बुढ़ापा आना तो तय है. फिलहाल चिकित्सा विज्ञान इसे रोक पाने में असमर्थ है. हां, बुढ़ापे के साथ बीमारियां भी आएंगी, ऐसी कोई पैकेज डील नहीं है. बुढ़ापे में भी स्वस्थ रहा जा सकता है बशर्ते हम अपनी सीमाओं को समझें. क्या हैं वे सीमाएं? कौन-कौन सी बीमारियां हैं जो बुढ़ापे में ज्यादा होती हैं? उनसे कैसे बचें? उनके रहते कैसे स्वस्थ रहें? यहां हम कुछ जरूरी बातें बताने की कोशिश करेंगे. ये बातें इस प्रकार हैं.

खानपान : अक्सर पूछा जाता है कि बुढ़ापे में क्या खाएं क्या न खाएं. उम्र बढ़ने के साथ कैलोरी की आवश्यकता कम होती जाती है. खुराक भी कम हो जाती है. जवानी में जितना खाते थे उतना ही खाते रहें तो वजन बढ़ने का डर रहता है और कम खाएं तो कुपोषण का खतरा. बुढ़ापे में प्यास भी कम हो जाती है तो डिहाइड्रेशन का भी खतरा. लेकिन पानी, प्यास न लगने पर भी पर्याप्त मात्रा में पीते रहें. इस उम्र में विटामिन डी और बी तथा कैल्शियम की कमी भी आम है. किसी आहार विशेषज्ञ की सलाह लेने में कोताही न करें.

व्यायाम : मानसिक और शारीरिक श्रम न छोड़ें. रोज कम से कम पंद्रह मिनट घूमें. साइकिल भी चला सकते हैं. तैर सकते हैं. कभी स्ट्रेचिंग, बैलेंस तथा सीमित भारोत्तोलन भी करें. बैठे न रहें. एक्टिव रहें. ऐसा करेंगे तो मन से भी स्वस्थ रहेंगे. अकेले न कर सकें तो ग्रुप बनाकर व्यायाम करें.

नियमित मेडिकल जांच : यदि पहले ही बीपी, डायबिटीज़ आदि से ग्रस्त हैं, तब तो उनकी नियमित जांच करवाई ही जानी चाहिए. यदि दो विशेष टीके भी लगवा लेंगे को ठीक होगा. आजकल इन्फ्लूएंजा वैक्सीन आती है. इसे हर साल लगवा सकते हैं. न्यूमोकोकल वैक्सीन एक बार ही लगवानी है जो आपको इन्फेक्शन से बचाएगी. टिटनेस की वैक्सीन दस साल के अंतराल पर लगवानी चाहिए. हड्डियां कमजोर तो नहीं हो रहीं, इसके लिए डीईएक्सए नामक एक्स-रे जांच होती है. चूंकि बुढ़ापे में औरतों में ब्रेस्ट कैंसर की आशंका 25 फीसदी बढ़ जाती है. बूढ़ी औरतें अपनी मेमोग्राफी भी कराएं तथा स्वयं अपने स्तनों की जांच करना सीखकर नियमित यह काम भी करें. आजकल पीएसए नाम की खून की जांच द्वारा प्रोस्टेट कैंसर की आशंका का पता करने का ट्रेंड सा चला है. डॉक्टर को लगे तो यह जांच कराएं.

गिरने की आशंका : उम्र बढ़ने के साथ आदमी का संतुलन गड़बड़ाने लगता है. गिरने की आशंकाएं बढ़ जाती हैं. मान लें कि 65 वर्ष वालों में 35 फीसदी तो 80 वर्ष से ऊपर इसकी आशंका 50 फीसदी तक हो जाती है. ऐसा कई कारणों से होता है. घुटनों में ऑस्टियोऑर्थराइटिस (गठिया), मांसपेशियों में ताकत का कम होना, दिमाग की नसों में रक्त प्रवाह की कमी, आंखों की रोशनी कम हो जाना आदि कारण तो हैं ही, बहुत बड़ा कारण विभिन्न दवाइयों का सेवन भी हो सकता है.

