साहित्य के पास तमाम तरह के कार्यभार होते हैं. यह भी कह सकते हैं कि साहित्य जिंदगी का आंखों देखा हाल है जो उसकी ऊब और बेचैनी को दर्ज करने की कोशिश करता है. इस अर्थ में देखने पर विष्णु खरे का रचनात्मक व्यक्तित्व एक ऐसी कॉमेंट्री की तरह लगता है जिसमें असर पैदा करने के लिए कॉमेंटेटर किसी खास तरह के प्रभाव का इस्तेमाल नहीं करता. मसलन, अावाज को ऊंचा-नीचा करके या उसकी गति के जरिये एक रोमांच बनाने की कोशिश जैसा कि आंखों देखा हाल सुनाने वाले करते रहते हैं.

साहित्य में भी ऐसा होता है, किया जाता है. लेकिन विष्णु खरे शायद कहने के इस शिल्प में यकीन नहीं करते थे. वे जीवन के कारोबार को बहुत गहराई से निहारते थे. विवरण और अनुभूतियां इस कदर गहरीं जैसे वे इस खेल में शामिल भी हों और दर्शक भी. उनकी कविताओं में जो जिंदगी है, वह कोई इकहरा भाव लेकर ही हमसे नहीं बतियाती. बतौर कवि उन्होंने इसे इतनी बारीकी से निहारा होता है कि पाठकों तक भी अनुभवों की कई परतें चली आती हैं.

विष्णु खरे अब हमारे बीच नहीं हैं. करीब एक हफ्ते पहले हुए उन्हें ब्रेन स्ट्रोक के बाद उन्हें दिल्ली के जीबी पंत अस्तपाल में भर्ती कराया गया था जहां बुधवार को उन्होंने अंतिम सांस ली. हिंदी समाज उन्हें एक खरी-खरी कहने वाले के तौर पर याद कर रहा है (हालांकि उनके जीवित रहते बहुतों को उनकी यह बात अखरती रही). चाहे-अनचाहे वे हिंदी के तमाम विवादों से जुड़े या जोड़े गए. लेकिन यह तो सही ही है कि अपने वक्तव्यों से वे जब-तब अपनी मनभावन सहजता में मस्त हिंदी जगत को असहज करते रहे. उनमें एक खास किस्म का अभय भाव रहा जो उनके व्यक्तित्व को बुनता रहा.

जो विष्णु खरे को जानते हैं उनके पास उनके इस व्यक्तित्व को जानने-समझने की बहुत सारी वजहें हो सकती हैं. इसका एक सिरा उनकी रचनाओं में पकड़ा जा सकता है. बतौर साहित्यकार अाप जीवन को कहां से बैठकर और कितना देख रहे हैं, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण होता है कि आप उसे दर्ज कैसे कर रहे हैं. विष्णु खरे की कविताओं से गुजरते हुए कभी-कभी ऐसा लग सकता है कि अरे, इस बात को ऐसे भी बूझा जा सकता है. लेकिन यह अवलोकन चमत्कृत करने से ज्यादा आपको एहसास की उस दुनिया में ले जाता है जो कभी मुकम्मल नहीं होती.

एक कवि के आंखों देखे हाल में कभी-कभी एक समस्या होती है. वहां स्मृतियों और भावों की जमीन इतनी नम होती है कि आप एक खास किस्म के अात्ममोह के शिकार हो जाते हैं. विष्णु खरे के यहां ऐसा नहीं होता तो इसलिए कि वे जीवन को बड़ी बारीकी से निहारते हुए चलते हैं, सिर्फ उसे टुकुर-टुकुर देखते भर नहीं रहते. टुकुर-टुकुर देखते भर न रहना और देखकर हस्तक्षेप करना विष्णु खरे की एक रचनात्मक आदत थी. अपने लेखन में निहार कर कैसे बोला जाता है यह उन्होंने दिखाया. लेकिन एक सक्रिय साहित्यकार के तौर पर समय-असमय अपने वक्तव्यों से उन्होंने साबित किया कि वे हस्तक्षेप में यकीन रखते हैं.

समय और समाज के बदलाव को विष्णु खरे बड़ी बारीकी से पकड़ते थे. जिंदगी को इतना गौर से ताकने की आदत उनमें कैसे पड़ी, इसका कुछ-कुछ अंदाजा तब लगता था जब वे छिंदवाड़ा या खंडवा के किस्से सुनाते थे. विष्णु खरे अक्सर फिल्मों से अपने लगाव को याद करते हुए बताते थे कि छिंदवाड़ा में सिनेमाहाल उनके घर के इतने करीब था कि वे रात का शो पूरा सुन डालते थे. कलाओं के साथ अंतर्संबंध की ऐसी शुरुआत ने उनकी निगाह को शायद और अधिक सतर्क कर दिया.

इस सतर्कता के साथ विष्णु खरे में एक खास किस्म की जिजीविषा और साहस भी था. महज 20 साल की उम्र में टीएस इलियट की कविताओं का अनुवाद कर उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को उसकी भूमिका लिखने के लिए पत्र लिख दिया था. नेहरू तो मानसून सत्र की व्यस्तता के चलते उसकी भूमिका नहीं लिख पाए, लेकिन उन्होंने वह पत्र रामधारी सिंह दिनकर को दे दिया और दिनकर ने उस अनुवाद की समीक्षा लिखी.

बाद में अपने समकाल को महसूस करने में पत्रकारिता भी उनकी सहायक रही. विष्णु खरे के भीतर के कवि ने उनकी पत्रकारिता को भाषा बख्शी तो उनकी पत्रकारिता ने उनके कवि की अपने समय को महसूस करने में सहाय़ता की. तमाम जटिलताओं के बाद भी वे एक खास किस्म की प्रतिबद्धता से लैस थे. यह प्रतिबद्धता किसी नारे-मुहावरे से नहीं बल्कि खुद से जुड़ी थी. उनकी कविताओं और अालोचना के लेखों में उनकी बहुत साफ राजनीतिक समझ झलकती थी. वे उसकी गति और उसके विरोधाभासों को बहुत निरपेक्षता के साथ समझते थे. विष्णु खरे जीवन को कविता की तरह देखते थे और कविता को कहानी की तरह कहते थे. उनकी ‘एक कम’ कविता इस बात को ज्यादा बेहतर समझाती है:

1947 के बाद से

इतने लोगों को इतने तरीक़ों से

आत्मनिर्भर मालामाल और गतिशील होते देखा है

कि अब जब आगे कोई हाथ फैलाता है

पच्चीस पैसे एक चाय या दो रोटी के लिए

तो जान लेता हूं

मेरे सामने एक ईमानदार आदमी औरत या बच्चा खड़ा है

मानता हुआ कि हां मैं लाचार हूं कंगाल या कोढ़ी

या मैं भला चंगा हूं और कामचोर और एक मामूली धोखेबाज़

लेकिन पूरी तरह तुम्हारे संकोच, लज्जा,प रेशानी या ग़ुस्से पर आश्रित

तुम्हारे सामने बिल्कुल नंगा निर्लज्ज और निराकांक्षी

मैंने अपने को हटा लिया है हर होड़ से, मैं तुम्हारा विरोधी प्रतिद्वंद्वी या हिस्सेदार नहीं

मुझे कुछ देकर या न देकर भी तुम कम से कम एक आदमी से तो निश्चिन्त रह सकते हो।