केरल के एक कैथोलिक बिशप द्वारा एक नन के साथ बलात्कार के आरोप से कई लोगों को लग सकता है कि यह एक अपवाद है. ऐसे काम तो प्रायः हिंदू साधू-संत और धर्मगुरु या पंडित ही करते हैं. लेकिन सच्चाई यह है कि दुनिया भर में फैले ईसाई कैथोलिक चर्च के पादरियों के बीच, विशेषकर बच्चों के साथ, हर प्रकार के यौनदुराचार की कुरीति-सी बन गयी है.

भारत से सात हज़ार किलोमीटर दूर जर्मनी का कैथोलिक चर्च भी, ठीक इसी समय, अपने धर्माधिकारियों की यौनलिप्सा के कारण भयंकर धर्मसंकट में पड़ गया है. खुद कैथोलिक चर्च द्वारा करवाये गये एक अध्ययन की रिपोर्ट–इससे पहले कि चर्च के उच्च धर्माधिकारी उसमें कोई हरफेर या लीपापोती कर पाते–समय से पहले ही मीडिया में लीक हो गयी है. मूल योजना यह थी कि जर्मन बिशप 25 सितंबर को होने वाले अपने शरदकालीन सम्मेलन में इस अध्ययन के निष्कर्षों पर सोच-विचार करने के बाद ही कुछ कहते.

धर्म की आड़ लेकर बच्चों के साथ अधर्म

रिपोर्ट के अनुसार 1946 से 2014 के बीच जर्मन कैथोलिक चर्च के कम से कम 1670 पादरियों और उनसे ऊपर के धर्माधिकारियों ने पूरे देश में कम से कम 3677 नाबालिग बच्चों को अपनी कामवासना का शिकार बनाया. पीड़ितों में से आधे से अधिक 14 साल से कम आयु के थे. हर छठवां बच्चा किसी न किसी प्रकार के बलात्कार का शिकार बना.

ईसाई कैथोलिक चर्च के पदानुक्रम में, सबसे नीचे के पादरी (फ़ादर) से लेकर बिशप, कार्डिनल और पोप तक, सभी को आजीवन अविवाहित रह कर ब्रह्मचर्य का पालन करना पड़ता है. सभी पादरी भ्रष्ट नहीं होते, पर जो होते हैं वे अपने ब्रह्मचर्य का किस तरह पालन करते हैं, इसकी कलई लीक हो गयी इस रिपोर्ट से खुल गयी है.

चर्च की पवित्रता को पलीता

मीडिया के हाथ लगी रिपोर्ट जिस खोजी अध्ययन का निचोड़ है, उसे जर्मनी के मानहाइम, हाइडेलबेर्ग और गीसन विश्वविद्यालयों के मनोचिकित्सकों, मनोवैज्ञानिकों, समाजशास्त्रियों और अपराध-वैज्ञानिकों की एक मिलीजुली टीम ने, तैयार किया है. चर्च की फ़ाइलों को पांच वर्षों तक खंगालने के बाद तैयार कई सौ पन्नों का उनका यह अध्ययन चर्च की पवित्रता को पलीता लगाता है. उन्होंने लिखा है कि उनके बताये आंकड़े ‘न्यूनतम अनुमान हैं’. सच्चाई यह देखते हुए वैसे भी कई गुना बड़ी ही होनी चाहिये कि जर्मनी में नाबालिग बच्चों के साथ यौनदुराचार के हर साल 12 हज़ार से अधिक मामले होते हैं.

जर्मनी के कोलोन बिशप-क्षेत्र में इस खोज की प्रभारी प्रोफ़ेसर क्लाउडिया बुन्डशू ने एक स्थानीय दैनिक से कहा, ‘आंकड़े सारी सच्चाई नहीं दिखाते. हम उन्हीं मामलों को अपने अध्ययन में शामिल कर सके, जो (चर्च की) फ़ाइलों में दर्ज मिले. किंतु जो मामले फ़ाइलों में मिले, वे असली मामलों का न्यूनतम हिस्सा-भर हैं... एक अज्ञात संख्या में फ़ाइलें नष्ट कर दी गयी हैं.’

अपने पद को अभयदान समझ बैठे

प्रो. बुन्डशू कहती हैं कि अपराधियों को दंडित करने के लिए जो पारदर्शिता और इच्छाशक्ति होनी चाहिये, वह कैथोलिक चर्च के पास नहीं है. यह सोचने पर कि भक्तजन अपने चर्च के पदाधिकारियों का कितना मान-सम्मान करते हैं, ‘बहुत कम ही सही, जो संख्याएं उजागर हुई हैं, वे भी अपने आप में बहुत ही भयावह हैं. अपराधियों के प्रति नरमाई तो और भी असहनीय है... ऐसा लगता है कि चर्च के अधिकारी अपने पद को अपने लिए अभयदान समझ बैठे हैं.’

