लेखक-निर्देशक : नंदिता दास

कलाकार : नवाजुद्दीन सिद्दीकी, रसिका दुग्गल, ताहिर राज भसीन, जावेद अख्तर, चंदन रॉय सान्याल, ऋषि कपूर, इनामुलहक, रणवीर शौरी, राजश्री देशपांडे, इला अरुण, दिव्या दत्ता, परेश रावल, तिलोत्तमा शोम, शशांक अरोड़ा, गुरदास मान, पूरब कोहली, स्वानंद किरकिरे, विनोद नागपाल, साहिल वैद्य, अतुल कुमार

रेटिंग : 3.5/5

कुछ फिल्में होती हैं जो चम्मचों में अपनी कहानी भर आपके मुंह में निवाले डालती हैं. अपने मुख्य कैरेक्टर, उसकी दुनिया, उसकी कहानी की स्पून-फीडिंग करती हैं. ‘मंटो’ वह फिल्म नहीं है. नंदिता दास की ‘मंटो’ को देखने के लिए आपको मंटो को गहरे जानना बेहद जरूरी है और यह कमी नहीं है फिल्म की. अगर आप सआदत हसन मंटो जैसे अफसानानिगार के अफसानों और उनके जीवन को तफ्सील से नहीं जानते तो गलती आपकी है.

इसलिए जाइए, पहले मंटो को खूब पढ़िए और फिर ‘मंटो’ देखिए. न सिर्फ असीम आनंद आएगा बल्कि उर्दू के इस महान अफसानानिगार की जिंदगी के केवल चंद सालों के संघर्षों को फिल्म में देखकर आप इतने खाली हो जाएंगे कि हफ्तों मंटो से भरे रहेंगे.

‘मंटो’ फिल्म की कहानी मुख्यत: 1946 से लेकर 1950 के बीच घटती है. इस दौरान आजादी तक मंटो बंबई में रहे थे और बंटवारे के बाद लाहौर में. इसलिए फिल्म को बेहतर समझने के लिए इस दौरान रचे गए उनके अफसाने खास तौर पर पढ़ें. ‘सहाय’, ‘टोबा टेक सिंह’, ‘खोल दो’ और ‘ठंडा गोश्त’ जैसी उनकी कालजयी कहानियों को नंदिता दास ने बेहद खूबसूरती से फिल्म के नेरेटिव में पिरोया है. साथ ही अगर बंबई की याद में लाहौर में बैठकर लिखे ‘फ्रीलांस’ लेखों का संग्रह ‘स्टार्स फ्रॉम एनअदर स्काय’ पढ़ लें तो ‘मंटो’ फिल्म का एक फ्रेम भी आपके लिए अजनबी नहीं रहेगा. आप मंटो की दोस्तियों को पहले से जानते होंगे, बंबई के लिए उनकी मोहब्बत को हर लेख में महसूस करेंगे और उनकी कई आपबीतियों के सहारे उनके सबसे कठिन वक्त के दौरान की मन:स्थिति को थोड़ा-बहुत समझ पाएंगे.

बाकी, पूरा समझने में नंदिता दास आपकी मदद करेंगी. क्योंकि यह फिल्म अपने नायक की जीवन-गाथा होने के अलावा उसकी कैरेक्टर स्टडी भी है. बंबई की मायानगरी और प्रोग्रेसिव लेखकों के बीच बिताए गए मंटो के खुशहाल दिनों से शुरू होकर फिल्म हिंदू-मुसलमान दंगों की आग में झुलसे निजी रिश्तों से होते हुए उस नए मुल्क में पहुंचती है जहां मंटो के साथ उनकी मशहूरियत तो आती है, लेकिन खुशहाली नदारद है. मंटो को न सिर्फ पाकिस्तान की फिल्म इंडस्ट्री में काम नहीं मिल रहा होता, बल्कि उनके अफसाने ‘ठंडा गोश्त’ पर मुकदमा भी चलता है और उनके लिए फ्रीलांस करते हुए घर चलाना लगातार मुश्किल होता जाता है. ऊपर से शराबनोशी उन्हें जहनी और शारीरिक दोनों तौर पर तोड़ती चलती है और बंबई, हिंदुस्तान की यादों में लाहौर, पाकिस्तान में बैठकर डूबा एक अफसानानिगार अपने जीवन का सबसे महान अफसाना लिखता है – ‘टोबा टेक सिंह’. हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बीच पड़ने वाले ‘नो मैन्स लैंड’ में गिर पड़ने वाला सरदार मंटो ही तो है!

