17वीं सदी के जर्मन दार्शनिक फ्रेडरिक विल्हेल्म हीगेल मानते थे कि प्रकृति ने सौभाग्य से अमेरिकी समाज को एक नेमत बख्शी है – ‘पश्चिम में फैला हुआ उसका विशाल भू-क्षेत्र जहां उसके सभी सामाजिक तनाव और राजनीतिक क्लेशों का समाधान मौजूद है.’

उनका इशारा था अमेरिका का वह ‘वाइल्ड वेस्ट’ जो टेक्सास, एरिजोना, कोलरैडो, मोंटाना, न्यू मेक्सिको, नेवादा और ओक्लाहामा के उजाड़ मैदानी टुकड़ों, गहरी लाल कैनियन घाटियों और कैक्टस की शक्ल में सर उठाये चट्टानी टीलों के साथ मिलकर बना था. इसके बारे में इटली के महान सिनेमाकारों में से एक सर्जियो लिओन (1929-1989) ने बाद में कभी कहा था, ‘यह वो जगह है जहां जीवन की कोई कीमत नहीं.’

अमेरिका के इस ‘उजाड़ पश्चिमी’ अंचल को पृष्ठभूमि में रखकर जिस सिनेमा जॉनर का विकास हुआ उसे हॉलीवुड ‘वेस्टर्न’ के नाम से जाना जाता है. आजकल की चर्चित अमेरिकी टीवी सीरीज ‘वेस्टवर्ल्ड’ में जिस अम्यूजमेंट पार्क को बनाकर रोबोटों द्वारा दुनिया का मनोरंजन करने वाली कहानी दिखाई जा रही है, उसमें भी इसी ‘वाइल्ड वेस्ट’ को पुनर्जीवित किया गया है. बीसवीं सदी के शुरुआती वर्षों में जब सिनेमा एक कला के रुप में निखरने के लिए संघर्षरत था, उस समय बनी एक मूक फिल्म ‘द ग्रेट ट्रेन रॉबरी’ (1903) से वेस्टर्न फिल्मों का शुभारम्भ हुआ था. लेकिन एक भरे-पूरे जॉनर के रूप में विकसित और स्थापित होने में उसे दो दशक से ज्यादा लग गये. 1940 आते-आते सिनेमा की एक विशिष्ट श्रेणी के रूप में वेस्टर्न फिल्में अपना एक अलग दर्शक वर्ग तैयार करने में सफल रहीं. इनकी अपनी मुख्तलिफ पटकथायें थीं और निराला सिनेमा-दर्शन.

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वेस्टर्न जॉनर की ये अमेरिकी फिल्में भयावह हिंसा, विस्तारवाद, स्थानीय जनजातीय संस्कृतियों के प्रति असहज अलगाव और प्रकृति को रौंद कर जीत लेने के अपार आक्रामक बोध से लैस थीं. अमेरिकी सिविल वॉर के ठीक बाद के काल-खंड (1860 से लेकर 1890) में बनी इन फिल्मों का नायक ‘सभ्य समाज’ से आया वह ‘घुड़सवार-काउबॉय’ था जिसके सिर पर गोल ‘स्टेटसन हैट’ था, कमर में रुगर की नक्काशीदार रिवॉल्वर या कंधे पर टंगी विंचेस्टर राइफल, पैरों में घुटनों तक के राइडर बूट और उनमें घोड़े को एड़ देने के लिए कसे गए नुकीले स्पर्स.

टेक्सास की धूल से बचने के लिए पहनी गई ‘बकस्किन’ पोशाक में अमेरिकन नस्ल के अपालोसा घोड़े पर सवार हो उसे अपने रेंच के जानवर संभालने थे, स्थानीय कॉमेंचे (नेटिव अमेरिकन जनजाति) से लड़ना था या फिर किसी निजी अथवा ‘सभ्य प्रतिशोध’ के लिए धूल भरी आंधियों में से यकायक प्रकट होकर गोलियां बरसानी थीं. फिर किसी भी प्रकार के अफसोस के बिना अपनी घुच्ची आंखों के साथ उसी धूल के बवंडर में विलीन हो जाना था, जिसमें से वह आया था.