स्वाभाविक ही है कि जर्मन कैथोलिक चर्च, 25 सितंबर के बिशप सम्मेलन से पहले ही, जांच का सारांश मीडिया में आ जाने से भन्नाया हुआ है. इन मीडिया-रिपोर्टों से अपने नाम और काम पर बट्टा लगने की चिंता करने के बदले चर्च उन्हें उन पादरियों और धर्माधिकारियों पर ‘कुठाराघात’ बता रहा है, जो अब निजी तौर पर प्रभावित होंगे. मीडिया-रिपोर्टों के अनुसार, खोजियों की टीम ने चर्च के जिन 1670 दुष्कर्मियों को बेनक़ाब किया है, उनमें से 1429 डियोसेज़न (धर्म-प्रदेश) स्तर के पादरी, 149 मठवासी (मॉन्क) और 24 धार्मिक जनसेवक (डीकॉन) हैं या रहे हैं.

एक से अधिक बार बच्चों का यौन शोषण

क़रीब एक हज़ार दोषियों ने एक ही बार किसी बच्चे को अपना शिकार बनाया, जबकि बाक़ी ने एक से अधिक बार बच्चों का यौन शोषण किया. 96 तो ऐसे रहे हैं, जिन्होंने बाक़ायदा सौ से भी अधिक बार बच्चों के साथ कुकर्म किया! जिन बच्चों का शोषण हुआ, उनमें से 63 प्रतिशत लड़के और 37 प्रतिशत लड़कियां थीं. तीन-चौथाई बच्चे चर्च की प्रार्थना सभाओं, स्कूल में धर्म शिक्षा की कक्षाओं या किशोरावस्था वाले धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान अपने साथ दुराचार करने वाले पादरी, धर्मशिक्षक या चर्च-अधिकारी के संपर्क में आये.

जर्मनी कहने को तो धर्मनिरपेक्ष देश है, लेकिन ईसाई धर्म का सर्वत्र प्रभुत्व है. स्कूलों में धर्म शिक्षा का पाठ्यक्रम बनाने और विश्वविद्यालयों में ईसाई धर्शास्त्र के प्रोफ़ेसरों की नियुक्ति में चर्च को सहनिर्णय का अधिकार है. 2016 के आंकड़ों के अनुसार, 28.5 प्रतिशत जर्मन नागरिक कैथोलिक चर्च के और 26.5 प्रतिशत प्रोटेस्टैंट चर्च के विधिवत सदस्य हैं. उन्हें सदस्यता-फ़ीस के तौर पर अपने वेतन या आय के नौ प्रतिशत के बराबर चर्च-टैक्स देना पड़ता है, जिसे सरकारी आयकर विभाग वसूल करता है.

जर्मनी के चर्च संसार में सबसे धनी

कौन कैथोलिक है और कौन प्रोटेस्टैंट, इसे देखते हुए आयकर विभाग वसूला गया टैक्स संबद्ध चर्च को सौंप देता है. जर्मनी के दोनों बड़े चर्च ईसाई जगत की सबसे धनी धर्मिक संस्थाएं हैं. उनके पास अरबों यूरो की ज़मीन-जायदाद है. अपने आप को धर्ममुक्त बताने वाले 36 प्रतिशत लोग भी अधिकतर ऐसे लोग हैं, जिन्होंने चर्च-टैक्स बचाने के लिए ही अपनी सदस्यता या तो त्याग दी है या वे चर्च से नाराज़ अथवा असहमत हैं.

दोनों चर्चों (संप्रदायों) के अपने ख़ुद के स्कूलों में, अन्य प्रकार के निजी स्कूलों में या स्वयं सरकारी स्कूलों में भी, बच्चों को इन्हीं दोनों संप्रदायों की धर्मशिक्षा देने का नियम है. दोनों चर्च ही देश के अधिकांश स्कूलों के या तो स्वयं मालिक हैं या बहुत-से सरकारी स्कूलों का संचालन-प्रबंधन भी, सरकारी ख़र्च पर, उन्हीं को सौंप दिया गया है.

