यों तो भारत में इस समय भाषा और विचार, नैतिक बोध और कर्म सभी का अवमूल्यन हो रहा है. हिंदी तेज़ी से सांप्रदायिकता,धर्मांधता और जातिवाद की लगभग मातृभाषा बनने के कगार पर पहुंच गयी है और स्वयं अपनी उजली साहित्यिक परंपरा के साथ लगातार विश्वासघात कर रही है. समाज विज्ञान और मानविकी की अर्द्धवार्षिक पत्रिका ‘प्रतिमान’ यह आश्चर्यजनक आश्वासन और विश्वास उपजाती है कि हिंदी में सघन और प्रासंगिक, संकेन्द्रित और कुशाग्र विचार संभव है, हो रहा है. जिस तरह की विचारहीनता हिंदी को सिरे से जकड़े हुए है उसका, विकासशील समाज अध्ययन पीठ द्वारा यह प्रकाशन, सशक्त प्रतिरोध है. अंग्रेज़ी को छोड़कर शायद ही किसी और भारतीय भाषा में इस गुणवत्ता और रेंज का कोई नियमित प्रकाशन हो जैसा कि ‘प्रतिमान’ है. यह उसके प्रकाशन का छठवां वर्ष है और उसके अब तक ग्यारह अंक निकले हैं.

प्रधान संपादक अभय कुमार दुबे ने ग्यारहवें अंक में अपने सुलिखित संपादकीय में कन्नड़ लेखक-मित्र यू.आर. अनन्तमूर्ति के हवाले से यह कहा है कि ‘पढ़िये कोई भी भाषा, लेकिन लिखिये केवल अपनी.’ भारत के अनेक भाषाभाषी लोग अंग्रेज़ी में ही अपना चिंतन लिखते हैं और इस तरह अपनी वैचारिक संपदा को सीमित करते हैं. इन भाषाओं की वैचारिक विपन्नता और अल्पता का एक बड़ा कारण यह है कि इनमें मौलिक चिंतन सीधे बहुत कम है और अनुवाद के माध्यम से आता है और कभी व्यापक समुदाय के ध्यान में नहीं आता. ‘प्रतिमान’ के इस अंक में प्रकाशित अधिकांश सामग्री मूलतः हिन्दी में लिखी गयी है, उसमें अंग्रेज़ी से अनुवाद कम शामिल किये गये हैं.

नवज्योति सिंह, जिनका हाल ही में देहावसान हो गया, ऐसे विचारक हैं जिनसे हिंदी जगत कम ही परिचित है. उनके एक निबंध में, जो ग्रीको-यूरोपियन ज्ञानोदय के स्थानांतरण की समस्या पर केंद्रित है ‘अंधकारमयता का अन्वेषण’ शीर्षक से, यह महत्वपूर्ण स्थापना की गयी है कि ‘पाश्चात्य सभ्यता के प्रकाश में भागीदारी करने के लिए ग़ैर-पाश्चात्य सभ्यता को एक तरह के अंधकार की परत ओढ़नी पड़ती है. ... स्वाभाविक ऐतिहासिकताओं का परित्याग ही सजग आधुनिक आत्मचिंतन का मुख्य औजार माना जाता है. विडंबना यह है कि ग़ैर-पाश्चात्य सभ्यता के लिए ‘आधुनिक ज्ञानोदय’ को पाने के लिए ‘अंधकारमयता’ अत्यावश्यक है.’

प्रसन्न कुमार चौधरी ने लुडविग विट्गेन्टाइन पर एक सुचिंतित निबंध लिखा है ‘कौतुक के पर्वत का सैलानी’. ‘दर्शन को काव्यरचना के रूप में लिखा जाना चाहिये’ मानने वाले इस दार्शनिक पर बहुत अच्छी सामग्री इस अंक में है. ज्ञानेन्द्र पांडे ने ‘हिन्दुस्तानी आदमी घर में’ शीर्षक से एक अनूठा लेख लिखा है जिसमें प्रेमचंद, राहुल सांकृत्यायन और राजेन्द्र प्रसाद की घरेलू ज़िंदगी के कई अन्तर्विरोधों को खंगाला गया है.

