उत्तराखंड में यमुना नदी पर प्रस्तावित लखवाड़ बहुउद्देश्यीय परियोजना के कार्यान्वन को लेकर पिछले महीने उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और राजस्थान के बीच एक क़रार हुआ. केंद्रीय जल संसाधन मंत्री नितिन गडकरी की मौजूदगी में हुए इस समझौते में 3966 करोड़ रुपए की लागत वाली लखवाड़ परियोजना के ख़र्च का 90 प्रतिशत हिस्सा केंद्र और बाकी 10 फीसदी हिस्सा इन राज्यों द्वारा दिया जाना तय किया गया. समझौते में इन छह राज्यों को जरूरत के अनुसार जलआपूर्ति करने की बात भी कही गई.

बता दें कि लखवाड़ परियोजना को सबसे पहले 1976 में मंजूरी मिली थी. लेकिन 1992 के बाद से इसका काम अटक गया. फिर 2009 में ‘राष्ट्रीय परियोजना’ घोषित कर इसे बहाल किया गया था. इस परियोजना को लेकर विधानसभा चुनाव के मुहाने पर खड़े राजस्थान की वसुंधरा सरकार ने जोर-शोर से प्रचारित करवाया है कि यह पानी की किल्लत से जूझ रहे प्रदेश के शेखावाटी क्षेत्र के लिए वरदान सरीख़ी साबित होगी. इस क्षेत्र में झुंझनू, चुरू और सीकर जिले शामिल हैं. मुख्यमंत्री राजे के साथ इन जिलों से संबंध रखने वाले भाजपा के विधायक और सांसद भी अपने-अपने तरीके से लखवाड़ समझौते को जनता के सामने ऐतिहासिक उपलब्धि के तौर पर भुना रहे हैं.

लेकिन प्रदेश के सामाजिक संगठन प्रदेश सरकार और नेताओं के इन दावों से सहमत नहीं दिखते. उनकी मानें तो लखवाड़ परियोजना से जुड़े वसुंधरा राजे सरकार के आश्वासन महज़ चुनावी जुमले हैं. यमुना जल संघर्ष समिति के संयोजक और आरटीआई कार्यकर्ता यशवर्धन सिंह सरकार के इस वायदे को शेखावटी और प्रदेश के लोगों के साथ बड़ा छलावा घोषित करते हैं.

इस आरोप का आधार क्या है?

आरटीआई और अन्य सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक मई 1994 में हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और राजस्थान के बीच यमुना के पानी के इस्तेमाल को लेकर ‘ऊपरी यमुना नदी बोर्ड’ (यूवाईआरबी) के तहत एक समझौता हुआ. इसमें राजस्थान को यमुना का 1.119 बिलियन क्यूसेक मीटर/प्रति वर्ष पानी दिए जाने की बात कही गई. चूंकि राजस्थान के अलावा बाकी चार राज्य यमुना के बहाव क्षेत्र में आते हैं इसलिए हरियाणा के ताजेवाला और ओखला बैराज से राजस्थान के सीमावर्ती जिलों तक नहरों के ज़रिए पानी लाया जाना तय हुआ. लंबी प्रक्रिया के बाद राजस्थान के पूर्वी जिले भरतपुर को तो ओखला बैराज से यमुना का पानी जैसे-तैसे मिलना शुरु हो गया, लेकिन शेखावटी इलाके के जिन जिलों को ताजेवाला से पानी मिलना तय था उनकी प्यास जस की तस है.