चर्च के स्कूल सरकारी पैसे से चलते हैं

चर्च यदि किसी स्कूल का स्वयं ही मालिक है, तब भी स्कूल चलाने का 84 प्रतिशत ख़र्च 78+2+4 प्रतिशत के अनुपात में उसे क्रमशः राज्य सरकार, केंद्र सरकार और स्थानीय निकाय (नगरपालिका) से मिलता है. बाक़ी 15 प्रतिशत में से 10 प्रतिशत ख़र्च विद्यार्थियों के घर वालों को और केवल 5 प्रतिशत चर्च को स्वयं उठाना होता है.

चर्च ही जिस स्कूल का मालिक हो, वहां ईसाई बच्चों के लिए धर्मशिक्षा अनिवार्य है. ग़ैर-ईसाई बच्चे धर्मशिक्षा से मना कर सकते हैं. पूरी तरह सरकारी स्कूलों में भी दोनों ईसाई संप्रदायों के बच्चों के लिए धर्मशिक्षा की अलग-अलग कक्षाएं लगती हैं. धर्मशिक्षा स्कूली पढ़ाई का अंग होने के कारण ही लगभग सभी ईसाई बच्चे चर्च के पादरियों के संपर्क में आते हैं और उन्हें उनका य़ौनशोषण करने का मैक़ा मिलता है.

चर्च की उदासीनता

कैथोलिक चर्च के अभिलेखागारों में नष्ट कर दिये जाने से बची हुई फ़ाइलों को देखने-पढ़ने वाली टीम ने पाया कि उसने जिन 1670 दुष्कर्मियों की पहचान की है, उन में से केवल एक-तिहाई से ही चर्च के अधिकारियो ने अपनी तरफ़ से कोई पूछ-ताछ की. इन एक-तिहाई में से एक-चौथाई के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं की गई. जिनके विरुद्ध कोई कार्रवाई हुई, उनमें से 41 को उनके पदों पर से हटा दिया गया और 88 को धर्म-बहिष्कृत कर दिया गया. अन्यों को या तो स्थानांतरित, कुछ समय के लिए निलंबित या फिर पेंशन दे कर सेवानिवृत्त कर दिया गया.

खोजी टीम ने शिकायत की है उसके सदस्यों को फ़ाइलें स्वतंत्र रूप से स्वयं ढू़ंढने का अवसर नहीं दिया गया, बल्कि उन्हें उसी सामग्री से काम चालाना पड़ा, जो हर बिशप-क्षेत्र के प्रभारी ने उन्हें सौपी. इन सौपी गई सामग्रियों में उन्हें हेराफेरी के संकेत भी मिले.

अमेरिका में भी ऐसा ही भंडोफोड़

ठीक इसी प्रकार के समाचार इस वर्ष अगस्त के मध्य में अमेरिका से भी सुनने में आये थे. वहां के पेंसिल्वेनिया राज्य की ‘ग्रैंड जूरी’ ने राज्य के छह कैथोलिक बिशप-क्षेत्रों में छानबीन के बाद कहा कि वहां के 300 से अधिक पादरियों इत्यादि ने कम से कम एक हज़ार बच्चों के साथ यौनदुराचार किया है. इन दुराचारों को छिपाने के कैथोलिक चर्च के तौर-तरीकों को जूरी ने ‘सच्चाई छिपाने की अभ्यास-पुस्तिका’ बताया.

अपनी रिपोर्ट में ‘ग्रैंड जूरी’ के सदस्यों ने लिंखा, ‘हम समझते हैं कि जिन बच्चों के बारे में रिकार्ड नहीं मिले या जो भय के कारण अपनी बात कहने के लिए आगे नहीं आ रहे हैं, उनकी सही संख्या कई-कई हज़ार में जाती है... पादरी बालकों और बालिकाओं के साथ बलात्कार कर रहे थे और ईश्वर के वे प्रतिनिधि, जो उनके (पादरियों के) लिए जिम्मेदार हैं, सब कुछ छिपाने में लगे रहे. दशकों तक यही होता रहा. बिशपों, आर्कबिशपों, कार्डिनलों को बचाया जाता रहा. कुछ को तो – जिनके इस रिपोर्ट में नाम भी हैं – पदोन्नति (प्रमोशन) तक दी गयी.’

1947 तक के कारनामों की छानबीन

पेंसिल्वेनिया की ‘ग्रैंड जूरी’ ने भी कैथोलिक धर्माधिकारियों के 1947 तक के कारनामों की छानबीन की है. उसे जिन दुराचारों के प्रमाण मिले, कुछ अपवादों को छोड़ कर, वे इस बीच इतने पुराने हो चुके हैं कि कोई क़ानूनी कार्रवाई नहीं हो सकती. रिपोर्ट में कई मामलों के ऐसे घिनौने वर्णन भी हैं, जो केवल अश्लील फ़िल्मों में ही देखने को मिलते हैं.