समकालीन समय में सर्जनात्मक सैद्धांंतिकी

अभी कुछ समय पहले तक मुझे यह पता नहीं था कि समाजचिंतकों का एक सजग समूह सर्जनात्मक सैद्धांंतिकी के ऊपर एकाग्र और सक्रिय है. एक दिन कवयित्री सविता सिंह और मणीन्द्रनाथ ठाकुर से लंबी बातचीत में इस बारे में विस्तार से ख़बर मिली. उनका समकालीन समय पर एक परिसंवाद रज़ा फ़ाउंडेशन के सहयोग से दिल्ली में संपन्न हुआ जिसमें शिरकत करने का सुयोग हुआ. उसमें ये प्रश्न उठाये गये कि आधुनिकता के साथ समय की जो धारणा शुरू हुई थी क्या वह अपने अंत पर पहुंच गयी है और हम एक नये समय की ओर बढ़ रहे हैं. इस समय को और अपने समाज, राजनीति और आर्थिकी को कैसे व्यवस्थित किया जा रहा है इसे समझने की ज़रूरत है. यह समय अराजक लग सकता है पर उसी में हस्तक्षेप के लिए शायद अधिक जगह मिल पा रही है. क्या अनेक ज्ञान परंपराओं के बीच नये संवाद शुरू और स्थापित करने का यह मौजूं मुक़ाम है?

समकालीन समय को संस्कृति, राजनीति, राज्य, हिंसा, आंदोलन, साहित्य, लिंग विमर्श आदि से ज़रूर समझा और विश्लेषित किया जा सकता है. ये सामान्य निर्मितियां बहुत सारा सामान्य जीवन, इन सब शक्तियों के रहते उनसे अलग जिया जा रहा जीवन जो कि अपने विशिष्ट ब्योरों में जिया जाता है, असंबोधित छोड़ देती हैं. इस जीवन में हर दिन यापन और जिजीविषा के लिए अपार संघर्ष होते रहते हैं जो सैद्धांतिकी की हदों से बाहर अलक्षित रह जाते हैं. सामान्य जीवन की इस अटूट निरन्तरता को, उनके ज़मीनी विवेक को किस तरह से हिसाब में लिया जाये यह सर्जनात्मक सैद्धांंतिकी के लिए एक बड़ा और ज़रूरी सरोकार होना चाहिये.

इस सैद्धांंतिकी को साहित्य-विचार से भी कुछ सीखना चाहिये. साहित्य में विकसित लोकमंगल, व्यक्तित्व की खोज, ज्ञानात्मक संवेदन और संवेदनात्मक ज्ञान, सभ्यता-समीक्षा, खंड-खंड सर्जनात्मकता आदि अवधारणाओं पर विचार करना चाहिये. इस मोहक भ्रम से मुक्ति हो सकना चाहिये कि विचार सिर्फ़ समाजशास्त्री, दार्शनिक आदि ही करते हैं. साहित्यकार, कलाकार आदि भी अपने ढंग से विचार करते हैं जो अकसर अन्य विचारकों के ध्यान में नहीं आता. सर्जनात्मकता सैद्धांंतिकी में आलोचनात्मक एकलता के बजाय सर्जनात्मक बहुलता का एहतराम और समावेश होना चाहिये. उसे यह याद रखने की भी ज़रूरत है कि साहित्य और कलाएं सच्चाई को प्रति-बिम्बित भर नहीं करते वे सच्चाई में कुछ जोड़ते भी हैं. सच्चा सृजन सच्चाई में इज़ाफ़ा करता है. यह समझने की ज़रूरत है कि क्यों परिवर्तन साहित्य, ललित कलाओं और रंगमंच में अधिक तेज़ी से होता है जबकि वह संगीत और नृत्य में धीरे-धीरे होता है. भारत में इस समय जो अध्यात्महीन, ईश्वरहीन और धर्मशून्य धार्मिकता तेज़ी से विकसित हो रही है उसे भी गहराई से समझना समकालीन समय का विश्लेषण करने के लिए प्रासंगिक है.