दरअसल, हरियाणा ने तब राजस्थान के सामने अपने यहां बिल्कुल नई नहरें बनाने का प्रस्ताव रखा था. लेकिन रास्ते में वन समेत अन्य संरक्षित क्षेत्र होने की वजह से भूमि अधिग्रहण करने में खासी दुश्वारियां थीं. इसे देखते हुए तत्कालीन राजस्थान सरकार ने हरियाणा की 270 किलोमीटर लंबी नहरों का अपने ख़र्चे पर पुनरुद्धार करने और फिर दोनों राज्यों द्वारा उन्हें उपयोग में लेने का सुझाव दिया. लेकिन हरियाणा ने तकनीकी कारणों का हवाला देते हुए अपनी- पश्चिमी यमुना नहर, जवाहर लाल नेहरू कैनाल, दिल्ली ब्रांच और लुहारू फीडर के ज़रिए राजस्थान को पानी देने में असमर्थता ज़ाहिर कर दी. राजस्थान सरकार ने हरियाणा को मनाने की तमाम कोशिशें की लेकिन बात नहीं बनी. इसी खींचतान में करीब सात वर्ष गुज़र गए.

जून 2001 में हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला और राजस्थान की सिंचाई मंत्री कमला बेनीवाल के बीच एक बार फिर इस संबंध में बैठक हुई. इसमें राजस्थान ने हरियाणा के सामने नहरों की मरम्मत के साथ 50 किलोमीटर लंबी समानांतर झुंझनू फीडर के निर्माण की भी पेशकश रखी. इस बार हरियाणा सरकार ने इस प्रस्ताव के तकनीकी लिहाज़ से उपयुक्त पाए जाने की स्थिति में कोई आपत्ति न उठाने का आश्वासन दिया.

राजस्थान की सिंचाई मंत्री कमला बेनीवाल द्वारा हरियाणा के मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला को 14 फरवरी 2003 को भेजा गया पत्र
राजस्थान की सिंचाई मंत्री कमला बेनीवाल द्वारा हरियाणा के मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला को 14 फरवरी 2003 को भेजा गया पत्र

राजस्थान के प्रस्ताव की जांच का जिम्मा हरियाणा और राजस्थान के साथ केंद्रीय जल आयोग के अधिकारियों के एक संयुक्त दल को सौंपा गया जिसने अपने परीक्षण में तकनीकी रूप से इसे उपयुक्त पाया. जुलाई 2001 में इस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में साफ किया कि राजस्थान की सलाह पर अमल करने से हरियाणा की नहरों की उपयोगिता बढ़ेगी और यह उसके लिए भी खासा लाभदायक रहेगा. इसी तरह केंद्रीय जल आयोग की तकनीकी परामर्शदात्री समिति (टीएसी) ने भी फरवरी-2003 में नई दिल्ली में आयोजित अपनी बैठक में ताजेवाला और ओखला बैराज, दोनों परियोजनाओं से पानी ले जाने को तकनीकी लिहाज़ से स्वीकृति दे दी.

लेकिन हरियाणा ने नई काट के तौर पर ताजेवाला में राजस्थान को देने के लिए पर्याप्त पानी नहीं होने की बात कहते हुए मुद्दे को फिर से ठंडे पानी में डाल दिया. अप्रैल 2006 में हुई अपनी तीसरी बैठक से लेकर मार्च-2015 की छठवीं बैठक तक यूवाईआरबी ने दोनों राज्यों के विवाद को सुलझाने की कोशिश की. लेकिन नाकाम रहा. इस दौरान ताजेवाला में पानी की मात्रा जांचने के लिए गठित की गई एक विशेष कमेटी ने दस साल के आंकड़ों का अध्ययन कर कहा कि इस बांध में राजस्थान के लिए तय आपूर्ति से कई गुना ज्यादा पानी है. इस रिपोर्ट के आधार पर हरियाणा की दूसरी आपत्ति भी ख़ारिज कर दी गई. इसके बावजूद राजस्थान का शेखावाटी इलाका आज तक अपने हिस्से के पानी से वंचित है.

विवाद न सुलझने के पीछे राजस्थान की सरकारें कितनी जिम्मेदार?

