तमिलनाडु की सामाजिक और राजनीतिक बुनावट पर ईवी रामास्वामी यानी पेरियार का असर कितना गहरा है, इसका एक अंदाजा इससे भी लग सकता है कि साम्यवाद से लेकर दलित आंदोलन, तमिल राष्ट्रवाद, तर्कवाद और नारीवाद तक हर धारा से जुड़े लोग उनका सम्मान करते हैं. सम्मान ही नहीं करते बल्कि उन्हें मार्गदर्शक के रूप में देखते हैं. उन्हें एशिया का सुकरात भी कहा जाता है.

एक धार्मिक हिंदू परिवार में पैदा हुए पेरियार धर्म के घनघोर विरोधी रहे. ब्राह्मणवाद और हिंदू धर्म की कुरीतियों पर उन्होंने छोटी उम्र से ही प्रहार करना शुरू कर दिया था. वे न मूर्ति पूजा को मानते थे, न ही वेदांत को और न ही बाकी हिंदू दर्शन में उनकी आस्था थी. उन्होंने न केवल धर्म ग्रंथों की होली जलाई बल्कि रावण को अपना नायक भी माना.

पेरियार महात्मा गांधी के सिद्धांतों से प्रभावित होकर कांग्रेस में शामिल हुए थे. इसी दौरान उन्होंने 1924 में केरल में हुए वाइकोम सत्याग्रह में अहम भूमिका निभाई. अब तक तमिलनाडु में उनका कद काफी ऊंचा हो चुका था. वाइकोम सत्याग्रह के बाद लोगों ने उन्हें ‘वाइकोम वीरन’ यानी ‘वाइकोम का नायक’ की उपाधि दी थी. यही वह दौर था जब कांग्रेस में ब्राह्मणों और कथित उच्च वर्ग से उनका टकराव बढ़ने लगा और उन्होंने पार्टी छोड़ दी.

बाद में पेरियार ने दलित-हरिजनों और महिलाओं के लिए ‘सेल्फ रिस्पेक्ट’ आंदोलन यानी आत्मसम्मान आंदोलन भी चलाया. माना जाता है कि इन आंदोलनों के चलते तमिल और दक्षिण भारत की एक बड़ी आबादी समाज सुधार की तरफ प्रेरित हुई थी. यही वजह है कि पेरियार को राजा राममोहन राय, दयानंद सरस्वती और विनोबा भावे सरीखे समाज सुधारकों की पांत में रखा जाता है. लेकिन इनसे अलग वे एक मंझे हुए राजनेता भी थे.

पेरियार की राजनीति

केरल का वाइकोम सत्याग्रह दलितों को यहां स्थित एक प्रतिष्ठित मंदिर में प्रवेश दिलाने और मंदिर तक जाती सड़कों पर उनकी आवाजाही का अधिकार दिलाने का आंदोलन था. महात्मा गांधी के साथ और कई बड़े नेताओं ने इस आंदोलन को अपना समर्थन दिया था. पेरियार ने भी इस आंदोलन में अहम भूमिका निभाई थी और उन्हें इसके लिए जेल भी भेजा गया. आखिरकार यह आंदोलन सफल हुआ था.

इसके बाद पेरियार तमिलनाडु में नायक बन गए थे. वाइकोम सत्याग्रह ब्राह्मणवाद के खिलाफ ही था और पेरियार खुद ब्राह्मणों के मुखर विरोधी थे. माना जाता है कि दक्षिण में उनकी तेजी से बढ़ती लोकप्रियता के चलते कांग्रेस में मौजूद ब्राह्मणों का एक बड़ा तबका खासा आहत था. उधर दूसरी तरफ पेरियार का मानना था कि वाइकोम सत्याग्रह में उनकी भूमिका दबाने की कोशिश की गई थी.

यहां पेरियार के कांग्रेस नेताओं से टकराव के लिए एक और घटना का जिक्र किया जा सकता है. उस समय तमिलनाडु के कुछ गुरुकुलों को कांग्रेस पार्टी वित्तीय मदद देती थी. यहां कई गुरुकुलों में ब्राह्मण और अन्य जाति के बच्चों के खाने-पीने की व्यवस्था अलग-अलग थी और खाने में भी गुणवत्ता का अंतर था. पेरियार इसके खिलाफ आवाज उठाना चाहते थे लेकिन पार्टी ने कभी इसको तवज्जो नहीं दी.

इसी क्रम में 1925 के दौरान पेरियार ने तमिलनाडु कांग्रेस के सामने पार्टी नेतृत्व में गैर-ब्राह्मणों को अधिक भागीदारी देने से जुड़ा एक प्रस्ताव रखा. लेकिन इसे पार्टी ने सिरे से खारिज कर दिया. इस घटना के बाद पेरियार ने खुलकर कांग्रेस में बगावत कर दी. उन्होंने उसी समय अपने समर्थकों के बीच ऐलान भी किया कि वे एक दिन राज्य से कांग्रेस का सूपड़ा साफ कर देंगे.

अपनी राजनीतिक आवाज को धार देने के लिए पेरियार ने 1938 में जस्टिस पार्टी का गठन किया. फिर 1944 में इसे भंग करके उन्होंने द्रविड़ मुनेत्र कझगम (डीएमके) बनाई. कांग्रेस को तमिलनाडु से बाहर करने का पेरियार का सपना 1968 में पूरा हुआ जब डीएमके ने पहली बार राज्य में सरकार बनाई.

पेरियार को अपने वक्त से आगे का आदमी भी कहा जाता है. यह महिलाओं की स्वतंत्रता को लेकर उनके विचारों से भी जाना जा सकता है. उन्होंने बाल विवाह खत्म करने, विधवा महिलाओं को दोबारा शादी का अधिकार देने, शादी को पवित्र बंधन की जगह साझीदारी के रूप में समझने जैसे तमाम मुद्दों पर अभियान चलाए. अपने भाषणों में वे लोगों से कहा करते थे कि वे कुछ भी सिर्फ इसलिए स्वीकार न करें कि उन्होंने वह बात कही है. पेरियार का कहना था, ‘इस पर विचार करो. अगर तुम समझते हो कि इसे तुम स्वीकार सकते हो तभी इसे स्वीकार करो, अन्यथा इसे छोड़ दो.’