परिसंवाद में एक विचार यह भी व्यक्त हुआ कि इस समय पूंजीवाद दार्शनिक संकट से गुज़र रहा है. तथाकथित सामान्य हित उसके लिए अप्रासंगिक हो चुका है. लेकिन उसे पोसने और उससे पोसे जानेवाले सत्ताधारियों में अस्थिरता, भंगुरता का भय भी व्याप्त है. सत्ता की बढ़ती सर्वग्रासिता के रहते इस शिनाख्त को अनदेखा-अनसोचा नहीं होना चाहिये.

असहमति के पक्ष में

हम जैसे असहमति के बदनाम पक्षधरों के लिए एक मलयालम उपन्यास के कुछ अंश या उसे बाधित करने की याचिका को सर्वोच्च न्यायालय ने खारिज करते हुए लेखकों-कलाकारों की स्वतंत्रता की ज़रूरत पर जो इसरार किया है वह नैतिक रूप से मनोबलवर्द्धक है. पिछले दिनों ऐसे लोग, समूह और शक्तियां बहुत सक्रिय हुए और लगातार बढ़े हैं जो किसी तरह की स्वतंत्रता को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं सिवाय अपनी हर दूसरे की स्वतंत्रता बाधित करने की परम स्वतंत्रता के. कब किसी की भावनाएं किस कलाकृति या साहित्यिक रचना के आहत होकर उग्र और आक्रामक रूप ले लें यह कहा नहीं जा सकता. आखि़र चार लेखकों-बुद्धिजीवियों को उनके अलग विचारों के कारण ही मौत के घाट उतार दिया गया. उनमें से गौरी लंकेश की हत्या को कल ही एक वर्ष हुआ है जब यह फ़ैसला आया है.

न्यायालय ने यह कहा है कि किसी पुस्तक के बारे में निजी रुख़ को क़ानूनी क्षेत्र में सेंसरशिप के लिए दाखि़ल नहीं होने देना चाहिये. हम किसी तानाशाह व्यवस्था में नहीं एक लोकतांत्रिक राष्ट्र में रहते हैं जिसमें विचारों के स्वतंत्र विनिमय और स्वतंत्रता की इजाज़त है. न्यायालय ने यह स्वीकार किया है कि ‘एक लेखक को शब्दों की मुक्त क्रीड़ा कर सकना चाहिये जैसे कि चित्रकार रंगों से खेलता है और कल्पना के आवेग को निर्देशित नहीं किया जा सकता.’ पाठक को एक रचनात्मक कृति को वयस्क भाव, दृष्टि की उदारता, वस्तुनिष्ठ सहिष्णुता और सच्चाई पर आधारित स्वीकार्यता के बोध से पढ़ना चाहिये. रचनात्मक आवाज़ों को बौद्धिक कायरता में नहीं फिसलने देना चाहिये. कन्नड़ उपन्यासकार एस हरीश ने,जिनके उपन्यास को प्रतिबंधित करने का यह प्रयास था, यह उचित ही प्रतिक्रिया की है कि इसका एक आशय यह भी है कि लेखकों को आत्मसेंसरशिप से भी बचना चाहिये.

सर्वोच्च न्यायालय ने जो टिप्पणियां की हैं उन्हें सत्ताधारी दल, सरकारों, धर्म आदि आत्मसात् करेंगे यह अनुमान लगाना कठिन है. लेखकों-कलाकारों को तरह-तरह से परेशान करने की जो प्रवृत्ति बढ़ती गयी है उस पर कुछ रोक लगेगी यह कहना भी मुश्किल है. जो पांच अख़बार रोज़ लेता-पढ़ता हूं, उनमें से किसी ने इस महत्वपूर्ण फ़ैसले पर कोई संपादकीय टिप्पणी इन पंक्तियों के लिखे जाने तक नहीं की है. यह अनदेखा नहीं जाना चाहिये कि मीडिया ज़्यादातर ऐसी स्वतंत्रता के पक्ष में मुखर-सक्रिय नहीं रहा है. हमारी एक बड़ी विडंबना यह है कि इस समय राजनीति, धर्म और मीडिया स्वतंत्रता की कटौती में लीन हैं और सिर्फ़ न्यायापालिका ही स्वतंत्रता की रक्षक बनी हुई है. यह एक और प्रमाण है कि हम इन क्षेत्रों में कैसी व्यापक अपढ़ता का सामना करने को मजबूर हैं!