अंतरराज्यीय नदी जल विवाद एक्ट-1956 के हवाले से यशवर्धन सिंह बताते हैं कि जब किसी राज्य सरकार की ओर से जल विवाद से संबंधित कोई शिकायत केंद्र सरकार को मिलती है तो केंद्र प्रभावित राज्यों से विवाद का हल निकालने के लिए बातचीत का आग्रह करता है. लेकिन इससे बात न बनने पर केंद्र सरकार को एक वर्ष के भीतर जल विवाद ट्रिब्यूनल का गठन करना होता है जो किसी भी विवाद पर तीन वर्ष में अपना फैसला देने के लिए बाध्य होता है (हालांकि ज़रूरत पड़ने पर इस अवधि को पहले दो और फिर एक वर्ष के लिए अधिकतम बढ़ाया जा सकता है).

सिंह आगे जोड़ते हैं, ‘इस एक्ट से जुड़ा संशोधन बिल 2017 में सदन में पेश किया गया है जिसके पास होने पर ऐसे विवादों को सुलझाने में पहले से कम समय लगेगा. लेकिन राजस्थान की सरकारों ने न तो कभी इस मुद्दे को विवाद माना और न ही केंद्र को इससे जुड़ी शिकायत दी.’ उनका आरोप है कि इस तरह राजस्थान ने केंद्र को यह विवाद सुलझाने या इसमें हस्तक्षेप करने का मौका ही नहीं दिया.

मौजूदा सरकार पर हमला बोलते हुए यशवर्धन सिंह कहते हैं, ‘ऊपरी यमुना नदी बोर्ड बनने के बाद यह पहला मौका था जब राजस्थान, हरियाणा और केंद्र तीनों जगह भाजपा की सरकार थी. यदि प्रदेश सरकार चाहती तो निश्चित तौर पर इस कार्यकाल में वह शेखावाटी की प्यास बुझा सकती थी. लेकिन इसमें उसने रुचि नहीं दिखाई.’

इस बात की पुष्टि के लिए यशवर्धन सिंह झुंझनू से भाजपा की ही सांसद संतोष अहलावत के एक बयान का हवाला देते हैं जो उन्होंने पिछले साल दिसंबर में राजस्थान उच्च न्यायालय में दिया था. सिंह द्वारा इस मामले में लगाई गई जनहित याचिका (नवबंर-2017) की सुनवाई के दौरान अहलावत ने अदालत में कहा था, ‘राज्य सरकार ने आज तक इस मामले में फाइल तो छोड़िए, केंद्र को एक पत्र तक नहीं लिखा है. मैंने भी संसद में कई बार मामला उठाया. लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई... मैं सुप्रीम कोर्ट जाऊंगी जनहित याचिका लगाने.’

अब क्या?

यशवर्धन सिंह की याचिका पर सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय ने राजस्थान सरकार को फटकार लगाई और 20 फरवरी 2018 तक इस विवाद को सुलझाने के लिए उसके द्वारा किए गए प्रयासों का विस्तृत जानकारी मांगी. इसे देखते हुए करीब तीन साल बाद पंद्रह फरवरी 2018 को केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्री नितिन गडकरी की अध्यक्षता में यूवाईआरबी की सातवीं बैठक हुई. इस बैठक की ‘मिनिट्स ऑफ मीटिंग’ के हवाले से सिंह का कहना है कि एक बार फिर राजस्थान के हिस्से सिर्फ आश्वासन ही आया.

यशवर्धन सिंह कहते हैं, ‘इस तरह की बैठकों से हरियाणा के सिंचाई मंत्री अक्सर अनुपस्थित ही रहते हैं... हरियाणा की सरकारों का रवैया दिखाता है कि हजारों क्यूसेक पानी बरबाद होकर दिल्ली में बाढ़ का कारण क्यों न बन जाए. लेकिन किसी सूरत में राजस्थान को नहीं मिलना चाहिए. ऐसे में राजस्थान सरकार किस आधार पर शेखावाटी को जल्द पानी मिलने का दावा कर रही है?’

