2019 के लोकसभा चुनाव की तैयारियों में लगे देश के तमाम सियासी दल अपनी-अपनी रणनीति बनाने में जुटे हैं. इस बीच खबर है कि हाल ही में जेडीयू में शामिल हुए चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर (पीके) को नीतीश कुमार लोकसभा के चुनावी मैदान में उतार सकते हैं. प्रशांत किशोर ने बीती 16 सितंबर को ही जेडीयू की सदस्यता ग्रहण की थी. बिहार में अभी भाजपा और जेडीयू के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर पेंच फंसा हुआ है, लेकिन सूत्रों की मानें तो नीतीश कुमार ने प्रशांत किशोर के चुनाव लड़ने के लिए सीट भी तय कर दी है.

पीके के लिए बक्सर

सूत्रों के हवाले से खबर है कि प्रशांत किशोर को जेडीयू के टिकट पर बिहार की बक्सर लोकसभा सीट से चुनावी मैदान में उतारा जा सकता है. ब्राह्मण बाहुल्य वाली इस सीट को चुनावी समीकरणों के हिसाब से प्रशांत किशोर के लिए इसलिए ज्यादा मुफीद माना जा रहा है कि प्रशांत किशोर इसी जाति से आते हैं. सूत्र बताते हैं कि सीटों के बंटवारे के तहत नीतीश कुमार भाजपा के सामने बक्सर सीट की मांग रख सकते हैं. बक्सर सीट से फिलहाल केंद्रीय मंत्री अश्विनी चौबे सांसद हैं

बिहार की राजनीति में जाति और जमात का गहरा प्रभाव माना जाता है. लंबे समय तक बिहार में शासन करने वाले लालू प्रसाद यादव और उनकी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल के बारे में माना जाता रहा है कि उसके पास यादव और मुस्लिम वर्ग का समर्थन है. वहीं 2005 से बिहार की सत्ता पर काबिज नीतीश कुमार और उनकी पार्टी जनता दल यूनाइटेड को भी कुछ खास जातियों के समर्थन की बात की जाती है. बिहार में भारतीय जनता पार्टी के पास अगड़ी जातियों और कारोबारी वर्ग का समर्थन माना जाता है.

ऐसे में पिछले 15 साल में यह देखा गया है कि नीतीश कुमार का वोट बैंक जिसके वोट बैंक से जुड़ जाता है, वह चुनावों में जीत लेकर आता है. पहले नीतीश भाजपा के साथ चुनाव लड़कर जीतते थे. 2015 में वे राजद के साथ मिलकर चुनाव जीते. अब फिर नीतीश कुमार भाजपा के साथ हैं.

ऐसे में चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर को जदयू में शामिल कराने के नीतीश कुमार के निर्णय को लेकर बिहार में तरह-तरह की बातें चल रही हैं. बिहार में अच्छे ढंग से यह प्रचारित हो रहा है कि प्रशांत किशोर ब्राह्मण जाति से हैं. सब लोग यही सवाल उठा रहे हैं कि जिस प्रशांत किशोर को नीतीश कुमार ‘भविष्य’ कह रहे हैं, वे बिहार की जात-जमात की राजनीति में कहां फिट बैठते हैं.

कुछ लोगों को यह भी लगता है कि जिस तरह से मायावती ने उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी के लिए दलितों और ब्राह्मणों का समीकरण तैयार किया था, कुछ उसी तरह का समीकरण नीतीश कुमार भी तैयार करने की कोशिश में हैं. अगर बिहार में अन्य पिछड़ा वर्ग के एक ठीक-ठाक वर्ग और ब्राह्मणों की गोलबंदी एक तरफ होती है तो इससे जेडीयू की राजनीतिक पूंजी मजबूत होगी. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रदेश के ब्राह्मण प्रशांत किशोर को अपना नेता मानेंगे?

फायदे

वैसे जेडीयू के लिए प्रशांत किशोर की दूसरी भी कई उपयोगिताएं नजर आ रही हैं. कहा जा रहा है कि राजद के नए नेता तेजस्वी यादव के मुकाबले जदयू के पास कोई युवा और विश्वस्त चेहरा नहीं था. प्रशांत किशोर जदयू की इस कमी को पूरा कर सकते हैं.

प्रशांत किशोर के एक पुराने सहयोगी की मानें तो जदयू के लिए प्रशांत किशोर की तीसरी उपयोगिता यह हो सकती है कि वे राष्ट्रीय स्तर पर नीतीश कुमार के लिए बड़ी भूमिका की पटकथा तैयार करें. पहले भी प्रशांत किशोर ने इसके लिए कोशिशें की थीं, लेकिन वे कोशिशें धरी की धरी रह गईं. उस वक्त यह कोशिश नीतीश कुमार को विपक्षी खेमे का प्रमुख नेता बनाने के लिए चल रही थी. हालांकि, इस बार भी प्रशांत किशोर को इस कोशिश में कितनी कामयाबी मिलेगी, यह कहना अभी मुश्किल है.

प्रशांत किशोर की चौथी उपयोगिता यह बताई जा रही है कि उनकी विशेषज्ञता का फायदा बिहार के शासन तंत्र के आधुनिकीकरण के लिए किया जा सकता है. बिहार सरकार के एक अधिकारी बताते हैं कि विश्व बैंक और कई दूसरी अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं से बिहार सरकार को कई बार वित्तीय सहायता इसलिए नहीं मिल पाती क्योंकि बिहार के शासन तंत्र उन संस्थाओं के पैमानों के हिसाब से नहीं है. जिस तरह से ये संस्थाएं कई सेवाओं को आॅनलाइन करने का शर्त रखती हैं, वह बिहार में नहीं है. ऐसे में बिहार सरकार के अधिकारियों को लगता है कि प्रशांत किशोर का वैश्विक स्तर पर काम करने के अनुभव का इस्तेमाल मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने शासन तंत्र को और दुरुस्त करने के लिए करें.

जदयू के एक पूर्व सांसद प्रशांत किशोर की एक और उपयोगिता बताते हैं. वे कहते हैं कि पार्टी के पास कोई ठोस वोट बैंक स्थायी तौर पर नहीं है, इसलिए उसे संगठन विस्तार में दिक्कत होती है. उनके मुताबिक प्रशांत किशोर के जरिए नीतीश कुमार युवाओं के बीच पार्टी को मजबूत करने की कोशिशें कर सकते हैं. इस तरह जदयू को धीरे-धीरे जाति के दायरे से बाहर हर जाति और वर्ग के युवाओं की पार्टी के तौर पर स्थापित करने की कोशिश हो सकती है.

बहरहाल, इन कोशिशों में प्रशांत किशोर कितना कामयाब हो पाएंगे और उन्हें नीतीश कुमार के अलावा पार्टी के दूसरे नेताओं और कार्यकर्ताओं का कितना साथ मिलेगा, यह तो आने वाले वक्त में ही पता चल पाएगा