इस जॉनर के सबसे प्रसिद्ध अभिनेता क्लिंट ईस्टवुड ऐसी ही वस्त्र-सज्जा में कोलरेडो के धूल से भरे मैदानों में उतरते थे. उनसे पहले जॉन वेन नामक अभिनेता एक महामानव की तरह ‘स्टेजकोच’ (1939, निर्देशक जॉन फोर्ड) के सामने आ खड़ा हुआ था. निर्देशक जॉन फोर्ड की इसी फिल्म से विश्व सिनेमा में ‘काउबॉय’ ने अपना सफर शुरू किया था और यहीं से जॉन फोर्ड (1894-1973) भी अपनी वेस्टर्न फिल्मों की यात्रा पर निकल पड़े थे.

विश्व सिनेमा पर जॉन फोर्ड और हॉवर्ड हॉक्स (1896-1977) की फिल्मों ने एक गहरा असर छोड़ा है. इन दोनों की फिल्में विश्व सिनेमा के इतिहास में ‘क्लासिक’ का दर्जा रखती हैं. दोनों को नए सिनेमा का संवेदनशील शिल्पकार माना जाता है. लेकिन इनका सिनेमा अक्सर सामाजिक और राजनैतिक श्रेष्ठता के जिस एकध्रुवीय ताने-बाने को रचता है वह तमाम अमेरिकी चिंतकों के लिए एक विमर्श का विषय रहा है.

यह विमर्श अमेरिकी वेस्टर्न फिल्मों के पलायनवादी, महानायकवादी और पूरी तरह से झूठा (फिक्शन) होने की कमजोरी पर खासा जोर देता रहा है. खुद के इतिहास की अति गरिमामयी प्रस्तुति की वजह से भी हॉलीवुड और अमेरिकी दर्शकों ने वेस्टर्न जॉनर को हाथों-हाथ लिया था. अमेरिकी इतिहासकार प्रोफ़ेसर डेविड हेमिल्टन मर्डोक ने अपनी किताब ‘द अमेरिकन वेस्ट: द इन्वेंशन ऑफ अ मिथ’ में लिखा है कि शायद ही कोई दूसरा देश हो जिसने सिनेमा के माध्यम से अपने अतीत को पुनर्नियोजित करने में इतना समय लगाया हो जितना अमेरिकी फिल्मकारों ने अपने पश्चिमी प्रांतों की जीत को दिखाने में लगाया है. सिनेमा के विख्यात आलोचक फ्रांसिसी एन्द्रे बैज़िन, वेस्टर्न जॉनर के प्रति अमेरिकी नागरिक समाज (सिविलाइज्ड सोसायटी) के आकर्षण को उस समाज की अपनी उथल-पुथल और उससे बन रही नयी मान्यताओं से जोड़ते हैं.

निर्देशक जॉन फोर्ड की पहली वेस्टर्न क्लासिक ‘स्टेजकोच’ पर आलोचक एन्द्रे बैजिन ने अपनी किताब ‘व्हॉट इज सिनेमा’ में लिखा है कि ‘स्टेजकोच दिखाती है कि एक वेश्या संकीर्ण सोच वाले ऐसे लोगों से ज्यादा सम्मानीय होती है जिन्होंने उसे शहर से बाहर कर दिया था और उतनी ही जितनी कि एक अधिकारी की पत्नी; एक आवारा जुआरी जानता है कि सम्मान के साथ मरा कैसे जाता है; एक शराबी डॉक्टर पूरे समर्पण और योग्यता के साथ अपना काम कर सकता है; और एक अपराधी, जिसके किये की वजह से उसके पीछे दुनिया पड़ी हो, वह वफादारी, साहस और शिष्टता की मिसाल हो सकता है जबकि एक जाना-माना बैंकर पैसों से भरा कैशबॉक्स लेकर भाग सकता है.’

