उत्तर प्रदेश का बरेली शहर मंडल (संभाग) मुख्यालय है. इस मंडल में चार जिले आते हैं- बरेली, बदायूं, पीलीभीत और शाहजहांपुर. राज्य के इन्हीं चार जिलों में बीते सवा-डेढ़ महीने में 350 से ज़्यादा मौतें हुई हैं. कैसे हुईं? यह राज्य के स्वास्थ्य विभाग काे भी समझ नहीं आया. मारे गए ज़्यादातर लोगों में किसी संक्रामक बीमारी जैसे कुछ सामान्य लक्षण दिखे. इस बीमारी को भी मलेरिया पीवी (प्लाज़्मोडियम वाइवैक्स) कहा गया, तो कभी मलेरिया पीएफ (प्लाजमोडियम फाल्सीपेरम). डेंगू, चिकगुनिया, दिमागी बुख़बार का भी अनुमान लगाया जाता रहा. साथ ही ऊपर वाले से दुआ की जाती रही कि मौसम जल्द से जल्द सामान्य हो जाए. कुछ ठंडक बढ़े ताकि बीमारी का प्रकोप घटे और बला टले.

अब दूसरी जानकारी. बरेली के ही इज्जतनगर में अंतरराष्ट्रीय स्तर का एक प्रतिष्ठित संस्थान है. नाम है- ‘भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान’ यानी आईवीआरआई. जैसा नाम से ही जाहिर है, यह संस्थान पशु चिकित्सा के क्षेत्र में काम करता है. पशुओं में होने वाली बीमारियों के उपचार के लिए टीके-दवा आदि का विकास. उन बीमारियों के यथासंभव निदान के तरीके की खोज. पशुओं के अंग-भंग होने पर उनकी सर्जरी के लिए ज़रूरी आधुनिक तकनीकों-उपकरणों का विकास. साथ ही पशु धन सुधार यानी ऐसे तौर-तरीके ढूंढना-इज़ाद करना जिनके जरिए जानवरों से ज़्यादा से ज़्यादा उत्पादकता हासिल की जा सके. और इसी तरह के कुछ अन्य काम इस संस्थान के दायरे में आते हैं. इस क्षेत्र में नए विशेषज्ञ तैयार करना, उन्हें शिक्षित और प्रशिक्षित करना भी इस संस्थान के जिम्मे है.

संस्थान की अधिकृत वेबसाइट भी बताती है कि ऐसे तमाम काम यहां बीते 129 साल (1889 में स्थापना हुई) से हो रहे हैं. इस लंबे सफर में 70 से करीब कार्यों का पेटेंट हासिल करने सहित न जाने कितने मील के पत्थर आए जिनके दम पर संस्थान ने देश ही नहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी पहचान बनाई. इसीलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र माेदी ने जब देश के किसानों की अामदनी दोगुनी करने का लक्ष्य तय किया तो आईसीएआर (भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद) के साथ आईवीआरआई को भी इस योजना का मसौदा तैयार करने का जिम्मा सौंपा. अब ये दोनों संस्थान बताएंगे कि देश के किसान फसल के साथ पशुपालन से भी कैसे अपनी आमदनी बढ़ा सकते हैं.

हालांकि अभी सवाल यह स्वाभाविक हो सकता है कि बरेली और उसके आसपास के चार जिलों में किसी ‘रहस्यमय संक्रामक बीमारी’ से हुईं मौतों और आईवीआरआई के बीच क्या संबंध हो सकता है? कोई संबंध है भी नहीं? और सबसे बड़ी बात कि संदेह पैदा करते ये सवाल उठने का आधार क्यों बना है? तो इन सभी का एक सीधा सा ज़वाब यह है कि जिस दौर में बरेली और उसके आसपास के जिलों में इतनी बड़ी तादाद में लाेग मरे उसी दौरान आईवीआरआई के ही एक वरिष्ठ वैज्ञानिक ने इस संस्थान की भूमिका को संदेह के घेरे में ला खड़ा किया है. ये वैज्ञानिक हैं- डॉक्टर बीआर (भोजराज) सिंह, जो आईवीआरआई के महामारी विज्ञान विभाग के प्रमुख हैं.

