दो साल पहले की बात है. उत्तर प्रदेश के बरेली शहर की शास्त्रीनगर कॉलोनी में रहने वाली ममता रानी को ठंड के साथ तेज बुखार आया था. उन्होंने नज़दीकी चिकित्सक को दिखाया तो ऊपरी लक्षणों के आधार पर उन्हें मलेरिया की दवा दे दी गई. इससे थोड़ा आराम तो लगा पर बुखार पूरी तरह ठीक नहीं हुआ. लिहाज़ा परिजनों ने उन्हें शहर के कई नामी चिकित्सकों को दिखाया. लेकिन किसी को उनकी बीमारी ठीक से समझ में नहीं आई. इस बीच ममता की हालत बिगड़ गई. पेशाब से खून आने लगा. खून में प्लेटलेट्स कम होने लगे. ऐसे में उन्हें स्थानीय अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा. तमाम जांचें हुईं. पांच यूनिट खून भी चढ़ा. लेकिन उनकी हालत जस की तस रही. इसके बाद उन्हें लखनऊ रेफर कर दिया गया. वहां संजय गांधी पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज़ (पीजीआई) में भी डेंगू, मलेरिया, एनीमिया से लेकर और कई जांचें हुईं. लेकिन किसी से कुछ पता नहीं चला. इस दौरान कई यूनिट प्लेटलेट्स भी चढ़ाए जाते रहे. लेकिन फिर भी ममता की मौत हो गई.

बीते एक महीने से बरेली मंडल के चार जिलों - बरेली, बदायूं, शाहजहांपुर, पीलीभीत में ममता रानी के जैसी ही कहानियां फिर लगातार सामने आ रही हैं. वैसी ही रहस्यमयी बीमारी, रहस्य के उतने ही पर्दों में ढंका इलाज़ और फिर नतीजे़ में मरीज की मौत. मसलन अभी 14 सितंबर को ही बरेली की नवाबगंज तहसील के मल्लपुर गांव का रहने वाला चार साल का बच्चा अजय इसी तरह की रहस्यमयी बीमारी से जान गवां बैठा. ऐसे ही आंवला तहसील के भिंडौरा गांव के 32 वर्षीय असद की भी मौत हुई. और सिर्फ ये दो नहीं स्थानीय मीडिया की ख़बरों के मुताबिक बीते महीने भर में पूरे बरेली मंडल में इस तरह की 350 से अधिक मौतें हो चुकी हैं. बीते रविवार को ही बदायूं में 15, बरेली में पांच और शाहजहांपुर तथा पीलीभीत में एक-एक मरीज की मौत की ख़बर है. इन्हें मिलाकर एक माह के भीतर बदायूं में 199 और बरेली में 140 मरीज अपनी जान से हाथ धो चुके हैं. इन्हीं दो जिलों में स्थिति ज़्यादा गंभीर है. इस दौरान शाहजहांपुर और पीलीभीत में भी 20 और 11 लोगों की मौत हो चुकी है.

लोगों का तो पता नहीं पर स्वास्थ्य विभाग ज़रूर ‘दिमागी बुखार’ से पीड़ित लगता है

इतने बड़े पैमाने पर मौतें होने के बावज़ूद स्वास्थ्य विभाग, उसके अधिकारी और कर्मचारी सब ‘दिमागी बुखार’ से पीड़ित लग रहे हैं. क्योंकि उन्हें अब तक कुछ सूझ नहीं रहा है. कभी इन मौतों का कारण मलेरिया मानकर उसका बड़े पैमाने पर इलाज शुरू कर दिया जाता है. कभी डेंगू या चिकनगुनिया की जांच की बात कही जाती है. लेकिन उनके विभाग के मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह इस बीमारी को ‘दिमागी बुखार’ मानते हैं.

स्थानीय स्तर पर छपी ख़बरों के मुताबिक उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह अभी हाल ही में ही बरेली आए थे. उन्होंने यहां हालात का जायजा लिया. विभागीय अफसरों की बैठक ली. बताया जाता है कि इस बैठक में ही उन्होंने साफ कहा, ‘विभाग ने जांच के नाम पर धोखा किया. दिमागी बुखार से मौतें होती रहीं और इलाज वायरल तथा मलेरिया का होता रहा.’ स्वास्थ्य मंत्री ने कुछ अधिकारियों से उनके प्रभार छीनने और कुछ को निलंबित करने की कार्रवाई भी की. लेकिन इस बैठक के बाद नतीज़ा फिर वही ‘ढाक के तीन पात.’