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लेकिन अगर जर्मन दार्शनिक फ्रेडरिक हीगेल (1770-1831) के पास ही फिर से चला जाये तो उन्होंने कहा था कि अमेरिकी समाज के अपने तनाव और क्लेशों का हल उसकी अपनी ही जमीन पर मौजूद है. आखिर हीगेल का संकेत अमेरिकी समाज में मौजूद किस प्रकार के सामाजिक द्वंद्वों की ओर था? वह कौन से तनाव और क्लेश थे जो निर्देशक जॉन फोर्ड और हॉवर्ड हॉक्स के कला-सृजन को जकड़े रहे? यह क्यों था कि जॉन फोर्ड की सबसे बड़ी क्लासिक कही जाने वाली फिल्म ‘द सर्चर्स’ (1956) का नायक ईथेन (जॉन वेन) एक कॉमेंचे सरदार द्वारा अपनी भतीजी का अपहरण कर लिए जाने पर उसे बचाने के बजाय ढूंढकर मार देना चाहता है? अपने देश की भाषा में कहें तो ऑनर किलिंग. इस वजह से ईथेन का किरदार हॉलीवुड वेस्टर्न की क्लासिक परंपरा का सबसे जटिल चरित्र माना जाता है.

ईथेन का यह किरदार दरअसल, एक पूंजीवादी नागरिक समाज के अपने द्वंद्वों का ही फैलाव है. ‘फिलोसफी ऑफ राइट’ किताब में हीगेल पूंजीवादी साम्राज्यवाद के आर्थिक पहलुओं की व्याख्या करके समझाते हैं कि कानून, नैतिकता और जीवन के दूसरे अन्य पहलू ‘परिवार’ और ‘सिविलाइज्ड सोसायटी’ के बीच की दुविधा में विकसित होते हैं. एक संस्था के रूप में ‘परिवार’ तो लोगों को अपने आदर्श की अभिव्यक्ति के अवसर देता है, लेकिन नागरिक समाज गलाकाट ‘बाजारवादी प्रतिस्पर्धा’ वाला ऐसा क्षेत्र है जिसमें हर दूसरा व्यक्ति लक्ष्य की पूर्ति का साधन भर है.

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क्लासिक वेस्टर्न फिल्मों का प्रतिनिधित्व करने वाले निर्देशक हावर्ड हॉक्स की फ़िल्म ‘रेड रिवर’ (1948) भी इसी तरह की दुविधा से प्रभावित चरित्रों की कहानी है. पूरी फ़िल्म ‘बाजार’ और ‘परिवार’ के भयानक द्वंद की कथा है जिसके बारे में लेखक जॉन ओ कॉनर ने कहा था – ‘रेड रिवर अमेरिकी फिल्म इतिहास की कौतूहल जगाने वाली फिल्मों में से एक है’. रेड रिवर का नायक टॉम डॅनसन (जॉन वेन) टेक्सास का एक मेहनती रेंचर (किसान और पशुपालक) होने के साथ-साथ एक कठोर पिता भी है. उसका बेटा मैथ्यू (मोंटगोमरी क्लिफ्ट) उसके एकतरफा फैसलों से आजिज़ आकर उससे बगावत कर देता है और जानवरों का पूरा झुंड लेकर केंसास की ओर चला जाता है. इसके बाद डॅनसन के जीवन का एक ही मकसद रह जाता है, अपने बेटे से प्रतिशोध लेना और अपने पशुओं को दुबारा हासिल करना. ‘रेड रिवर’ की कहानी मूलतः लेखक बोर्डेन चेज ने लिखी थी जिसे एक सीरीज के रूप में एक दैनिक अखबार ‘सैटरडे इवनिंग पोस्ट’ ने कई अंकों में छापा था.

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ऊपर से देखने पर ‘रेड रिवर’ छीना-झपटी की कहानी भर लगती है. लेकिन यहां दांव पर केवल रेंच के पशुओं का विशाल झुंड नहीं है, जैसा कि ओ कॉनर और ए जैक्सन ने ‘अमेरिकन हिस्ट्री/अमेरिकन फिल्म’ नाम की किताब में लिखा है - ‘यह फिल्म एक साम्राज्य में प्रभुत्व की लड़ाई के बारे में है. दूसरों की जमीन छीनकर एक समाज द्वारा अपना विस्तार करने और ऐसा करने से जन्मे परिणामों की है...असल में ‘रेड रिवर’ गाय-घोड़ों और पिस्तौल की मदद लेकर लड़ते जांबाज मर्द व औरतों वाली फिल्म तो है लेकिन साथ ही यह पूंजीवाद पर बात करने वाली फिल्म भी है.’