डॉक्टर सिंह के आरोप आईवीआरआई में गंभीर अनियमितताएं उजागर करते हैं

डॉक्टर बीआर सिंह ब्लॉग लिखते हैं. ‘आज़ाद इंडिया’ के नाम से उनका अपना ब्लॉग है. सत्याग्रह से बातचीत में उन्होंने इसकी ख़ुद पुष्टि की है. इसी ब्लॉग में उन्होंने अपने संस्थान के बारे में कई हैरान करने वाली जानकारियां साझा की हैं. वह भी पुख़्ता सबूतों के साथ. ये सबूत उन्होंने कुछ तो सीधे हासिल किए और कुछ सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत. इनके हवाले से उन्होंने साफ शब्दों में लिखा है कि उनके संस्थान यानी आईवीआरआई में बीते लगभग एक दशक से अंदरख़ाने बड़े पैमाने पर गड़बड़ियां हो रही हैं.

ये मुख्य रूप से दो तरह की हैं, जाे सीधे-सीधे मानव स्वास्थ्य को भी प्रभावित करती हैं. इनमें पहली है- संस्थान द्वारा बीमार और संक्रमित किस्म के दुधारू-पालतू पशुओं को पशुपालकों को बेचा जाना. वह भी पूरी तरह स्वस्थ बताकर. सिंह की मानें तो बीते सात-आठ साल में ऐसे 420 से अधिक संक्रमित-रोगी पशु आसपास के पशुपालकों को बेचे जा चुके हैं. इनमें कई पशु तो ब्रूसलोसिस और टीबी जैसी गंभीर संक्रामक बीमारियों से ग्रस्त पशु भी शामिल थे. उन्होंने इसकी एक तालिका (नीचे दी गई) भी ब्लॉग पर साझा की है.

डॉक्टर बीआर सिंह के ब्लॉग से साभार.
डॉक्टर बीआर सिंह के ब्लॉग से साभार.

दूसरी गड़बड़ी पशु चिकित्सा के काम में आने वाली दवाइयों के प्रमाणीकरण से जुड़ी है. सिंह के मुताबिक पशु चिकित्सा क्षेत्र की बड़ी कंपनियों के प्रभाव में आकर आईवीआरआई द्वारा अमानक दवाइयों के अंधाधुंध प्रमाणीकरण का सिलसिला चल रहा है. इस तरह की अमानक दवाइयों के सैकड़ों बैच बिना पुख़्ता परीक्षण के ही आईवीआरआई से प्रमाणित होकर बाज़ार में आ चुके हैं. इनमें 20 बैच तो ब्रूसलॉसिस नामक संक्रामक बीमारी के ही हैं. यहां ग़ौर करने की बात है और जैसा कि डॉक्टर सिंह जैसे जानकारों से बातचीत में भी सामने आता है कि बरेली और आसपास के चार जिलों में ‘रहस्यमय संक्रामक बीमारी’ के कारण जो 350 से अधिक लोग मारे गए हैं, उनमें से कई में ऐसे लक्षण (नीचे दिया गया चार्ट देखें) भी दिखे हैं जो ब्रूसलॉसिस से हो सकते हैं. यह बीमारी आम तौर पर बीमार पशुओं या संक्रमित पशु उत्पादों से फैलती है.

हालांकि प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग का जो अमला ‘मौसम के भरोसे संक्रमण कम होने की आस’ लगाए बैठा हो उससे यह उम्मीद रखना बेमानी ही है कि उसने ब्रूसलॉसिस जैसी किसी अलहदा बीमारी के संभावित कोण से भी कोई जांच की होगी.

