हाल ही में देश के चार विश्वविद्यालयों में छात्र संघ चुनाव संपन्न हुए हैं. इनमें राजस्थान विश्वविद्यालय (आरयू), पंजाब विश्वविद्यालय (पीयू), दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) शामिल हैं. आरयू में जहां एक बार फिर बाग़ी निर्दलियों ने जीत हासिल की, वहीं पीयू में पहली बार कोई छात्रा छात्र संघ की अध्यक्ष बनी. फिर डीयू में हुए चुनाव में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने सेंट्रल पैनल की चार में से तीन सीटों पर जीत हासिल की. उसके बाद बीते रविवार को जेएनयू छात्र संघ चुनावों के नतीजे आए जिनमें वामपंथी ख़ेमे ने एबीवीपी को बड़े अंतर से हरा दिया.

अगले आम चुनाव आने में अब कुछ ही महीनों का फ़ासला रह गया है. उससे पहले पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव भी होने हैं. ऐसे में इन छात्र संघ चुनावों को राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण माना जा रहा था. कई जानकारों के मुताबिक़ इन चुनावों के नतीजों से एक महत्वपूर्ण बात यह निकल कर आई कि युवा भाजपा के नेतृत्व वाली नरेंद्र मोदी सरकार से नाराज़ हैं. इस संदर्भ में राजस्थान (जहां भाजपा की ही सरकार है) और पंजाब विश्वविद्यालय में विरोधी पक्षों की जीत ज़्यादा अहम है क्योंकि यहां भाजपा समर्थित एबीवीपी ख़ासी मज़बूत है. जेएनयू का चुनाव जीतने में भी उसने कोई कसर नहीं छोड़ी, फिर भी उसे सभी सीटों पर हार का सामना करना पड़ा. चार विश्वविद्यालयों में से उसे केवल डीयू के चुनाव में जीत हासिल हुई और वह भी अलग-अलग कारणों के चलते विवाद का विषय बन गई है.

इनमें से एक वजह है चुनाव प्रक्रिया में ईवीएम मशीनों का इस्तेमाल. जेएनयू के नतीजे आने के बाद से सोशल मीडिया पर चर्चा है कि अगर डीयू के चुनाव भी ईवीएम के बजाय बैलेट पेपर से कराए जाते तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के छात्र संगठन को वहां भी जीत नसीब नहीं होती. रविवार के नतीजे घोषित होने के बाद बड़ी संख्या में लोग #किकईवीएम हैशटैग के साथ ट्वीट कर रहे थे.

डीयू को छोड़कर बाक़ी तीनों विश्वविद्यालयों में बैलेट पेपर से मतदान हुआ था. ईवीएम और बैलेट पेपर के समर्थकों के लिहाज़ से देखें तो जीत का अनुपात 3 : 1 का बनता है. ईवीएम पर सवाल उठाने के लिए बैलेट पेपर के समर्थकों को यही काफ़ी था. उस पर डीयू चुनाव के नतीजों की घोषणा वाले दिन जिस तरह का घटनाक्रम देखने को मिला, उसने उन्हें चुनाव प्रक्रिया और ईवीएम की आलोचना करने का एक और मौक़ा दे दिया.

गड़बड़ाई ईवीएम

ख़बरों के मुताबिक़ मतों की गिनती के दौरान छह ईवीएम मशीनों में गड़बड़ी पाई गई थी. बताया गया कि संयुक्त सचिव के पद के लिए जिन मशीनों में वोट डाले गए थे, उनमें से एक मशीन के दसवें नंबर के बटन पर 40 वोट दर्ज थे, जबकि मशीन में कुल नौ बटन ही होने चाहिए थे. इनमें नोटा का विकल्प भी शामिल है. यह दसवां बटन कहां से आ गया और किसने उसमें वोट डाले इसी को लेकर विवाद खड़ा हो गया. कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई ने इस पर काफ़ी हंगामा किया था और तब तनाव बढ़ता देख वोटों की गिनती रोकनी पड़ गई.