फिल्म अपनी शुरुआत कई किरदारों को दिखाकर करती है. किसी को स्थापित नहीं करती और आपको एकदम से उनकी दुनिया के बीचोंबीच खड़ा कर देती है. इसलिए कुछ वक्त लगता है मंटो, सफिया, इस्मत चुगताई, श्याम और अशोक कुमार की दुनिया का हिस्सा बनने में. फिल्म का पहला हिस्सा मंटो के जीवन की सिलसिलेवार घटनाओं का जिक्र करता है इसलिए उसमें नेरेटिव फ्लो का अभाव भी नजर आता है. लेकिन यह वह धीमा बिल्ड-अप है जो कि संयम रखने का मीठा रसदार फल इंटरवल के बाद वाले हिस्से में देता है. इस हिस्से में मंटो की पीड़ा सेंटर-स्टेज अख्तियार करती है और स्क्रीन से क्षण भर के लिए भी नजर हटाना नामुमकिन हो जाता है. एक जलसे में मंटो अपनी तीन कहानियां सुनाते चलते हैं और आक्रोश में सने इस सीक्वेंस से यह फिल्म ऐसी रफ्तार पकड़ती है कि खत्म होने के बाद ही खुद दम लेती है और हमें भी लेने देती है.

‘मंटो’ का आर्ट डायरेक्शन (रीता घोष) अत्यंत ही उम्दा है और ऐसा कोई सीन नजर नहीं आता जो अपने दौर को बयां नहीं करता हो. कार्तिक विजय की सिनेमेटोग्राफी इस कदर उत्कृष्ट कि अंधेरे में पीली रोशनी का जो रंग चढ़ाया जाता है वो कई दृश्यों को यादगार बना देता है. खासकर लाहौर वाले हिस्से मंटो की मन:स्थिति को अंधेरे और हल्की पीली रोशनी की छिपन-छिपाई से बखूबी बयां करते हैं.

अगर आपने मंटो की केवल कहानियों को नहीं पढ़ा है और उनका नॉन-फिक्शन भी पढ़ा है तो आपको आसानी से पता चलेगा कि इतिहास से छेड़छाड़ करने वाले इस दौर में नंदिता दास ने कितनी ऐहतियात से मंटो की जिंदगी से जुड़ी घटनाओं को ज्यों का त्यों रखने का जतन किया है. फिल्म में मंटो की कही ज्यादातर बातों को संवादों की तरह उपयोग किया गया है और उनकी लिखी आपबीतियों में से महीन-महीन इमोशन निकालकर परदे पर रचे गए हैं.

मंटो ने ‘ठंडा गोश्त’ पर पाकिस्तान में दायर हुए मुकदमे के दौरान की जिरहों और दलीलों को ‘जहमत-ए-महर-ए-दरखशां’ नामक लेख में बेहद तफ्सील से बयां किया था. फिल्म ‘मंटो’ में इस मुकदमे का लंबा चित्रण सच्चाई के करीब देखकर अच्छा लगता है. दर्शकों को इमोशनली मैन्युपुलेट करने के लिए नंदिता दास कोई सिनेमैटिक अय्यारी नहीं दिखातीं – न यहां, न फिल्म में कहीं और – यह देखकर और भी ज्यादा अच्छा लगता है.