हॉलीवुड की वेस्टर्न फिल्मों का एक दूसरा पहलू रेड इंडियंस, अपाचे, कॉमेंचे सहित अन्य नृजातीय समूहों के एकपक्षीय और अन्यायपूर्ण चित्रण से भी जुड़ा है. इन नेटिव अमेरिकन्स को वेस्टर्न फिल्में अक्सर असभ्य और बर्बर दिखाने की गलती करती आई हैं और काफी हद तक रेसिस्ट होकर अपने गोरे नायक की जीत दिखाना ही इनका मुख्य मकसद रहा है. लेकिन 1990 में आई केविन कॉस्नर की फिल्म ‘डांसेज विद वुल्व्ज’ इस मायने में एक ऐतिहासिक बदलाव की शुरुआत करती है. यह फ़िल्म सिविल वॉर के दौर में एक अमेरिकन फौजी लेफ्टिनेंट जॉन डुनवार और एक स्थानीय जनजाति सिओक्स इंडियंस के बीच के रिश्तों को बड़ी गहरी संवेदना से पकड़ती है. लेफ्टिनेंट अपनी पलटन से भटक जाता है और अकेला सुदूर के एक अंचल में फंस जाता है जहां पर यह जनजाति रहती है. उस जगह कोई एक-दूसरे की भाषा नहीं जानता और दोनों ही पक्ष एक दूसरे को संदेह से देखते हैं. नायक डुनवार पूरी तरह अकेला है इसलिए उसमें भय और असुरक्षा बोध भी ज्यादा रहता है.

लेकिन धीरे-धीरे दोनों में संवाद शुरू होते हैं. असुरक्षाएं खत्म होती हैं और एक सभ्यता का प्रतिनिधि लेफ्टिनेंट डुनवार यह महसूस करने लगता है कि बड़ी सभ्यताओं के पास छोटी संस्कृतियों को हरा कर रौंद डालने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है. वह धीरे-धीरे सिओक्स बोली सीखने-बोलने लगता है और जब हुकूमत की फौजें उसे ढूंढती हैं तो अंततः सिओक्स बनकर वह उन्हीं ‘अनजान’ लोगों के साथ दुर्गम इलाकों की ओर रवाना हो जाता है.

‘डांसिज विद वुल्व्स’ विस्तारवाद के उस दर्शन के बरक्स एक सैद्धांतिक प्रतिरोध व्यक्त करती है जिसे 19वीं सदी की अमेरिकन राजनीति में ‘मैनिफेस्ट डेस्टिनी’ कहा गया है. मैनिफेस्ट डेस्टिनी शब्द 19वीं सदी के मध्य दशक में एक पत्रकार जॉन सुलीवन ने गढ़ा था. 1845 में अपने एक लेख में उसने लिखा था कि भगवान ने सभ्य अमेरिकन समाज को यह जिम्मेदारी दी है कि वह अपनी डेस्टिनी यानी नियति को मैनिफेस्ट यानी कि अभिव्यक्त करे. यह नियति कुछ और नहीं बल्कि पश्चिम के जनजातीय इलाकों की ओर प्रस्थान करना, उन्हें जीतना और अपने विचारों और संस्थाओं से लबरेज कर कर देना था.

हॉलीवुड का वेस्टर्न सिनेमा इसी सोच और सिद्धांत का सिनेमेटिक आख्यान है. बावजूद इसके विश्व सिनेमा को - कम से कम कला के स्तर पर - इन फिल्मों ने कितना दिया है, यह इस बात से समझा जा सकता है कि ऑरसेन वेल्स ने अपनी कालजयी फ़िल्म ‘सिटीजन केन’ बनाने से पहले जॉन फोर्ड की ‘स्टेजकोच’ को 40 बार देखा था.

(धर्मेंद्र सिंह उत्तर प्रदेश काडर के आईपीएस अधिकारी हैं)