निर्भीक आधुनिकता का दावा करने के बावजूद हिंदी में ऐसे कवि बहुत कम रहे हैं जो दूसरों के कमीनेपन की बात करते हुए यह सहजता से स्वीकार कर सकें कि ‘उतना पहचानने लायक कमीनापन मुझमें भी बचा है.’ विष्णु खरे में अपनी चमड़ीचोर शर्म की आत्मस्वीकृति हमेशा सक्रिय रही. उन्होंने कभी किसी को कविता में और शायद जीवन में भी नहीं बख़्शा और न ही अपने को. उनके अंतिम कविता संग्रह का एक अंश है: ‘मुझे मालूम है/ कि सिर्फ़ एक आदमी के लिए बहुत कम हो पाता है/ और मैंने उससे भी कम किया/ चाहा तो कितना था कि बहुत कुछ करके जाऊं/ नहीं कर पाया तो उसके कई कारण थे/ जिनमें सबसे बड़ा मैं ही था.’

विष्णु अगर हिंदी के सबसे निडर-निर्भीक लेखकों में से एक थे तो इसलिए भी उनकी आत्मालोचना उनके साहित्य का अनिवार्य हिस्सा थी. वे उन शक्तियों की शिनाख़्त से कभी नहीं चूके जो हमारे समय और समाज में मनुष्य-विरोध, शोषण और हिंसा, अत्याचार में लिप्त हैं. वे उनके विरुद्ध सदा प्रतिबद्ध रहे. यथार्थ की उनकी पकड़ में यह एहतराम भी शामिल था कि ‘यूं भी एक चिराग का उजाला आखि़र टिकता ही कितना है/ और जाता भी होगा तो कितनी दूर’.

अगर कविता का एक ज़रूरी काम और किसी हद तक पैमाना यह है कि वह सच्चाई के अनछुए और अनपहचाने रूपों को भाषा में लाये तो विष्णु खरे ने यह काम बखूबी किया और ऐसा करते हुए उन्होंने कविता और गद्य, कविता और आख्यान की अनिवार्य दूरियों का बहुत सुघड़ अतिक्रमण किया. उनकी कुछ कविताओं के शीर्षक ही प्रमाण के रूप में काफ़ी हैं- ‘उल्लू’, ‘देर से आने वाले लोग’, ‘गूंगा’, ‘लड़कियों के बाप’, हमारी पत्नियां’, ‘लापता’, ‘चौथे भाई के बारे में’, ‘गुंग महल’, ‘सिंगल विकेट सीरीज’, ‘जो टेंपों में घर बदलते हैं’, ‘झूठे तार’, ‘आलैन’ आदि. इतनी अधिक सुशिल्पित कविताएं उनकी या उनके बाद की पीढ़ी के किसी और कवि ने शायद ही लिखीं हों.

हालांकि उनकी छवि विद्वान् की नहीं रही. विष्णु इतिहास, पुराण आदि के गहन अध्येता थे. उन्होंने महाभारत या मुग़लकालीन इतिहास से जो प्रसंग चुने हैं अपनी कविता में, वे हिंदी तो क्या भारतीय कविता में उनसे पहले प्रायः अछूते रहे हैं. चाहे साहित्य हो या पत्रकारिता उनका गद्य, कई बार जल्दी में लिखा जाने के बावजूद, सधा-सुलिखा गद्य था. यह याद किया जा सकता है कि अज्ञेय और शमशेर की मृत्यु के बाद उन्होंने जो शोक-टिप्पणियां, बिना नाम के लिखी थीं, वे शोक-गद्य में अप्रतिम हैं.

युवा पीढ़ी की सर्जनात्मकता में उनका मुझसे कहीं अधिक भरोसा था. ऐसे युवाओं की बड़ी संख्या है जिनकी रचनाएं ध्यान से पढ़ने के बाद जिन्हें विष्णु की प्रशंसा या फटकार न मिली हो. वे लेखकों की चूकों पर, फिर वे रचना में हों, आलोचना या सामाजिक व्यवहार में, हमेशा एक चौकन्ने लेखक की तरह तेज़ और अकसर टेढ़ी नज़र रहते थे. अपने अनुराग या घृणा में वे अकसर अतिरेक करते थे, पर कभी भी उन्होंने अपनी सच्ची भावना छिपाने-दबाने का छद्म नहीं किया.

विष्णु खरे एक युयुत्सु और योद्धा लेखक थे. वे आखि़र तक लगभग हर मोर्चे पर लड़ते रहे. जब-तब अपने से,ज़्यादातर दूसरों से, दुनिया से और मनुष्य-विरोध की हिंसक शक्तियों से. उनका न होना हिंदी साहित्य में एक निडर-निर्भय योद्धा का न होना है.