किताबों पर प्रतिबंध लगना नई बात नहीं है. लेकिन हाल-फिलहाल की कुछ घटनाओं ने किताबों को संशय से देखने वाले समाज और सरकार से हमें फिर मिलवाया है. कभी सिनेमा और एक साहित्यकार के माध्यम से, तो कभी राष्ट्रीय स्तर की खबरों द्वारा. भीमा-कोरेगांव मामले की पड़ताल के दौरान कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं के घरों में वामपंथी लेखकों की किताबें मिलना जुर्म समझा गया और उन्हें ऐसे जब्त किया गया जैसे वे कोई गलत काम करने का सीधा सबूत हों. इसी हफ्ते रिलीज हुई ‘मंटो’ ने बखूबी चित्रित किया कि इस अफसानानिगार के अफसानों को लेकर समाज की बेरुखी किस हद तक बढ़ी हुई थी और सरकारों की कार्यवाही – हिंदुस्तानी और पाकिस्तानी दोनों – कितनी निर्मम थी. फिर कुछ वक्त पहले नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई मिनी-सीरीज ‘घूल’ ने तानाशाह हिंदुस्तानी सरकार युक्त एक भयावह भविष्य की कल्पना की और यहां तक दिखाया कि ऐसे स्याह वक्त में किस तरह किताबों तक को जला दिया जाता है.

इन घटनाओं की वजह से एक बेहद पुरानी फिल्म फिर से मौजूं हो उठी है. यह अपने वक्त में भले ही कम सराही गई, लेकिन गुजरते वक्त के साथ न सिर्फ क्लासिक कहलाई बल्कि आज भी मौजूदा समाज और सरकारों की आश्चर्यजनक रूप से तीखी आलोचना करने में सक्षम मालूम होती है. ‘घूल’ ने एक सीन द्वारा सीधे तौर पर उस फिल्म को ट्रिब्यूट भी दिया है.

फिल्म का नाम है ‘फैरनहाइट 451’, जिसे फ्रेंच न्यू वेव सिनेमा के अगुआ निर्देशक फ्रांसुआ त्रूफो ने 1966 में निर्देशित किया था. ‘घूल’ ने अपने पहले एपीसोड के शुरूआती हिस्से में दिखाया है कि पुलिस द्वारा मुसलमानों की एक बस्ती में पहले तो सारी ‘एंटी-नेशनल’ किताबें इकट्ठा की जाती हैं (जैसे एनसाइक्लोपीडिया, नर्सरी राइम्स!) और फिर इन्हें एक गट्ठर बनाकर बंदूकनुमा शस्त्र से जला दिया जाता है. यह ‘फैरनहाइट 451’ के उस केंद्रीय विचार का मुख्य विजुअल है, जिसमें कि उस स्याह भविष्य की कल्पना की गई है जहां किताबें पढ़ना गैरकानूनी है और एक सरकारी संस्था उन्हें ढूंढ़-ढूंढ़कर जलाती है.

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‘फैरनहाइट 451’ बीसवीं सदी के मशहूर अमेरिकी लेखक रे ब्रैडबरी के इसी नाम के महान साइंस-फिक्शन उपन्यास पर आधारित है, और यह फिल्म से कई गुना ज्यादा चर्चित किताब है. डिस्टोपियन फ्यूचर को बयां करने वाली जॉर्ज ऑरविल की ‘1984’ (1949) और ‘फैरनहाइट 451’ (1953) नामक किताबों पर अक्सर साथ चर्चा होती है जब भी चिंतकों को सरकारों की तानाशाही और दमनकारी नीतियां उफान पर नजर आती हैं.

‘1984’ जहां तानाशाह सरकार की दमनकारी नीतियों का विस्तृत चित्रण करती है और उसमें स्टेट एक निर्दयी किरदार बनकर उभरता है, वहीं ‘फैरनहाइट 451’ सिर्फ अपने केंद्रीय विचार के इर्द-गिर्द ही कहानी बुनती है और सरकार या स्टेट की उसमें अदृश्य मौजूदगी भर रहती है.

शायद यह एक मुख्य वजह है कि सरल नेरेटिव व प्रिडिक्टबल कहानी होने के बावजूद ‘फैरनहाइट 451’ का प्रभाव आज भी कम नहीं हुआ. यह हर वक्त में मौजूं सिद्ध होती है और विचारधाराओं के पार जाकर हुकूमतों की जड़ मानसिकता पर सीधा हमला करती है. इसका साइंस-फिक्शन एलीमेंट इतना मजबूत है कि 1953 में लिखा होने के बावजूद आज के समाज की कलई भी खोल देता है और उसका टेलीविजन के तौर पर इस्तेमाल किया गया रूपक हमारे वर्तमान की कड़वी सच्चाई तक दिखा जाता है.

