नीतीश कुमार ने हाल ही में जब अपने घर पर प्रशांत किशोर को गले लगाया और पार्टी के नेताओं के सामने उनका परिचय कराते हुए कहा कि ‘ये भविष्य हैं’ तो इसका मतलब यह निकाला जा रहा है कि उनके बाद जेडीयू में अब नंबर दो की हैसियत प्रशांत किशोर की हो सकती है.

जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के इस कार्यक्रम में मौजूद पार्टी के एक नेता का कहना था, ‘नीतीशजी के बेटे की सियासत में तनिक भी दिलचस्पी नहीं हैं और नीतीश अपने परिवार को पार्टी पर थोपना भी नहीं चाहते. इसलिए कई सालों से वे एक ऐसे नेता की तलाश में थे जो उनकी पार्टी का भविष्य बने.’ इस कवायद में नीतीश कुमार ने राजीव रंजन उर्फ ललन से लेकर आरसीपी सिंह जैसे कई नेताओं को आजमाया लेकिन वे उनकी कसौटी पर उतने खरे नहीं उतर पाए. यही वजह है कि बिना कुछ कहे-सुने ही नीतीश की पार्टी अब प्रशांत किशोर को एक नए नेता के तौर पर नहीं देख रही है. बिहार के एक पत्रकार बताते हैं कि जेडीयू में वापसी के बाद उनके स्वागत में पार्टी के कार्यकर्ता जो पोस्टर चिपका रहे हैं उन पर प्रशांत किशोर का पूरा नाम ‘प्रशांत किशोर पांडे’ लिखा हुआ है.

जो लोग प्रशांत किशोर को नहीं जानते हैं उन्हें उनके बीते कल के बारे में कुछ बातें जाननी चाहिए ताकि आगे की बातें और साफ-साफ समझ आने लगें. प्रशांत बिहार के ही बक्सर जिले के रहने वाले हैं और एक ब्राह्मण परिवार से आते हैं. उनके पिता श्रीकांत पांडे बक्सर जिले में सरकारी डॉक्टर थे, माताजी उत्तर प्रदेश के बलिया जिले से हैं और पत्नी असम से आती हैं. इसलिए पहले ही दिन से प्रशांत किशोर को जेडीयू एक ब्राह्मण नेता के तौर पर प्रचारित कर रही है.

लेकिन नीतीश कुमार प्रशांत किशोर को सिर्फ ब्राह्मण होने की वजह से लाए, यह कहना सही नहीं होगा. नीतीश कुमार और प्रशांत किशोर की शुरुआती मुलाकात के गवाह रहे कुछ नेताओं से बात करें तो दोनों की केमिस्ट्री के बारे में कुछ बातें पता चलती है. 2013-2014 में नरेंद्र मोदी की इमेज चमकाने में जुटे प्रशांत किशोर नेता नहीं नीति निर्धारक बनना चाहते थे. उनको पर्दे के पीछे रहकर सरकार चलाने और देश से जुड़े बड़े फैसलों में योगदान देने का चस्का था. लेकिन 2015 में नीतीश कुमार के संपर्क में आने के बाद ही प्रशांत किशोर के अंदर नेता बनने की इच्छा जागी.

इन दोनों के करीबी नेता एक मजेदार बात बताते हैं. पटना आने से पहले गुजरात और दिल्ली में प्रशांत किशोर शर्ट-टीशर्ट और जींस पहना करते थे. लेकिन पटना में नीतीश कुमार के आग्रह के बाद ही उन्होंने कुरता पायजामा पहनना शुरू किया. यहां तक कि सबसे पहले नीतीश ने ही उनके लिए छह जोड़ी कुरते-पायजामे बनवाए थे. जब भी प्रशांत किशोर या नीतीश कुमार से एक-दूसरे के बारे में सवाल पूछा जाता तो दोनों यही कहते कि यह रिश्ता बेहद आत्मीयता वाला और परिवार जैसा है. एक बार तो प्रशांत ने यह भी कहा कि अब भी उनके कपड़े और बैग नीतीश के घर पर रखे हैं और वे जब चाहें खाली हाथ वहां पर पहुंच सकते हैं.

यही नहीं, पटना में प्रशांत किशोर को रोकने के लिए नीतीश ने बिहार विकास मिशन की स्थापना की. इसकी जिम्मेदारी उनको दी गई. प्रशांत को कैबिनेट मंत्री का दर्जा भी दिया गया. लेकिन नीतीश कुमार और लालू यादव के महागठबंधन के दिनों में प्रशांत का मन पटना में नहीं लगा और वे अपनी टीम के साथ दिल्ली चले आए. फिर पिछले दो-ढाई साल में उन्होंने उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी और अखिलेश यादव के प्रचार की कमान संभाली. पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह को मुख्यमंत्री बनाने में अहम भूमिका निभाई. दक्षिण में वाईएसआऱ कांग्रेस का प्रचार देखने गए. लेकिन बताया जाता है कि कहीं मन नहीं लगा तो फिर नीतीश ने उन्हें पटना बुला ही लिया.