डॉक्टर सिंह ने पीएमओ और सुप्रीम कोर्ट तक का दरवाज़ा खटखटाया है

आईवीआरआई की अनियमितता को उजागर करने वाले डॉक्टर बीआर सिंह ने अपनी लड़ाई को अपने ब्लॉग तक सीमित नहीं रखा है. बल्कि उन्होंने अभी इसी 20 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को एक पत्र भी भेजा है. इसकी प्रति उनके ब्लॉग पर सबसे ऊपर ही नज़र आती है. इसमें उन्होंने बताया है कि बीमार और संक्रमित पशुओं को बेचकर और अमानक दवाइयों का प्रमाणीकरण कर आईवीआरआई मानव स्वास्थ्य तथा पशु जीवन को तो संकट में डाल ही रहा है, आधा दर्ज़न से अधिक कानूनों का भी खुला उल्लंघन कर रहा है. इन कानूनों में- उत्तर प्रदेश गौवध निषेध अधिनियम-1955, उत्तर प्रदेश गौवध निवारण नियमावली-1964, पशु परिवहन अधिनियम-1429/2006, पशु क्रूरता निषेध अधिनियम-1960, पशु परिवहन नियम-1978, खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम-2006, आदि प्रमुख हैं.

इतना ही नहीं, उन्होंने इसी पत्र में यह भी बताया है कि वे अब तक अपने विभाग के उच्चाधिकारियाें से लेकर, संबंधित मंत्रालय, केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) और प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) को भी कई बार शिकायतें भेज चुके हैं, पत्र लिख चुके हैं, लेकिन कार्रवाई के नाम पर अब तक कुछ हुआ नहीं है. इसके साथ ही उन्होंने शीर्ष अदालत से अपील की है कि वह ही अब मामले में दख़ल दे. ताकि बेज़ुबान जानवरों के जीवन के साथ ही मानव स्वास्थ्य के लिए पैदा हुई इस समस्या का निदान हो सके.

लेकिन क्या डॉक्टर सिंह के आरोपों पर ही भरोसा किया जा सकता है?

इस सवाल का ज़वाब सत्याग्रह ने अपने स्तर पर खंगाला. क्योंकि यह सवाल भी उतने ही स्वाभाविक तरीके से उठ सकता है कि कोई कर्मचारी/अधिकारी/ वैज्ञानिक अपने ही विभाग को अगर कठघरे में खड़ा कर रहा तो इसके पीछे कोई निजी हित तो नहीं है? क्या इरादा संदिग्ध तो नहीं है? लिहाज़ा डॉक्टर सिंह को जानने वालों से संपर्क किया गया. इनमें से एक थे- कुंदन सिंह, जो करीब 30 तक आईवीआरआई के कम्युनिकेशन विभाग के प्रभारी रहे. अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं. कुंदन सिंह बताते हैं, ‘डॉक्टर बीआर सिंह ईमानदार और जिद्दी किस्म के इंसान हैं. उनके इस स्वभाव की वज़ह से उनकी तरक्क़ी भी बाधित हुई. नहीं तो आज किसी शोध संस्थान के निदेशक हो सकते थे. कई बार तबादले हुए. पोर्ट ब्लेयर जैसे आईवीआरआई के सूदूर केंद्रों तक में भी भेज दिया गया. लेकिन वहां भी एक घोटाले का भांडाफोड़ कर आए थे. इन्हीं के पिछले ख़ुलासों की वज़ह से संस्थान के एक पूर्व निदेशक पहले ही आरोपों के घेरे में आ चुके हैं

डॉक्टर बीआर सिंह के फेसबुक पेज से साभार
डॉक्टर बीआर सिंह के फेसबुक पेज से साभार

डॉक्टर बीआर सिंह की अकादमिक और शोध कार्यों की पृष्ठभूमि भी उनके बारे में संदेह की ज़्यादा गुंज़ाइश नहीं देती. आईवीआरआई की ही अधिकृत वेबसाइट पर उनका प्रोफाइल मौजूद है. इसके मुताबिक उनकी विशेषज्ञता के क्षेत्रों में ही उनके 163 शोध पत्र प्रकाशित हो चुके हैं. जानकार बताते हैं कि बीते सप्ताह ही संस्थान के जर्नल में कुल 10 शोध पत्र प्रकाशित हुए. इनमें छह डॉक्टर बीआर सिंह के थे. उन्हेांने पशु चिकित्सा में अपनी स्नातकोत्तर की डिग्री आईवीआरआई से ही ली है. फिलहाल वो माइक्रोबायोलॉजी के शीर्ष विशेषज्ञों में गिने जाते हैं.

