‘खुमार, आपका तखल्लुस गलत है. सुरूर होना चाहिए था.’

एक मुशायरे के दौरान ख़ुमार बाराबंकवी को कलाम पढ़ने का न्योता दिए जाने से पहले यह बात कही गई थी. इसके पीछे की दलील यह थी कि ख़ुमार के उतरने की सूरत होती है जबकि सुरूर के चढ़ने की. वाकई ख़ुमार का सुरूर ऐसा था कि उतरने का नाम ही नहीं लेता. एक बार कलाम शुरू करने के बाद उन्हें लोगों के इसरार पर घंटों-घंटों शेर पढ़ने पड़ते. वे जिस भी महफ़िल में होते, वह महफ़िल लूट लेते.

ख़ुमार बाराबंकवी का असल नाम मोहम्मद हैदर ख़ान था. जैसा कि नाम से जाहिर है वे बाराबंकी से ताल्लुक रखते थे. घर में शेरो-सुखन का माहौल था. वालिद डॉक्टर ग़ुलाम मोहम्मद ‘बहर’ के तख़ल्लुस से शायरी करते. उनके चचा जान भी ख़ासे शायर थे. ज़ाहिर था कि शायरी का ख़ुमार इन पर भी चढ़ता. बस इसी ख़ुमार ने मोहम्मद हैदर को ख़ुमार बाराबंकवी बना दिया.

बात 1938 की है. आज़ादी हिंदुस्तान से हाथ भर दूर रह गयी थी. उन दिनों जोश मलीहाबादी, जिगर मुरादाबादी, अल्लामा इक़बाल और फैज़ अहमद फैज़ का जोर था. जोश और इक़बाल तो इंक़लाबी शायर थे और फैज़ प्रगतिशील शायरों की जमात में शामिल थे. ख़ुमार को जिगर का शेर पढ़ने का अंदाज़ पसंद आता था. इसी साल, यानी 19 बरस की उम्र से उन्होंने मुशायरों में शेर कहना शुरू कर दिया, या कहें जोश की तरह तरन्नुम में पढना शुरू कर दिया. इस अंदाज ने उन्हें जोश के नज़दीक ला खड़ा किया. दोनों मुशायरों की शान होते थे और दोनों का काफ़ी अरसे तक साथ रहा. ख़ुमार की आवाज़ और लफ़्ज़ों की सादगी ने उन्हें पूरे हिंदुस्तान में मशहूर कर दिया था.

कुछ हस्तियां ऐसी होती हैं जिनकी शोहरत उनसे कुछ कदम आगे चलती है. ख़ुमार बाराबंकवी या साहिर लुधयानवी ऐसे ही शायर थे. दोनों के फ़िल्म इंडस्ट्री पहुंचने से पहले उनकी शोहरत वहां अपनी बुलंदी के झंडे गाड़ चुकी थी. ख़ुमार का फ़िल्मों में आना एक अजीब इत्तेफ़ाक था. हुआ यूं कि सन 1945 में किसी मुशायरे के सिलसिले में उनका मुंबई जाना हुआ. वहां महफ़िल में मशहूर निर्देशक एआर कारदार और महान संगीतकार नौशाद साहब भी मौजूद थे.

उन दिनों कारदार और नौशाद साहब फ़िल्म ‘शाहजहां’ पर काम कर रहे थे. यूं तो उन्होंने मजरूह सुल्तानपुरी को फ़िल्म के गीत लिखने के लिए साइन कर लिया था, पर फ़िल्म की पटकथा के लिहाज़ से एक और गीतकार की ज़रूरत थी. दोनों ने जब ख़ुमार को सुना, तो उनसे प्रभावित हुए बिना रह न सके और ख़ुमार को फ़िल्म के लिए लिए गीत लिखने का न्यौता दे डाला.

यहां से ख़ुमार का फ़िल्मी सफ़र शुरू हो गया. ‘शाहजहां’ बड़ी हिट फ़िल्म साबित हुई. ‘चाह बर्बाद करेगी हमें मालूम न था. यूं तो यह गाना मजरूह के नाम पर लिखा जाता है, पर बताते हैं कि इसको लिखने वाले ख़ुमार बाराबंकवी थे. ख़ुमार ने नौशाद के संगीत पर ‘साज और आवाज़’(1966) और ‘लव एंड गॉड’(1986) के गीत भी लिखे.

ख़ुमार ने कई और संगीतकारों के साथ काम किया था. 1949 में आई फ़िल्म ‘रूपलेखा’ के संगीतकार सज्जाद हुसैन भी थे जो बड़े मुंहफट माने जाते थे. इस फ़िल्म का एक गाना ‘तुम हो जाओ हमारे, हम हो जायें तुम्हारे’ को महान मोहम्मद रफ़ी और सज्जाद हुसैन की पसंदीदा गायिका सुरिंदर कौर’ ने गाया था.

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ठीक इस तरह फ़िल्म ‘हलचल’(1951) के ख़ुमार के गीतों को लता मंगेशकर ने पहली बार आवाज़ दी थी. ख़ुमार की ज़िन्दगी में साल 1955 एक मुक़ाम रखता है. यतींद्र मिश्र को दिए इंटरव्यू में लता मंगेशकर बताती हैं कि इस साल आई फ़िल्म ‘बारादरी’ के गाने ‘भुला नहीं देना, ज़माना ख़राब है’ ने उन्हें शोहरत दिलाई. नाशाद के संगीत और ख़ुमार के गीतों का जादू लोगों के सिर चढ़कर बोला.