एनएसयूआई इसलिए भी ज़्यादा विरोध कर रहा था क्योंकि अध्यक्ष पद के लिए डाले गए वोटों की गिनती की शुरुआत में वह आगे चल रहा था. वह सेंट्रल पैनल के पदों में से दो पर बढ़त के साथ अपनी जीत की उम्मीद लगा रहा था. हालांकि बाद में अध्यक्ष पद समेत चार में से तीन सीटें एबीवीपी के पाले में चली गईं. नतीजों के बाद एनएसयूआई ने पूरा चुनाव फिर से कराने की मांग की. इस बीच चुनाव आयोग ने एक बयान जारी कर कहा कि जिन ईवीएम मशीनों के ज़रिए वोटिंग हुई वे उसकी नहीं हैं. आयोग ने संभावना जताई कि हो सकता है ये मशीनें किसी निजी कंपनी से ली गई हों.

आयोग के इस बयान ने मामले को और तूल दे दिया. दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने इस बयान को शेयर करते हुए सवाल उठाया कि डीयू के चुनाव के लिए किसी प्राइवेट पार्टी से ईवीएम मशीनें कैसे ख़रीदी जा सकती हैं. हालांकि चुनाव देख रहीं एक अधिकारी पिंकी शर्मा ने बीबीसी को बताया कि ईवीएम मशीनें किसी प्राइवेट कंपनी से नहीं बल्कि सरकारी कंपनी ईसीआईएल से ली गई थीं जो चुनाव आयोग के लिए भी ईवीएम मशीनें तैयार करती है.

ज़ाहिर है कि एबीवीपी को छोड़कर चुनाव में भाग लेने वाले दूसरे छात्र संगठनों के लिए यह सफ़ाई काफ़ी नहीं रही होगी. इसलिए एनएसयूआई अपने आरोपों पर कायम रही. कांग्रेस पार्टी ने भी आरोप लगाया गया कि ईवीएम में गड़बड़ी करवाकर एबीवीपी को जिताया गया है. उसने दोबारा वोटिंग की मांग की और कहा कि इस बार बैलेट पेपर के ज़रिए मतदान कराया जाए. साथ ही यह भी कहा कि वोटिंग के दौरान कैमरों से निगरानी की जाए. कांग्रेस नेता अजय माकन ने सवाल करते हुए कहा कि ऐसा क्यों होता है कि जब भी ईवीएम ख़राब होती है तो उसका फ़ायदा भाजपा और एबीवीपी को मिल जाता है.

रविवार को हुए इस पूरे घटनाक्रम के बाद सोमवार को हाई कोर्ट ने डीयू को निर्देश दिए कि वह चुनाव में इस्तेमाल की गईं ईवीएम मशीनों को सुरक्षित रखे. इसके अलावा पेपर ट्रेल और अन्य दस्तावेज़ों को भी सुरक्षित रखा जाए. कोर्ट ने डीयू, उसके द्वारा नियुक्त चुनाव अधिकारी, मानव संसाधन विकास मंत्रालय, चुनाव आयोग और चुनाव में जीतने वाले एबीवीपी के तीनों उम्मीदवारों से भी जवाब मांगा है.

आरयू में भी ईवीएम से वोटिंग कराने की मांग थी

‘बैलेट पेपर या ईवीएम’, यह मुद्दा राजस्थान विश्वविद्यालय के छात्र संघ चुनाव के दौरान भी छाया रहा. यहां के प्रमुख विश्वविद्यालयों समेत सभी कॉलेजों के चुनाव बैलेट पेपर से होते रहे हैं. लेकिन पिछले साल एबीवीपी के छात्रों ने राजस्थान विश्वविद्यालय से मांग की थी कि अगला (2018) छात्रसंघ चुनाव ईवीएम के ज़रिए कराया जाए. वह इस बात पर ज़ोर दे रहा था कि ईवीएम के ज़रिए चुनाव जल्दी और पारदर्शी होगा. अपनी मांग पूरी करवाने के लिए एबीवीपी ने कई बार प्रदर्शन भी किए थे. हालांकि विश्वविद्यालय ने उसकी यह मांग पूरी करने से इनकार कर दिया था.