कुछ समय पहले एख खबर यह भी आई थी कि प्रशांत किशोर और नरेंद्र मोदी के बीच फिर से बातचीत शुरू हुई है. इस पर प्रशांत किशोर ने खुद एक बातचीत में बहुत-कुछ बताया और जो नहीं बताया वह अमित शाह के करीबी एक नेता के जरिये पता चला. असल में भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के मन में प्रशांत किशोर को लेकर एक बात बैठ गई है. पार्टी के एक नेता कहते हैं, ‘प्रशांत किशोर में नेता वाला धैर्य नहीं है, वे इंतजार करना नहीं जानते. जब 2014 में मोदी सरकार बनी तो प्रशांत किशोर को सरकार के किसी भी हिस्से में क्या भूमिका मिले ये तय करने में वक्त लग गया और प्रशांत के पास इतना सब्र नहीं था.’

प्रशांत किशोर की टीम के एक सदस्य बताते हैं, ‘प्रशांत को गाड़ी, बंगला या वेतन नहीं चाहिए था. वो सरकार के फैसले करने वाली मशीनरी का हिस्सा बनना चाहते थे. वो खुद और अपनी टीम के लिए ऐसा रोल चाहते थे जिसमें सिर्फ नेताओं को ही नहीं पेशेवर लोगों को भी देश का फैसला करने का हक मिले’. 2014 में ऐसा मुमकिन नहीं हो पाया तो प्रशांत किशोर का नरेंद्र मोदी से मोह भंग हो गया.’

लेकिन 2014 से 2018 के बीच प्रशांत किशोर बहुत बदल गए हैं. उत्तर प्रदेश में किए गए प्रयोग और फिर उसमें मिली असफलता ने एक चुनावी पंडित को नेता बनने पर मजबूर किया है. हालांकि इसकी और भी वजहें हैं. कांग्रेस के सूत्र बताते हैं कि प्रशांत, राहुल गांधी के बेहद करीब कभी नहीं थे. कांग्रेस वॉर रूम में उनकी एंट्री प्रियंका गांधी के जरिए हुई थी और अब 2019 के लिए राहुल और प्रियंका ने अपनी अलग टीम बना ली है जिसमें प्रशांत किशोर के लिए कोई खास जगह नहीं छोड़ी गई है. इसी तरह मोदी और अमित शाह ने भी 2019 के लिए अपनी बैकरूम टीम तैयार कर ली है और अब उसे बदलने का वक्त नहीं है. नीतीश कुमार एक ऐसे नेता हैं जो अब भी अपनी छवि, अपनी पार्टी के भविष्य और अपने आने वाले कल को लेकर साफ नहीं दिखते. इसलिए उन्होंने प्रशांत किशोर को पटना बुलाया.

पटना से जिस तरह की खबरें आ रही है वे बेहद रोचक परिस्थिति की तरफ इशारा कर रही हैं. नीतीश कुमार अपने नेतृत्व में प्रशांत किशोर को नेतागिरी सिखाने की तैयारी में जुट गए हैं. खबर गर्म है कि उन्हें पहले लोकसभा या राज्यसभा भेजा जाएगा. प्रशांत चुनाव लड़ने के इच्छुक बताए जाते हैं, लेकिन नीतीश कुमार ने उन्हें पहली दफा चुनाव हारने के खतरे को भी समझाया है. सुनी-सुनाई है कि अगर भाजपा ने प्रशांत किशोर के लिए बक्सर या दरभंगा जैसी ब्राह्मण बहुल सीट नहीं छोड़ी तो नीतीश उन्हें अपने गृह जिले नालंदा से चुनाव लड़वा सकते हैं. नहीं तो फिर उन्हें राज्य सभा में भेजा जाएगा.

एक खबर और भी चल पड़ी है कि नीतीश कुमार अब बहुत दिनों तक पटना की राजनीति नहीं करना चाहते. वे दिल्ली आना चाहते हैं और पटना की कुर्सी प्रशांत को सौंपना चाहते हैं. सूत्रों की मानें तो इसके पीछे की सोच यह है कि विधानसभा चुनाव में इस बार नीतीश का मुकाबला लालू यादव से नहीं उनके बेटे तेजस्वी से होगा. 29 साल के तेजस्वी से लड़ना नीतीश को पसंद नहीं आ रहा है. तेजस्वी अपने ‘चाचा’ नीतीश पर ऐसे-ऐसे जहरीले शब्दबाण चला रहे हैं कि जिनका जवाब देने में भी उन्हें संकोच होता है. इसलिए नीतीश कुमार ने अब अपना एक ऐसा उत्ताराधिकारी चुना है जो कई राजनेताओं को प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री बनाने का काम कर चुका है. इस बार नीतीश उसे मुख्यमंत्री बनने की ट्रेनिंग दे रहे हैं.