इनसे जुड़ा एक दिलचस्प वाक़या और है. बताते हैं कि उन्होंने पशुओं में होने वाले टायफाइड की ओरल वैक्सीन बनाई थी. उसका कई मर्तबा सफल परीक्षण भी किया गया. लेकिन यह दवाई अब तक बाज़ार में उपलब्ध नहीं हो पाई है. क्योंकि वैक्सीन बनाने वाली डॉक्टर सिंह की टीम की जगह इसका श्रेय किन्हीं और ओहदेदारों देने की कोशिश की गई थी. इससे बात बिगड़ गई और दवा प्रयोशाला में ही अटक गई.

एक और तथ्य डॉक्टर सिंह के आरोपों को मज़बूती देता है

डॉक्टर बीआर सिंह के आरोपों से जुड़ता एक और तथ्य उनके आरोपों को मज़बूत आधार देता है. यह तथ्य पिछले दिनों आईवीआरआई की ओर से ही बरेली में आयोजित एक कार्यशाला के दौरान सामने आया. इसमें नेशनल डेयरी डेवलेपमेंट बोर्ड के डॉ.एसके राणा ने एक शोध पत्र पेश किया. इसमें उन्होंने बताया कि आईवीआरआई के डेयरी फार्म में 30 फीसद पशु ही नहीं, 37 प्रतिशत पशु चिकित्सक भी ब्रूसलॉसिस के संक्रमण की चपेट में आ चुके हैं. वह भी तब जबकि भारत सरकार पिछले पांच साल से ब्रूसलॉसिस नियंत्रण कार्यक्रम चला रही है. और यह अब समापन की ओर से है.

इस पूरे मामले में किसका-क्या कहना है?

इस मामले में हर तरफ से तस्दीक़ करने के बाद सत्याग्रह ने डॉ.भोजराज सिंह से संपर्क किया. लेकिन वे तकनीकी कारणों से सीधे बात करने को राजी नहीं हुए. हालांकि फेसबुक अकाउंट के जरिए उन्होंने ज़रूर कुछ बातें साझा कीं. उन्होंने कहा, ‘आजाद इंडिया’ ब्लॉग मेरा ही है. उस पर अपने लेखों के जरिए मैं लंबे समय से आईवीआरआई के भ्रष्टाचार से देश, मानव समाज और पशुओं को हो रहे नुकसान को लेकर सरकार और अधिकारियों को चेता रहा हूं. प्रधानमंत्री को भी पत्र लिख चुका हूं. अब इस तमाम फ़र्जीवाड़े की आरटीआई के जरिए मिली जानकारी से भी पुष्टि हुई है. इसीलिए इसे सार्वजनिक किया है. बल्कि अब तो मेरा मानना है और मैंने प्रस्ताव भी दिया है कि आईवीआरआई का नाम भारतीय रोग प्रसार अनुसंधान केंद्र (आईडीडीआरआई) कर दिया जाए. क्योंकि कई सालों से ये संस्थान यही काम कर रहा है.’

वहीं आईसीएआर (आईवीआरआई इसी से संबद्ध संस्थान है) के महानिदेशक डॉ. त्रिलोचन महापात्रा ने सत्याग्रह से बातचीत के दौरान पहले तो आरोपों को ही ख़ारिज़ करने की कोशिश की. उल्टा सवाल खड़े किए. उनका कहना था, ‘कुछ लोगों ने आरटीआई के जरिए लोगों को परेशान करने का तरीका अपना लिया है. वे पेशेवर तरीके से यह सब करते हैं. आरटीआई का गलत इस्तेमाल हो रहा है.’ लेकिन जब ज़ोर देकर पुख़्ता तथ्यों के साथ उनसे सवाल किए गए तो उन्हाेंने कहा, ‘हम मामले की जांच कराएंगे. नियमानुसार कार्रवाई करेंगे.’

हालांकि जिस अंदाज़ में उन्होंने आश्वासन दिया, उससे इसकी कोई बहुत आश्वस्ति नहीं जगती कि जांच होगी ही!