सत्याग्रह की पड़ताल बताती है कि स्वास्थ्य मंत्री भले इस इलाके में फैली बीमारी को दिमागी बुखार बता रहे हों लेकिन उनका विभाग इसे अब तक जानलेवा मलेरिया की किस्म - ‘प्लाजमोडियम फाल्सीपेरम’ (पीएफ) - ही मानता है. इस धारणा के आधार पर पूरे मंडल में इसकी रोकथाम के लिए अभियान चल रहा है. इसकी जांच के लिए सिर्फ बरेली और बदायूं जिलों में ही करीब एक लाख के क़रीब रैपिड डायग्नोस्टिक टेस्ट (आरडीटी) किट लखनऊ से भिजवाई गई हैं. जबकि विशेषज्ञों की मानें तो मलेरिया पीएफ की पुष्टि माइक्रोस्कोपिक जांच से ही हो सकती है.

पीजीआई, लखनऊ के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ रघुनंदन प्रसाद सत्याग्रह से बातचीत में साफ कहते हैं, ‘किसी भी तरह के मलेरिया का इलाज बगैर पुष्टि के नहीं होना चाहिए. डब्ल्यूएचओ की 2015 की गाइडलाइंस में भी बिना पुष्टि के इलाज को गलत माना गया है. और मलेरिया पीएफ के लिए तो माइक्रोस्कोपिक टेस्ट बहुत ही ज़रूरी है.’

यहां एक दिलचस्प बात का और उल्लेख किया जा सकता है. अभी कुछ समय पहले तक विभाग को मरीजों की जांच में मलेरिया पीएफ का एक भी मामला नहीं मिल रहा था. और अब इतने बड़े पैमाने पर मलेरिया पीएफ का इलाज यह कहते हुए किया कहा जा रहा है कि बीते 20 सालों में यह खतरनाक बीमारी पहली बार फैली है. ऐसे में सवाल उठता है कि विभाग को अचानक मलेरिया पीएफ का सुराग मिला तो कैसे मिला? सो यह गुत्थी भी स्थानीय मीडिया में आ रही ख़बरों से कुछ हद तक सुलझती है. ख़बरों के मुताबिक संक्रमण की स्थिति गंभीर होने के बाद लखनऊ से निगरानी टीम और दिल्ली से केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की टीम बरेली मंडल के दौरे पर आई थीं. दोनों टीमों का निष्कर्ष यह रहा कि इलाके में फैली बीमारी मलेरिया पीएफ ही है.

जानकारी के मुताबिक लखनऊ की टीम भी आरडीटी किट से ही जांच करके इसके निष्कर्ष पर पहुंची थी कि यह बीमारी मलेरिया पीएफ है. यानी कि विशेषज्ञ भले ही आरडीटी किट को मलेरिया पीएफ की जांच के लिए सही न मानें लेकिन लखनऊ की टीम इसे पर्याप्त मानती है. इस टीम के सदस्य डॉक्टर विकासेंदु अग्रवाल यह उम्मीद भी जताते हैं कि अगले 10 दिनों में बीमारी पर काबू पा लिया जाएगा. हालांकि अब तक इस मामले में जो किया गया है उससे ज्यादा उम्मीद बंध नहीं पाती है.

लखनऊ की टीम के निष्कर्षों को बल देने का काम केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की टीम ने भी किया और वह भी बिना किसी जांच के. खबरों के मुताबिक इस टीम ने धान के खेतों में भरे पानी में पनप रहे मच्छरों के लार्वा को मलेरिया पीएफ के प्रसार का दोषी ठहरा दिया. साथ में मशविरा दिया कि इस ‘पानी में गैम्बुजिया मछली डाल दें. वह मच्छरों के लार्वा खा जाएगी और कुछ समय बाद स्थिति नियंत्रण में आ जाएगी.’ और रही बात जांच की तो यह टीम अपने साथ कुछ मरीजों से खून आदि के नमूने लेकर दिल्ली रवाना हो गई है. इस जांच के नतीजे अब तक सामने नहीं आए हैं.

इधर विभाग के दावों की हवा डॉक्टर ही निकाल रहे हैं

लखनऊ और दिल्ली की विशेषज्ञ टीमों ने बिना जांच के ही या आधी-अधूरी जांच के आधार पर जो लकीर खींची पूरा विभागीय अमला अब उसे ही पीटने में लगा है. जबकि स्वास्थ्य विभाग के ही कुछ अन्य अधिकारी इन टीमों के दावों की हवा निकाल देते हैं. मसलन यहां के पूर्व मलेरिया अधिकारी डॉक्टर पीके जैन उन चुनिंदा अधिकारियों में हैं जिन पर इस मामले में सरकारी डंडे की चोट पड़ी है. डॉक्टर जैन फिलहाल निलंबित हैं. सत्याग्रह ने ख़ास तौर पर उनसे संपर्क कर विभाग के तमाम दावों की पुख़्तगी की.