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इसी फ़िल्म का एक और गाना जो तलत महमूद ने गाया था बड़ा मुकम्मल हुआ था. उसके बोल थे ‘तस्वीर बनाता हूं तस्वीर नहीं बनती’

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नाशाद को आप नौशाद मत समझियेगा. दोनों अलग संगीतकार थे. यह बड़ा दिलचस्प किस्सा है. दरअसल, नाशाद का असली नाम शौक़त देहलवी था. 50 और 60 के दौर में नौशाद का संगीत फ़िल्मों की सफलता की गारंटी समझा जाता था. जब जे नक्शब ‘बारादरी’ बना रहे थे तो उन्होंने शौक़त को बतौर संगीतकार लिया. नक्शब ने नौशाद की लोकप्रियता भुनाने के लिए शौक़त को बिना बताए फ़िल्म की कास्टिंग में उनका नाम नाशाद दे दिया जो नौशाद से मिलता-जुलता था. जब शौक़त देहलवी को यह मालूम हुआ तो वे ख़ासे नाराज़ हुए. पर जब फ़िल्म और गाने हिट हो गए तो सब बातें भुला दी गईं. इसी दौर की कुछ और फिल्में जैसे ‘जवाब’ और ‘दरवाज़ा’ में ख़ुमार के ही गीत थे. पर बाद में उन्हें ‘शाहजहां’ और ‘बारादरी’ जैसी सफलता नहीं मिली.

ख़ुमार को फ़िल्मी गीत-संगीत की बंदिशें रास नहीं आई. फ़िल्मों में गीतों के गिरते स्तर ने भी उन्हें परेशान कर दिया था. सोचिये, फ़िल्मों के जानकार 50 से 60 के दौर को गीत-संगीत के हिसाब से सुनहरा दौर मानते थी. ख़ुमार को इसमें भी कमी नज़र आती थी. बात यह भी है कि फ़िल्मों में शायरी कहीं दब जाती है. संगीत और पिक्चराइजेशन, शायरी या गीत पर हावी हो जाते हैं. बड़े-बड़े शायरों के मशहूर कलाम संगीतबद्ध नहीं किये जा सके हैं. मिसाल के तौर पर ग़ालिब की कई ग़ज़लें अब तक गाई नहीं जा सकी हैं, साहिर लुधयानवी की ‘परछाइयां’ को अब तक कोई संगीत में ढाल नहीं पाया है. मुशायरों में जो खुलापन था वह ख़ुमार की फ़ितरत से मेल खाता था क्योंकि वहां सिर्फ शायर होता है, उसकी सुखनवरी और कोई नहीं. शायर की बात सीधे श्रोताओं तक जाती है. संभव है इस बात के चलते वे फ़िल्मों को अलविदा कहकर ताजिंदगी बाराबंकी में आकर बस गए हों. कुछ ऐसा ही शहरयार ने भी किया था.

ख़ुमार की ख़ालिस शायरी की बात करें तो वे यहां तरक्कीपसंद शायरों से अलग खड़े नज़र आते थे. वे साहिर या कैफ़ी आज़मी या फिर अली सरदार ज़ाफरी की तरह नहीं लिखते थे. यानी उनके शेर कड़े नहीं होते थे. न ही वे मज़ाज की तरह ग़म और इश्क़ में भी डूबे नहीं होते थे. ख़ुमार, जिगर मुरादाबादी या हसरत जयपुरी के जैसे नाज़ुक शेर लिखते थे. उनके अशआरों में कहने वाले का शर्मीलापन या भोलापन झलकता है और ग़ज़ल अपनी मासूमियत के साथ उभरती है. यही ख़ुमार बाराबंकवी की ख़ासियत थी.

मिसाल के तौर पर उनकी एक ग़ज़ल का शेर है, ‘न हारा है इश्क़ और न दुनिया थकी है, दिया जल रहा है हवा चल रही है’. मानों ख़ुमार कह रहे हैं कि, ‘दुनिया, मैं दीये की मानिंद जलता रहूंगा. माने, इश्क़ करता रहूंगा. मुझे बुझाने की तेरी कोशिशें अपनी जगह सही.’ यहां शायर किसी से लड़ नहीं रहा है, बस जो उसका फ़र्ज़ है, उसे पूरा कर रहा है. उनकी एक और ग़ज़ल के ये अशआर देखिये,

‘अकेले हैं वो और झुंझला रहे हैं,

मेरी याद से जंग फ़रमा रहे हैं.

इलाही मेरे दोस्त हों खैरियत से

ये क्यों घर में पत्थर नहीं आ रहे हैं’

अब बात ग़ज़लों की चल रही है तो उनकी एक और बड़ी मशहूर ग़ज़ल है,

‘वही फिर मुझे याद आने लगे हैं

जिन्हें भूलने में ज़माने लगे हैं

सुना है हमें वो भुलाने लगे हैं

तो क्या हम उन्हें याद आने लगे हैं

क़यामत यकीनन क़रीब आ गयी है

‘ख़ुमार’ अब तो मस्जिद जाने लगे हैं.’

अब किसी मुशायरे में कोई ऐसे शेर पढ़ेगा और वह भी तरन्नुम में पढ़ेगा तो मुशायरा लूटेगा ही और बाकी के शायर कलम तोड़कर, स्याही पीकर मर न जायें तो और क्या करें!