बुढ़ापा अपने आप में कोई बीमारी नहीं है, लेकिन बुढ़ापे में बीमार पड़ने की आशंकाएं बढ़ जाती हैं. उसके साथ जीवन के अंत की शुरुआत भी हो जाती है. मानो शरीर अपने अंत के टाइम बम का खटका सा दबा देता हो. ‘मनुज बली नहीं होत है, समय होत बलवान’ वाली बात में बुढ़ापे को भी फिट करके देख सकते हैं.

बुढ़ापे को यदि मैं चिकित्सा शास्त्र के हिसाब से परिभाषित करने की कोशिश करूं तो गोलमोल-सी बात यह कहूंगा कि किसी भी जीव का बूढ़ा होना एक निरंतर तथा सार्वभौमिक घटना है जिसमें उस जीव की कार्यक्षमता स्थूल से लेकर सूक्ष्म स्तर (यानी उसकी कोशिकाएं) तक घटती चली जाती है. शरीर का हर कार्य क्षमता से नीचे चलने लगता है. कम होते-होते फिर यह एक दिन बंद हो जाता है. जीवन समाप्त. इस तरह धूमधाम से चल रही यह दुकान एक दिन बंद हो जाती है.

याद रहे कि एक बार बुढ़ापे वाला यह काम शुरू होता है तो बड़ी तेजी से बढ़ता जाता है. शरीर की पाचन क्रिया, हड्डियां, रोगों से लड़ने वाला प्रतिरोधी सिस्टम – सबकुछ कमजोर होने लगता है. इसीलिए, बीमार पड़ने की संभावना भी बढ़ जाती है. बीमार पड़े तो फिर ठीक भी देर से होते हैं.

तो क्या हम बुढ़ापे को एक असाध्य रोग मान लें? नहीं, हमने तो शुरू में ही कहा कि बुढ़ापा स्वयं में कोई बीमारी नहीं है. बूढ़े आदमी का जिक्र दो-तीन कारणों से भी कर रहा हूं. एक तो यह बताना जरूरी है कि बुढ़ापे में भी एकदम स्वस्थ रहा जा सकता है. दूसरा यह कि कुछ बीमारियां बुढ़ापे की ही होती हैं या कहें कि बुढ़ापे में ज्यादा होती हैं. जैसे कि चलने में लड़खड़ाना, स्मृति कम हो जाना आदि. हम इन्हें सठियाना या बढ़ौती कहकर नजरअंदाज न करें. दवाइयों आदि के माध्यम से इन्हें ठीक या नियंत्रित किया जा सकता है.

हमारे देश में बहुत से बूढ़े मात्र इस कारण विकलांगों जैसा जीवन जी रहे हैं कि हमने मान लिया है कि बुढ़ापे में तो नजरें कमजोर हो ही जाती हैं, कान से सुनाई देना बंद हो ही जाता है, आदमी पगला-सा जाता ही है और घुटने आदि में दर्द तो होता ही है. मोतियाबिंद का ऑपरेशन, चश्मा, कानों की मशीन, डिमेंशिया की दवाइयां, घुटना बदलने का ऑपरेशन – कई इलाज हैं जो बूढ़े आदमी को पुन: जीवनशक्ति दे सकते हैं. दुनिया में बूढ़ों की संख्या बढ़ रही है. ये स्वस्थ रहेंगे तो समाज में अपना योगदान देंगे. यदि हम ध्यान नहीं देंगे तो बुढ़ापा और बूढ़े आदमी एक बड़ी समस्या बनकर समाज को चुनौती देने वाले हैं.

डॉक्टरों और समाज को समझना ही होगा कि जैसे बच्चों के डॉक्टर तथा बीमारियां एकदम अलग नजरिया मांगती हैं, वैसे ही बूढ़ों का इलाज करने वाले डॉक्टरों को भी अलग से ट्रेनिंग चाहिए.

बुढ़ापे की समस्या विकराल है. चुनौती भी बड़ी है. आदमी की औसत आयु लगातार बढ़ रही है. एक अनुमान के मुताबिक 2050 तक पूरी दुनिया में करीब एक अरब लोग 65 साल के आसपास के होंगे. इनमें से ज्यादातर बूढ़े भारत जैसे विकासशील देशों में होंगे क्योंकि यहां जनसंख्या ज्यादा है. इनमें भी औरतों की संख्या ज्यादा होगी क्योंकि वे पुरुषों से ज्यादा जीती हैं.