जैन बताते हैं, ‘नौ महीनों में विभिन्न स्वास्थ्य केंद्रों से खून के 8,862 नमूने जांच के लिए आए. इनमें मलेरिया पीएफ का एक भी मामला नहीं थी. ऐसे ही जिला अस्पतालों से 7,500 मरीजों के नमूने आए उनमें भी मलेरिया पीएफ का कोई केस नहीं मिला. कुछ मामले मलेरिया पीवी (प्लाज़्मोडियम वाइवैक्स) के ज़रूर मिले थे’ इसके अलावा डॉक्टर पीके जैन एक और ख़ास बात बताते हैं, ‘अधिकांश नमूनों में मरीजों के खून में प्लेटलेट्स की संख्या काफी कम पाई गई. यह स्थिति चिंताजनक है क्योंकि मलेरिया पीवी में ऐसा लक्षण देखने में नहीं आता है.’

ऐसे ही मंडल (संभाग) मुख्यालय, बरेली के अस्पताल में अभी विशेष तौर पर तैनात किए गए दो अतिरिक्त चिकित्सकों में से एक हैं डॉक्टर वागीश वैश्य. सत्याग्रह से बातचीत में उनका कहना भी यही था, ‘अब तक केवल तीन मरीज मलेरिया पीएफ के भर्ती हुए हैं. जबकि 25 मरीज पीवी के आए हैं. बुखार के मरीजों में 20 प्रतिशत मरीज ऐसे हैं जिनमें टायफाइड और वायरल के मिले-जुले लक्षण देखने में आए हैं.’

यहां ग़ौर करने वाली बात यह है कि टायफाइड और वायरल के मिले-जुले लक्षणों की तरफ अभी किसी का ध्यान ही नहीं है. इतना ही नहीं अभी 15 सितंबर को निजी अस्पतालों के संचालकों की भी जिला कलेक्टर के साथ बैठक हुई थी. इसमें मौज़ूद चिकित्सकों ने भी कहा कि इलाके में हो रही ‘मौतों में मलेरिया की भूमिका न के बराबर है. और जो मलेरिया दिख रहा है वह सामान्य है. उसका इलाज़ हो सकता है.’

ज़िम्मेदारों के बयान भी ‘समझ और समन्वय की कमी’ का इशारा करते हैं

अब ज़रा इस गंभीर समस्या पर ज़िम्मेदारों की गंभीरता देखिए. जिस रोज स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह बरेली मंडल में फैली बीमारी को ‘दिमागी बुखार’ बताकर रवाना हुए उसी दिन शाम को सत्याग्रह ने बरेली के संभागीय आयुक्त रणवीर प्रसाद से संपर्क किया. उनका कहना था कि यहां हुई ‘ज़्यादातर मौतें मलेरिया से ही हुई हैं. लोगों ने ख़ुद ही बीमारी का इलाज़ कराने में लापरवाही बरती इसलिए स्थिति बिगड़ गई. साथ ही दूषित पेयजल की समस्या ने इसे और गंभीर बना दिया.’

वहीं स्वास्थ्य निदेशालय में संक्रामक रोग विभाग के निदेशक डॉक्टर मिथिलेश चतुर्वेदी का जो बयान आठ सितंबर को हिंदुस्तान अख़बार में प्रकाशित हुआ वह कुछ यों था - ‘बुखार पीड़ितों की मौत का अभी कोई एक सही कारण सामने नहीं आया है. पीड़ितों से लिए गए नमूनों की क्षेत्रीय प्रयोगशाला में जांच से यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि उनमें डेंगू, चिकनगुनिया जैसी किसी बीमारी के वायरस थे या नहीं.’ और मार्के की बात ये है कि ऐसी किसी जांच कोई नतीज़ा अब तक भी सामने नहीं आया है.

संभवत: इसीलिए इस क्षेत्र के पूर्व सांसद सर्वराज सिंह सवाल उठाते हैं, ‘लगता है, सरकार और उसका स्वास्थ्य विभाग स्थिति की भयावहता को मानने के लिए तैयार ही नहीं है. यही कारण है कि वह अब तक इससे निपटने के तौर-तरीकों के बारे में भी कुछ समझने-समझाने की स्थिति में नहीं दिखता. मैं कहता हूं कि जब तक सच स्वीकारा नहीं जाएगा तो बचाव कैसे होगा?’

यानी कुल मिलाकर बरेली मंडल के चार जिलों में जितनी गंभीर स्थिति ‘रहस्यमय बीमारी के संक्रमण’ की है, उससे कहीं ज़्यादा भयावह स्थिति ‘सरकारी लापरवाही के संक्रमण’ की नज़र आ रही है. और यह दूसरा वाला संक्रमण तब और ज़्यादा चिंताजनक हो जाता है जब सूत्राें के हवाले से पता चलता है कि स्वास्थ्य ‘विभाग के अंदरख़ाने एक धारणा यह भी है कि मौसम में धीरे-धीरे ठंडक बढ़ने के साथ संक्रमण और बीमारी का प्रकोप ख़ुद-ब-ख़ुद ठंडा पड़ जाएगा.’ अलबत्ता तब तक यह मिला-जुला प्रकोप कितने और लोगों की जान ले लेगा कोई नहीं जानता!