फ्रांसीसी निर्देशक त्रूफो ने किताब के इस रूपक को फिल्म बनाते वक्त इतनी खूबसूरती से इस्तेमाल किया है कि फिल्म की शुरुआत में जब क्रेडिट्स दिखाने का चलन होता है, उन्होंने ‘फैरनहाइट 451’ में इन क्रेडिट्स को केवल बोला है. पीछे स्क्रीन पर टेलीविजन के पुराने दौर वाले एंटीना के कई रंग-बिरंगे दृश्य चलायमान रहते हैं और एक तराशी हुई आवाज फिल्म के कलाकारों, लेखकों व निर्देशक का नाम बोलती है. स्क्रीन पर लिखा कुछ नहीं आता. क्यों? क्योंकि फिल्म किताबों को जलाए जाने के बारे में है और जिस भी समाज में किताबें पढ़ना प्रतिबंधित होगा वहां लोग जाहिर तौर पर पढ़ना भी भूल चुके होंगे. इसलिए केवल सुनेंगे. और सुनेंगे भी वही, जो उन्हें सुनाया जाएगा.

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इस ‘सुनाने’ को फिल्म टेलीविजन के माध्यम से मारक अंदाज में दिखाती है. सारे कानून-पसंद नागरिकों के घर केवल सरकारी चैनल दिखाने वाला आज के जमाने जैसा बड़ा एलईडी टीवी लगा होता है और ज्यादातर नागरिक उनसे ही चिपके रहते हैं. नायक मोंटैग (ऑस्कर वर्नर) की पत्नी के माध्यम से इस स्टेट-स्पॉन्सर्ड मनोरंजन के नशे का चित्रण किया जाता है और फिल्म के आखिरी हिस्से में सरकार का विद्रोह करने वाली नायिका (जूली क्रिस्टी) के पकड़े जाने वाला एक सीन इस तरह के मनोरंजन की भयावहता को बखूबी उभारता है.

इस दृश्य में नायक मोंटैग नायिका की पड़ोसी से पूछता है कि बगल वाले घर में रहने वाली नायिका व उसके परिवार के बारे में आखिर पुलिस को कैसे पता चला कि वे घर में किताबें छिपाए हुए हैं. जमीन पर खड़ी पड़ोसी ऊपर देखती है और हाथ का इशारा कर नायक से भी देखने को कहती है. कैमरा इसके बाद आसमान का रुख करता है और उस पूरी रिहाइश की छतों पर टीवी एंटिना लगे नजर आते हैं. सिवाय एक के! इस तरह नायिका पकड़ी जाती है क्योंकि वो स्टेट-स्पॉन्सर्ड टीवी नहीं देखती. पुलिस समझ जाती है कि किताबें पढ़ने का शौक रखने वाली विद्रोही यहीं रहती होगी!

फिल्म का नायक मोंटैग पेशे से फायरमैन है लेकिन उसका काम आग बुझाना नहीं है. किताबों को ढूंढ़कर उनमें कैरोसिन डालकर आग लगाना है. सुर्ख लाल रंग के वाहन पर काले कपड़े पहनकर वो किताबें जलाने निकलता है और उसका व उस जैसे हर फायरमैन का मोटो होता है – किताबों को जलाकर राख कर देना और फिर उस राख को भी जला देना! कैरोसिन की महक इस नायक को परफ्यूम की खुशबू जैसी लगती है और हर फायरमैन की तरह उसकी यूनिफॉर्म पर 451 लिखा होता है. यह वह तापमान है जिसपर किताबों के कागज जलकर राख हो जाते हैं, और यहीं से फिल्म अपना टाइटल भी लेती है.

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‘फैरनहाइट 451’ मशहूर फ्रांसीसी निर्देशक फ्रांसुआ त्रूफो के करियर की पहली रंगीन फिल्म थी और पहली व आखिरी अंग्रेजी भाषी फिल्म भी. इस पहली व आखिरी वाले आधे वाक्य में ही इस फिल्म को अपनी रिलीज के वक्त नापसंद किए जाने की वजहें भी छिपी हैं. असल में लेखक, फिल्म समीक्षक व निर्देशक त्रूफो फ्रेंच न्यू वेव सिनेमा का प्रतिनिधित्व करने वाले ऐसे निर्देशक के तौर पर जाने जाते थे जिन्होंने सिनेमा के पारंपरिक तौर-तरीकों को कभी पसंद नहीं किया. उनकी पहली प्रयोगधर्मी फिल्म ‘द 400 ब्लोज’ (1959) महान फिल्मों में गिनी जाती है और रिलीज के वक्त भी लीक से सर्वथा हटकर होने की वजह से समीक्षकों व दर्शकों द्वारा खासी पसंद की गई थी.