सठियाना : मान लिया गया है कि घर में बूढ़ा आदमी है तो वह कभी अंट-शंट बातें भी करेगा ही. बहकी बातें, बहका-सा व्यवहार… पर यह सही धारणा नहीं है. उम्र बढ़ने के साथ ऐसा कुछ नहीं है कि आदमी गड़बड़ा ही जाएगा. हां इस उम्र में अकेलापन, तनाव, डिप्रेशन आदि की संभावना ज्यादा रहती है जो सामाजिक तथा पारिवारिक स्तर पर सक्रिय रहकर रोकी जा सकती है. सबसे मेलजोल रखें. सामाजिक कार्यों से जुड़ें. इनसे आपकी मानसिक सक्रियता बढ़ेगी. यदि घर का कोई वृद्ध सदस्य अचानक बहकी-बहकी बातें करने लगे, आस-पास की चीजें न पहचाने, मानसिक रूप से अचानक ही गड़बड़ा जाए तो यह किसी सीरियस बीमारी का लक्षण है. निमोनिया, खून में शक्कर की कमी से लेकर यह स्ट्रोक आदि का लक्षण भी हो सकता है. बुढ़ापे में यदि याद्दाश्त जाने लगे, व्यवहार बदले, तब यह डिमेंशिया हो सकता है. मानसिक लक्षणों को सठियाना मानकर नजरअंदाज न करें.

पेशाब पर नियंत्रण न रह जाना : बुढ़ापे की यह आम तकलीफ है, जिसे बूढ़े लोग संकोच तथा शर्मवश छुपाते रहते हैं. औरतों में तो विशेष तौर पर. पेशाब कपड़ों में ही छूट जाती है. पूरी या थोड़ी-बहुत. रोक ही नहीं पाते. कई बार तो खांसने, छींकने या हंसने पर भी ऐसा हो जाता है. घर में बूढ़ा व्यक्ति हो तो उससे इस बाबत स्पष्ट पूछते रहना चाहिए. यह प्रोस्टेट की बीमारी, पेशाब के इंफेक्शन, बच्चेदानी के ढीले होने, पथरी, पेल्विस की मांसपेशियां ढीली हो जाने, किसी न्यूरोलॉजी वाली बीमारी आदि में से किसी का भी लक्षण हो सकता है और इन सब बीमारियों की या तो दवाएं मौजूद हैं या फिर इनका आसान सा ऑपरेशन भी हो जाता है.

प्रेशर की जगहों पर घाव या छाल : बूढ़े व्यक्ति प्रायः बैठे या लेटे रहते हैं. उनकी खाल भी नाजुक होती है. बैठे-बैठे या लेटे-लेटे, हड्डियों का दबाव जब खाल पर लंबे समय तक पड़ता है तो इस प्रेशर की जगह पर घाव हो जाते हैं. पीठ पर, एड़ी पर, टखनों पर. ये घाव आसानी से भरते भी नहीं. ये बिगड़ जाएं तो यहां का इंफेक्शन पूरे शरीर में फैलकर जानलेवा सेप्टीसीमिया बन सकता है. पक जाने घाव बेहद गहरा भी हो सकता है. इसलिए लगातार एक ही जगह बैठे या लेटे न रहें. घाव हो ही गया हो तो उसे पकने से बचाएं. ड्रेसिंग आदि कराएं.

यह दुर्घटना संभावित उम्र है : उम्र बढ़ती है तो कई बातें ऐसी होती हैं जो दुर्घटना को बढ़ावा देती है. संतुलन तनिक गड़बड़ हो सकता है. आंखों की रोशनी कम हो सकती है. शरीर तथा मस्तिष्क के ‘रिफ्लेक्स’ सुस्त पड़ जाते हैं जिससे ड्राइविंग करते समय ‘रिएक्शन टाइम’ ज्यादा हो जाता है. समय पर निर्णय नहीं ले पाते कि ब्रेक मारना था कि एक्सीलरेटर दबाना था! इस उम्र में ज्यादा सतर्क रहकर ड्राइविंग करने की आवश्यकता है. हेलमेट तो अवश्य ही पहनें. इस उम्र में सिर की हल्की चोट भी, हल्की-सी ठनक तक दिमाग को चोट पहुंचा सकती है.

तो ठाठ से बूढ़े होइए. बस अपना ध्यान रखिए, स्वयं को जवानों से कम मत मानें, पर उनसे ज्यादा भी मत मान बैठिए.