अब अगर ईवीएम से जुड़े विवाद को ध्यान में रखते हुए देखें तो ‘बैलेट पेपर’ वाले चुनावों में एबीवीपी के विरोधी पक्षों को जीत मिलने का यह सिलसिला राजस्थान विश्वविद्यालय से शुरू होता है. वहां बीते 31 अगस्त को मतदान हुआ था. उसके बाद 11 सितंबर को आए नतीजों में अनुसूचित जाति के निर्दलीय उम्मीदवार विनोद जाखड़ को अध्यक्ष पद पर जीत हासिल हुई. एक और निर्दलीय उम्मीदवार रेणु चौधरी उपाध्यक्ष पद पर विजयी रहीं. महासचिव का पद आदित्य प्रताप सिंह को मिला. वे भी निर्दलीय उम्मीदवार थे. एबीवीपी को केवल संयुक्त सचिव के पद से संतोष करना पड़ा.

इसके अलावा राज्य के सात प्रमुख विश्वविद्यालयों की बात करें तो एबीवीपी इनमें से तीन में विजयी रहा. लेकिन जयपुर विश्वविद्यालय और मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के चुनाव क्षेत्र में आने वाले सरकारी कॉलेज उसके हाथ से निकल गए. राजे ने भले ही चुनाव नतीजों को अपनी जीत बताया हो, लेकिन एबीवीपी के कार्यकर्ता जयपुर विश्वविद्यालय में मिली हार से ख़ासे निराश दिखे.

पीयू में भी बैलेट पेपर से मतदान हुआ था

राजस्थान के बाद पंजाब विश्वविद्यालय में भी बैलेट पेपर से मतदान हुए थे. वहां भी एबीवीपी को हार का सामना करना पड़ा. प्रचार अभियान के दौरान उस पर नियमों का उल्लंघन करने के आरोप लगे थे. रिपोर्टों के मुताबिक़ पंजाब विश्वविद्यालय के वीसी राज कुमार आरएसएस से जुड़े हैं. एबीवीपी आरएसएस का ही छात्र संगठन है. इस संबंध में चुनाव में अध्यक्ष पद पर जीत हासिल करने वाली कनुप्रिया की बात ग़ौर करने वाली है. इस सिलसिले में उनका कहना है कि प्रचार के दौरान एबीवीपी के लिए पक्षपात किया गया था.

क्विंट की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ नतीजों की घोषणा के बाद कनुप्रिया ने कहा था, ‘हमने दो-तीन उदाहरण देखे जहां पक्षपात किया गया. वीसी दफ़्तर में केवल पांच लोगों को मिलने की अनुमति है. (लेकिन) वहां एबीवीपी की पूरी की पूरी टीम बैठकर मीटिंग करती है. आचार संहिता लागू होने के बाद भी उनका प्रचार अभियान रात 10 बजे तक चलता है. यहां पक्षपात दिखता है. उम्मीद है वीसी आगे ऐसा नहीं करेंगे.’ हालांकि इस कथित पक्षपात के बावजूद कनुप्रिया न सिर्फ़ चुनाव जीतीं, बल्कि पीयू के इतिहास में छात्रसंघ की अध्यक्ष बनने वाली पहली छात्रा भी बनीं. छात्रसंघ चुनावों को लेकर आ रही प्रतिक्रियाओं के मुताबिक़ ऐसा इसलिए हो सका क्योंकि मतदान ईवीएम से नहीं बैलेट पेपर से हुआ था.

लेकिन आम चुनाव ईवीएम से ही होगा

लोक सभा चुनाव की चर्चा अब ज़ोर पकड़ने लगी है. भाजपा को छोड़कर लगभग सभी राजनीतिक दल चुनाव आयोग से बैलेट पेपर से मतदान कराने की मांग कर रहे हैं. ऐसे में एक के बाद एक चार विश्वविद्यालयों में हुए चुनावों में से तीन में एबीवीपी के हारने और इसके लिए बैलेट पेपर की भूमिका को महत्वपूर्ण बताए जाने से यह मांग मज़बूत हुई है. हालांकि चुनाव आयोग ने एक बार फिर साफ़ किया है कि चुनाव ईवीएम मशीनों के ज़रिए ही संपन्न होंगे. वहीं, डीयू चुनाव के नतीज़ों को लेकर हुई किरकिरी को ध्यान में रखते हुए उसने ईवीएम बनाने वाली कंपनियों को चिट्ठी लिखकर सख़्त हिदायतें दी हैं.