विश्व भर में फैले कैथोलिक चर्च के पादरियों और धर्माधिकारियों के यौनदुराचारों के समाचार पहले भी समय-समय पर आते रहे हैं. दुनिया का शायद ही ऐसा कोई देश होगा, जहां पर कैथोलिक धर्म के ठेकेदारों ने अधर्म न किया हो. उनके खिलाफ लोगों के विरोध प्रदर्शन भी हुए हैं. केस-मुकदमे भी चले हैं. पर, देखने में यही आता है कि ईसामसीह के नाम की माला जपने वाले, हर ईसाई को पाप-मुक्ति के साथ स्वर्गारोहण का आश्वासन देने वाले इस विश्वव्यापी धर्मराज्य के प्रतिनिधि भी, रोज़मर्रा की ठेठ मानवीय कमज़ोरियों से ऊपर नहीं उठ पाते.

जब पोप फ्रांसिस भी धर्मसंकट में पड़े

कैथलिकों के वर्तमान सर्वोच्च धर्माधिकारी पोप फ्रांसिस अपनी सादगी, ईमानदारी और खुलेपन के लिए प्रसिद्ध हैं. लेकिन इस वर्ष जनवरी में जब वे अपने देश अर्जेन्टीना के पड़ोसी चिली गये थे, तब वहां उन्हें ज़ोरदार विरोध-प्रदर्शनों का सामना करना पड़ा. वहां 80 पादरियों और अन्य धर्मपुरुषों पर बच्चों के यौनशोषण का आरोप लगाया गया था. मांग की जा रही थी कि पोप उन्हें संरक्षण देने वालों को हटायें. जबकि पोप उन सब को क्षमा कर देने के लिए कह रहे थे.

चिली के लोग ख़ुआन बार्रोस नाम के जिस बिशप की सबसे अधिक निंदा कर रहे थे, पोप ने उनका बचाव करते हुए कहा कि उनके विरुद्ध आरोपों का कोई प्रमाण नहीं है. उन्हें जानबूझ कर बदनाम किया जा रहा है. पोप ने यह भी कहा कि उन्हें तो चिली में यौनदुराचार से किसी के पीड़ित होने की कोई ख़बर तक नहीं मिली है.

पोप ने अपनी लाज बचायी

चिली-यात्रा के समय पोप की अब तक की सारी प्रतिष्ठा दांव पर लग गयी थी. वेटिकन लौटने के बाद उन्होंने अपना विचार बदला. तीन पीड़ितों को वेटिकन बुलाया. उन्हें ‘संता मारिया’ नाम के उसी अतिथिगृह में ठहराया, जिसमें वे स्वयं भी रहते हैं, जबकि उनके साथ आये बिशपों को रोम के एक मामूली गेस्टहाउस में भिजवा दिया. तीनों पीड़ितों की आपबीती सुनने के बाद पोप ने उनसे क्षमा मांगी और आपने आप को भी ‘समस्या का एक हिस्सा बताया’.

इस सारे घटनाक्रम का परिणाम यह हुआ कि मई में चिली के 34 बिशपों ने पोप को अपने त्यागपत्र दे दिये. उन्होंने तीन के त्यागपत्र तो स्वीकार कर लिये, जबकि बाक़ी से कहा कि ‘लोगों को बदल देने भर से समस्याएं हल नहीं हो जातीं.’

आयरलैंड में भी खरी-खोटी सुननी पड़ी

बीते अगस्त में पोप फ्रांसिस कैथलिकों के देश आयरलैंड गये थे. कैथोलिक पादरियों और धर्माधिकारियों के यौनदुचारों की कहानियों ने वहां भी उनका पीछा नहीं छोड़ा. वहां इन दुराचारों की जांच के लिए वहां की सरकार ने 2006 में एक महिला जज इवोन मर्फ़ी को नियुक्त किया था. 26 नवंबर 2009 को ‘मर्फ़ी जांच रिपोर्ट’ के नाम से उनकी रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी.

रिपोर्ट में चार आर्कबिशपों के नाम ले कर कहा गया था कि 1975 से 2004 के बीच उन्होंने कम से कम 440 दुराचारों को दबाने-छिपाने का प्रयास किया. एक पादरी ने 100 से अधिक बच्चों का यौनशोषण करने की बात मानी और एक दूसरे ने माना कि वह 25 वर्षों तक, हर दूसरे हफ्ते, किसी न किसी बच्चे को अपनी हवस का शिकार बनाता रहा. आयरलैंड में यह अपने ढंग की न पहली जांच थी और न अंतिम. वहां की सरकार को जांच इसलिए करवानी पड़ी कि बच्चों के यौनशोषण के आरोप बार-बार लग रहे थे, लेकिन कैथोलिक चर्च के उच्च पदाधिकारी अपना और चर्च का नाम बदनाम होने के डर से कोई क़दम नहीं उठा रहे थे.

