल-मुर्तज़ा पहुंचे तो मां ने पापा को बताया, ‘पिंकी ने आज पहली बार बुर्का पहना है.’ इसके बाद उनके बीच एक लंबा मौन ठहर गया. फिर मेरे पिता ने कहा, ‘उसे यह पहनने की जरूरत नहीं है. पैगंबर साहब ने खुद कहा है कि आंख का पर्दा ही सबसे उचित पर्दा है. उसकी बुद्धि और उसके कामकाज को उसकी पहचान बनने दो, उसके कपड़ों को नहीं.’ और पिता के इस कथन के साथ ही मैं वह पहली भुट्टो महिला बनी जो उम्र भर बने रहने वाले धुंधलके से आजाद हो गई.

(पाठक बचपन से जुड़े अपने संस्मरण हमें mailus@satyagrah.com या anjali@satyagrah.com पर भेज सकते हैं.)