बूढ़े अमूमन बीमार होकर खटिया पकड़े रहते हैं. हम मान लेते हैं कि यह सब तो बुढ़ापे का अनिवार्य हिस्सा है. बूढ़े अपने दिन गिनते रहते हैं और हम भी जाने-अनजाने उनके दिन गिनते रहते हैं! डॉक्टरों के पास इतना समय और धैर्य नहीं. शायद संवेदना की भी कमी है. एक बूढ़ा मरीज तीन जवान मरीजों के बराबर ‘टाइम खा जाता है.’

उससे बीमारी पूछना भी एक अग्निपरीक्षा है. वह ऊंचा सुनता है. डॉक्टर की बात सुनता नहीं. अंदाज से समझने की कोशिश करता है. फिर वह बातें बताते हुए बहक भी जाता है. अभी की बात करते-करते वह सन बयालीस की बातें करने लगता है. वह परीक्षण कोच पर चढ़ने, लेटने में दस मिनट खराब कर डालता है. बूढ़े आदमी की जांच करने के लिए डॉक्टर में बडा धैर्य चाहिए. संवेदना भी. इसी चक्कर में बूढ़े या तो लक्षणों के आधार पर किया जाने वाला इलाज लेने को अभिशप्त हैं या अस्पताल और घर, दोनों जगह बराबर दुत्कारे जाते हैं.

बुढ़ापे से जुड़ी एक और बात सदियों से मानवजाति को आकर्षित करती रही है. वह यह कि क्या कोई ऐसी दवा, रसपान, काला जादू या जड़ी-बूटी कहीं है जो आदमी को बूढ़ा ही न होने दे. चिर-यौवन मानव मन का एक बड़ा सपना है जो हम नित्य ही खाली आंखों से देखते हैं, पर क्या वास्तव में ही कहीं कुछ ऐसा है? क्या बुढ़ापे की आमद को किसी चिकित्सकीय चमत्कार से रोका जा सकता है? क्या आदमी और भी लंबा जी सकता है? आप इन सबसे जुड़े विज्ञापन-दावे यहां-वहां पढ़ते-सुनते रहते होंगे. पर ऐसी दवा या तरीका अभी तक तो चिकित्सा विज्ञान के हाथ नहीं लगा है. हां, यह पाया गया है कि आदमी के जीवन की सारी कुंडली उसकी कोशिकाओं में दर्ज है.

कोशिका मतलब? इन्हें शरीर की बनावट में ईंट कह लें. यह पाया गया है कि जवान आदमी की कोशिकाएं प्रयोगशाला में फटाफट और भी नई कोशिकाएं बनाती जाती हैं. बूढ़े आदमी की कोशिकाएं यही काम बेहद धीमे-धीमे करती हैं. तो क्या कोशिकाओं में ‘सेल डिवीजन’ (कोशिका विभाजन) द्वारा नई कोशिकाएं न बन पाना ही बुढ़ापा पैदा करता है? क्या कोई दवा इस काम की गति बढ़ाकर बुढ़ापा रोक सकती है? कीट-पतंगों, कीड़े-मकौड़े और चूहों की कोशिकाओं के डीएनए को बदलकर देखा गया है कि डीएनए में कारस्तानी करने पर वे तत्काल बूढ़े हो गए. तो क्या हम डीएनए की इंजीनियरिंग का तरीका निकालकर बुढ़ापा टाल सकेंगे?

इस समय शोध इंसुलिन जीन्स पर भी चल रहा है और नर्व सेल्स पर भी. इनमें छेड़छाड़ करने पर पाया गया कि कीड़ों की उम्र बढ़ गई! उन मरीजों का भी खूब अध्ययन किया जा रहा है जो बारह-तेरह वर्ष की उम्र में ही बूढ़े हो जाते हैं. क्या हो जाता है इन्हें? उन जातियों का भी अध्ययन चल रहा है जिनमें औसत उम्र सौ साल है.

तो शायद भविष्य में कभी बुढ़ापे को रोका या टाला जा सके. लेकिन तब तक तो यह मान लें कि बुढ़ापा कोई बीमारी नहीं. बुढ़ापे को भी स्वस्थ रहकर गुजारा जा सकता है. कैसे? इसकी चर्चा हम अगले इतवार के कॉलम में करेंगे.