फिल्म की जो सबसे बड़ी कमी है वह न निर्देशन है, न कहानी, न पटकथा, न अभिनय. ये सभी ‘मंटो’ में उत्कृष्ट स्तर के हैं. सबसे बड़ी कमी है नंदिता दास द्वारा मंटो के जीवन का अपनी पसंद का सीमित कालखंड परदे पर रचना. उन्होंने फिल्म जिस तरह अचानक शुरू की – बिना किरदारों को स्थापित किए – वह भी उतना नहीं अखरता जितना कि फिल्म का उनकी मर्जी की जगह पर खत्म हो जाना अखरता है.

जहां ‘मंटो’ खत्म होती है वहां से लेकर मंटो के स्वर्गवासी होने तक (1955), मंटो के जीवन में इतनी अधिक उथल-पुथल मची हुई थी कि उसे सिनेमा का परदा न देना एक तरह से कुफ्र मालूम होता है. मंटो का शराबनोशी में इस कदर डूब जाना कि शराब की एक बूंद का उनके लिए जहर बन जाना, पत्नी सफिया द्वारा उन्हें दोबारा पागलखाने भेजने को मजबूर होना, उनकी मानसिक स्थिति का लगातार बिगड़ते जाना और आखिर में एक महान अफसानानिगार का तिल-तिलकर मर जाना पता नहीं क्यूं नंदिता दास ने ‘मंटो’ में दिखाने से परहेज किया.

उनके इस फैसले से हुआ यह कि फिल्म का इम्पेक्ट काफी कम हुआ.

मसाला फिल्मों में मसालेदार एक्टिंग करने वाले ताहिर राज भसीन को एक्टर श्याम की भूमिका में ठहराव लाते देखकर अच्छा लगता है. दिव्या दत्ता और रणवीर शौरी से लेकर ऋषि कपूर और जावेद अख्तर तक अनेक कलाकार केवल एक-दो सीन के लिए ही फिल्म में मौजूद रहते हैं, लेकिन उनकी मौजूदगी गिमिक्री नहीं लगती. राजश्री देशपांडे इस्मत चुगताई के रोल में खूब जंचती हैं और एक दिन इस्मत आपा पर भी ‘मंटो’ जैसी ईमानदार फिल्म देखने की इच्छा उन्हें देखकर बार-बार बलवती होती है. मंटो की पत्नी सफिया के रोल में रसिका दुग्गल किरदार को हद मानवीय बनाती हैं वरना ऐसे क्लीशे किरदार – जो अपने पति की सेवा में बिछे-बिछे रहते हैं – कोफ्त पैदा करते हैं. उनकी स्क्रीन प्रेजेंस कभी-कभी हमें नवाज से नजर हटाने तक पर मजबूर कर देती है.

सआदत हसन मंटो के रोल में नवाज अपने करियर का एक और सर्वश्रेष्ठ अभिनय करते हैं. वे खुद को मंटो नहीं बनाते, बल्कि मंटो को खुद बनाते हैं. मेकअप और प्रोस्थेटिक की मदद से हूबहू शरीर तैयार करने वाले अभिनेता बहुत मिलते रहे हैं लेकिन सबसे उम्दा कलाकार वह होता है जो रियल-लाइफ शख्सियत की तरह न दिखने के बावजूद यह यकीन दिला दे कि वही मंटो है (डैनी बॉयल की ‘स्टीव जॉब्स’ याद है न!). नवाज ने किरदार को आत्मसात करने के लिए मंटो की रूह पकड़ी है, और ऊपर शरीर अपना सिला है.

उनकी आत्मकथा ‘एन ऑर्डिनरी लाइफ’ पढ़कर आप समझ भी सकते हैं कि मंटो की तरह वे भी बेतकल्लुफ होकर सच बोलने की चाह रखने वाले शख्स हैं. और जब ऐसे शख्स को मंटो प्ले करने का मौका मिलेगा तो आपके लिए शर्तिया फर्क करना मुश्किल होगा कि मंटो कौन और नवाज कौन!

दुनिया के सारे काम छोड़िए और ‘मंटो’ देखिए. इस बंटाधार समय में वे बहुत जरूरी हैं.