लेकिन जब चार ऐसी प्रयोगधर्मी फिल्में अपने देश फ्रांस में बनाने के बाद त्रूफो ‘फैरनहाइट 451’ को बड़े बजट व स्थापित स्टूडियो के साथ बनाने के लिए इंग्लैंड गए, तो वहां यह फिल्म बनाना उनके जीवन का ‘सबसे दुखद व सबसे मुश्किल’ अनुभव सिद्ध हुआ. न केवल उनकी व फिल्म के हीरो ऑस्कर वर्नर के बीच तनातनी लगातार जारी रही बल्कि एक आजाद ख्याल निर्देशक को स्टूडियो सिस्टम में फिल्म बनाना भी रास नहीं आया.

ऊपर से फ्रांसीसी त्रूफो न के बराबर इंग्लिश बोलते थे जबकि अजनबी देश में बन रही फिल्म पूरी इंग्लिश में थी और तकनीशियन भी पुराने फ्रांसीसी न होकर सारे अंग्रेज थे. इन सब मुश्किलों ने मिलकर त्रूफो की क्रिएटिविटी को परदे पर ‘द 400 ब्लोज’ की तरह ट्रान्सलेट नहीं होने दिया और इस वजह से जिस तरह आप आज फिल्म देखने पर कई सारी कमियां आसानी से पकड़ लेंगे, उस दौर के समीक्षकों व दर्शकों ने भी यह काम लगन से किया.

लेकिन चूंकि फिल्म का थॉट बेहद जबरदस्त था, इसलिए कई त्रुटियों के बावजूद त्रूफो वह सबकुछ दिखाने में सफल रहे जो रे ब्रैडबरी ने अपनी किताब में लिखा था. फिल्म में ओथेलो, एलिस इन वंडरलैंड, चार्ली चैप्लिन की आत्मकथा से लेकर काफ्का, अरस्तु, सल्वाडोर डाली जैसी शख्सियतों की किताबों को जलाने वाले लंबे दृश्य बेहद हृदयविदारक बन पड़े. जब अनगिनत किताबों की एक सीक्रेट लाइब्रेरी को उसकी केअरटेकर महिला संग जलाया गया, तो हमारी आंखें ऐसे बंद हो गईं जैसे वे किताबें नहीं जिंदा इंसानों को जलते देख रही हों. प्रौढ नायक ने जब पहली दफा छिप-छिपकर किताबें पढ़ना शुरू किया और शब्दकोश से ढूंढ़-ढूंढ़कर समझा कि ‘गैंडा’ क्या होता है तो देखने वाले के चेहरे पर उदास मुस्कान तैर गई.

इसी नायक ने जब पहली बार ऊंची आवाज में एक किताब पढ़ी तो उसके साथ बैठी महिलाएं रोने लगीं क्योंकि सरकार द्वारा खुशी का नकली एक्सप्रेशन सदैव ओढ़ने को मजबूर इन महिलाओं के लिए किताब में दर्ज मुख्तलिफ भावपूर्ण इमोशन एकदम नए थे. किताबों को बैन करने की अनगिनत मूर्खतापूर्ण वजहें फिल्म में दिखाई गईं और बार-बार बताई-दिखाई गईं, ताकि दर्शक समझें कि तानाशाहों के आदेश हमेशा दमन की बानगी होते हैं, किसी बेहतर भविष्य की कल्पना नहीं.

और फिर त्रूफो, अत्यंत खूबसूरत अंत रचने में भी कामयाब रहे. व्यवस्था से हताश होकर नायक शहर से दूर घने जंगलों में स्थित ऐसी जगह पहुंच सका जहां उसे बागी लोग इकट्ठा होकर किताबों की रक्षा करते मिले. कैसे? खुद चलती-फिरती किताबें बनकर! यहां हर बागी एक-एक किताब याद कर लेता है और खुद चलती-फिरती किताब बन जाता है. किताब फिर जला दी जाती है और कानून के हाथ भी छोटे पड़ जाते हैं. फिल्म के आखिरी लंबे सीक्वेंस में, बर्फबारी के बीचों-बीच, दर्जनों लोग अपनी-अपनी किताबें याद करते हुए इधर से उधर टहलते हैं और यह खूबसूरत दृश्य आपकी स्मृति में लंबे समय के लिए अंकित हो जाता है.

‘फैरनहाइट 451’ ठीक यहीं मुखर होकर जैसे एक लाजवाब सवाल दुनिया से पूछती है – किताबें तो जला दोगे, लेकिन उनमें लिखी बातों के ताब को कैसे जलाओगे?

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