प्रोटेस्टैंट चर्च भी बहुत पीछे नहीं

ऐसा भी नहीं है कि बच्चों के साथ यौनदुराचार के मामले ईसाई धर्म के केवल कैथोलिक संप्रदाय के चर्चों में ही देखने को मिल रहे हैं. प्रोटेस्टैंट चर्च का भी वही हाल है. अतर इतना ही है कि विश्व भर के कैथलिकों का एक सर्वोच्च धर्मधिकारी है, जिसे पोप कहते हैं. प्रोटेस्टैंट चर्च का कोई पोप नहीं होता. कर्मकांड इत्यादि के मामले में उसे कैथोलिक चर्च की अपेक्षा कम रुढ़िवादी और उदार माना जाता है.

यूरोप के देशों में इन दोनों सबसे बड़े ईसाई चर्चों द्वारा संचालित बोर्डिंग स्कूल, अनाथालय, बालसुधार गृह और बाल-अस्पताल बच्चों के यौन शोषण की सबसे सुरक्षित जगहें हैं. पुरुष ही नहीं, इन जगहों पर कर काम करने वाली महिलाएं भी बच्चों के य़ौन शोषण की दोषी हो सकती हैं. कम आयु के बच्चे या तो समझ नहीं पाते कि उनके साथ क्या हो रहा है, या मारे-पीटे जाने के डर से वे प्रायः किसी को बताते नहीं कि उनके साथ क्या हुआ. बतायें भी, तो इसकी क्या गारंटी कि उनकी शिकायत कोई सुनेगा, उस पर विश्वास करेगा और कोई कार्रवाई करेगा.

यौन शोषण विश्वव्यापी कैंसर के समान

यौन शोषण और बलात्कार हर देश, हर धर्म, हर संप्रदाय, हर समाज, हर संस्था और संस्थान में कैंसर की तरह फैल रही एक विश्वव्यापी बीमारी है. भारत से अधिक यह बीमारी यूरोप, दोनों अमेरिकी महाद्वीपों, अफ्रीका और एशिया के इस्लामी जगत में फैली हुई है. अपनी बदनामी के डर से सही आंकड़े कोई सरकार, कोई संस्था प्रकाशित नहीं करती. भारत में मीडिया इसे इस तरह उछालता है, मानो ऐसा केवल सरकार की कमज़ोरी या प्रशासन की लापरवाही से होता है. यदि यह सच होता, तो जर्मनी, जापान, स्वीडन या अमेरिका जैसे देशों में, जिनके बारे में हम मानते हैं कि वहां की सरकारें चुस्त और प्रशासन दुरुस्त हैं, यह बीमारी घटने की जगह बढ़ नहीं रही होती.

जब पाप-पुण्य और स्वर्ग-नरक का भेद बताने वाले, दिन-रात सदाचार और सच्चरित्रता का अपदेश देने वाले धर्मपुरुष भी दुराचार करने लगें; जब लोग मानने लगें कि ईश्वर उन्हें देख नहीं रहा है या गंगा में नहा लेने, हज कर लेने या चर्च में बैठ कर ईसामसीह से क्षमा मांग लेने पर करुणानिधान सब कुछ माफ़ कर देंगे, तो सरकारों की नैतिकता-अनैतिकता की गुहार भला कौन सुनेगा, जिन्हें हम ही बनाते हैं, जिनमें हमारे जैसे ही लोग होते हैं और जो हमारी ही तरह आते-जाते रहते हैं.

सरकारें चाहे जितनी भली और जागरूक हों, पुलिस और प्रशासन यौनदुचारों को रोक नहीं सकते. ऐसी घटनाएं हर क्षण, हर खुली या बंद जगह पर हो सकती हैं. हर घर, हर दफ्तर में हो सकती हैं. कोई कहां-कहां, कितनी-कितनी पुलिस तैनात करेगा? पुलिस वालों की नीयत भी तो बदल सकती है! कड़ी से कड़ी सज़ा भी कोई समाधान नहीं है. कामदेव का तीर चलते ही मति मारी जाती है. होश-हवास नहीं रहता. मृत्युदंड का भी डर नहीं लगता.