यूवाइआरबी की सातवीं मीटिंग में भी हरियाणा सरकार के किसी भी मंत्री ने भाग नहीं लिया|आभार-यशवर्धन सिंह
यूवाइआरबी की सातवीं मीटिंग में भी हरियाणा सरकार के किसी भी मंत्री ने भाग नहीं लिया|आभार-यशवर्धन सिंह

सिंह के मुताबिक यूवाईआरबी की सातवीं बैठक में दबाव बनाकर राजस्थान सरकार से लखवाड़ परियोजना के लिए सहमति हासिल की गई. वे कहते हैं, ‘इस तरह राजस्थान ने ताजेवाला से पानी के लिए मोल-भाव का आख़िरी विकल्प भी खो दिया.’ दरअसल, राजस्थान लंबे समय से लखवाड़ परियोजना को मंजूरी न देकर ताजेवाला से पानी लेने के लिए हरियाणा पर दवाब बना रहा था. लेकिन अपनी इस कवायद में वह सफल नहीं हो पाया.

चिंता ज़ाहिर करते हुए यशवर्धन सिंह कहते हैं कि लखवाड़ समेत दो अन्य बांधों (रेणुका और किशाउ) के बन जाने के बाद ताजेवाला हेड को मिल रहे पानी के कमी होने की आशंका है जिसका दुष्परिणाम निश्चित तौर पर शेखावटी को भुगतना पड़ेगा. उनके शब्दों में ‘चुनावों के मद्देनज़र सरकार अपनी विफलता को उपलब्धि की शक़्ल देने की कोशिश कर रही है. जबकि लखवाड़ परियोजना का राजस्थान के शेखावाटी से कोई लेना-देना नहीं है.’ लखवाड़ को लेकर राजे सरकार की तरफ से किए जा रहे प्रचार को सिंह चुनावी स्टंट करार देते हैं. स्थानीय विधायकों और सांसद पर इस मुद्दे से जुड़ी भ्रामक ख़बरें फैलाने का आरोप लगाते हुए सिंह उन्हें सार्वजनिक बहस के लिए आमंत्रित करते हैं. इस चुनौती के प्रत्युत्तर में सांसद संतोष अहलावत ने मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे द्वारा खुले मंच से जवाब देने का दावा किया था.

लेकिन 23 सितंबर को अपनी झुंझनू यात्रा के दौरान मुख्यमंत्री राजे ने इस मामले में सिर्फ यही कहा कि बीस हजार करोड़ रुपए खर्च कर के पाइपलाइनों के ज़रिए हरियाणा से पानी लाया जाएगा. इसकी काट के तौर पर यशवर्धन सिंह दलील देते हैं कि हरियाणा ने अभी तक राजस्थान को अपने यहां पाइपलाइन बिछाने के लिए भी स्वीकृति नहीं दी है. साथ ही सिंह सरकार के उस दावे को गलत घोषित करते हैं जिसके मुताबिक पाइप लाइन बिछाने के लिए हवाई सर्वे किया जा रहा है. उनका कहना है कि ये सारे सर्वे पहले ही किए जा चुके हैं, सरकार चुनावों तक जनता को फुसलाने के लिए बहाने बना रही है. फिलहाल यशवर्धन सिंह ने गांव-गांव जाकर इस बारे में लोगों को जागरुक करने की मुहीम छेड़ दी है. वे कहते हैं, ‘हमारी सरकार से मांग है कि वह जल्द से जल्द हरियाणा पर ताजेवाला हैड से पानी छोड़ने के लिए दवाब बनाए... हमें डर है कि यदि इन विधानसभा चुनाव में प्रदेश की परंपरा के अनुसार मौजूदा सरकार का तख़्तापलट हो गया तो किसी दूसरी पार्टी की सरकार के आ जाने से यह मुद्दा लंबे समय के लिए फिर से फाइलों में दफन हो जाएगा.’