देश की सबसे कद्दावर महिला नेताओं में राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया का नाम प्रमुखता से लिया जाता रहा है. सामंती इतिहास से ताल्लुक रखने वाले राजस्थान के पुरुषवादी समाज के बीच लंबे समय तक राजनैतिक पारी खेल पाने की वजह से आलोचक भी वसुंधरा राजे को महिला सशक्तिकरण के उदाहरण के तौर पर देखते हैं. लेकिन कुछ विश्लेषकों का कहना है कि कुछ ही महीनों में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले राजे के लिए बड़ी परेशानियों का कारण भी सूबे की महिला नेता ही होंगी.

चित्रा सिंह

चित्रा सिंह हाल ही में भारतीय जनता पार्टी से बागी हुए मानवेंद्र सिंह की पत्नी और पूर्व विदेश मंत्री जसवंत सिंह की पुत्रवधू हैं. बीते दिनों मानवेंद्र सिंह के आह्वान पर बाड़मेर में आयोजित स्वाभिमान रैली में उन्होंने वसुंधरा राजे पर जमकर हमला बोला जिसे वहां मौजूद भीड़ ने खासी गंभीरता के साथ सुना. प्रदेश की एक वरिष्ठ पत्रकार कहती हैं कि एक महिला पर दूसरी महिला द्वारा लगाए आरोपों में लोगों की अपेक्षाकृत ज्यादा दिलचस्पी होना स्वभाविक है, और जब आरोप राजे जैसी दिग्गज नेता पर लग रहे हों तो लोग निश्चित ही इन्हें ज्यादा ध्यान से सुनेंगे. कयास लगाए जा रहे हैं कि चित्रा सिंह दो महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में ताल ठोक सकती हैं.

राजस्थान में भाजपा के 23 राजपूत विधायकों में से 14 मारवाड़ यानी पश्चिमी राजस्थान से ही आते हैं. एक अनुमान के मुताबिक इस क्षेत्र की करीब 18 से 20 फीसदी आबादी राजपूत समुदाय से ताल्लुक रखती है. बताया जाता है कि जसवंत सिंह जसोल की इस क्षेत्र में ठीक-ठाक पकड़ है और अलग-अलग कारणों से प्रदेश भाजपा से खासे नाराज़ चल रहे राजपूत समुदाय की भी पूरी सहानुभूति अपने नेता और उसके परिवार के साथ है. इसके अलावा भी जसोल परिवार की छवि एक जाति विशेष की बजाय सर्व समाज के हितैषी के तौर पर ज्यादा पहचानी जाती है. ऐसे में यदि चित्रा सिंह पूरे मारवाड़ में भाजपा के खिलाफ प्रचार पर उतर जाती हैं तो वे मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकती हैं. पिछले दिनों चित्रा सिंह ने राजे की गौरव यात्रा के दौरान जैसलमेर में प्रस्तावित ‘क्षत्राणी सम्मेलन’ का नाम बदलकर इसे छत्तीस कौम का ‘शक्ति सम्मेलन’ करने को मजबूर कर दिया था.

रासेश्वरी राज्यलक्ष्मी देवी

चित्रा सिंह की ही तरह वसुंधरा राजे की पेशानी पर बल लाने वाला दूसरा नाम भी रेगिस्तान के धोरों से ही उठ रहा है. बीते दिनों जैसलमेर के पूर्व राजघराने की बहु रासेश्वरी राज्यलक्ष्मी देवी भी चुनावी मैदान में ताल ठोकने का दावा कर चुकी हैं. हालांकि अभी तक उन्होंने खुलासा नहीं किया है कि वे किस पार्टी से जुड़ने वाली हैं. लेकिन इस बात के कयास ज्यादा लगाए जा रहे हैं कि वे कांग्रेस का हाथ पकड़ सकती हैं.

राजस्थान की जनता पर आज भी पूर्व राजघरानों का खासा प्रभाव मौजूद है. मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के राजस्थान में स्थापित होने के पीछे भी राजपरिवारों से उनके जुड़ाव को प्रमुख कारण माना जाता रहा है. ऐसे में रासेश्वरी देवी को भी उनके क्षेत्र से खासा समर्थन मिलने की पूरी संभवना है. अब यदि चित्रा सिंह के साथ पश्चिमी राजस्थान में रासेश्वरी राज्यलक्ष्मी देवी भी भाजपा के खिलाफ मैदान में उतर जाती हैं तो पार्टी को बड़ा नुकसान होना तय दिखता है.

यदि किसी तरह भारतीय जनता पार्टी रासेश्वरी देवी को अपने पाले में खींच पाने में सफल रहती है तो भी राजनीतिकार बताते हैं कि वसुंधरा राजे की चिंता कम नहीं होगी. क्योंकि पार्टी आलाकमान के बनते-बिगड़ते रिश्तों के बीच रासेश्वरी देवी की शक्ल में प्रदेश संगठन को एक नई कद्दावर राजपूत नेता मिल जाएगी जो आगे चलकर राजे के लिए चुनौती बन सकती है. विशेषज्ञों का कहना है कि रासेश्वरी देवी की मजबूत राजनैतिक पृष्ठभूमि इन चुनावों में उन्हें स्थापित करने में खासी मददगार साबित होगी. जैसलमेर राजघराने के पूर्व महाराजा रघुनाथ सिंह 1957 में सांसद बने थे. वहीं हुकुम सिंह 1957-67 तक लगातार दो कार्यकाल के लिए विधायक रहे. परिवार के ही चंद्रवीर सिंह 1980 में विधायक निर्वाचित हुए और उनके बाद डॉ जितेंद्र सिंह भी विधायक बने.

निर्मल कंवर

वसुंधरा राजे के लिए राजस्थान में जो तीसरी महिला चुनावों के दौरान बड़ा सिरदर्द बन सकती हैं उनका नाम निर्मल कंवर है. कंवर, पिछले साल पुलिस कार्रवाही में मारे गए गैंगस्टर आनंदपाल की मां हैं. आनंदपाल की मौत से जुड़े विवादों के चलते प्रदेश के राजपूत समाज में भाजपा सरकार के खिलाफ जबरदस्त नाराज़गी है. और आनंदपाल की मौत के बाद से ही उसके परिवार के साथ समाज की गहरी सहानुभूति लगातार बनी हुई है. इसी के मद्देनज़र कयास लगाए जाते रहे हैं कि निर्मल कंवर इस विधानसभा चुनाव में जोर आजमा सकती हैं. पिछले एक साल में राजपूत समाज के प्रत्येक राजनैतिक और सामाजिक कार्यक्रम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेकर कंवर भी अपने चुनाव लड़ने की संभावनाओं को हवा देती रही हैं. राजपूत बहुल इलाके ‘शेखावाटी’ से ताल्लुक रखने वाली निर्मल कंवर सार्वजनिक मंचों से मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को आड़े हाथ लेने का कोई मौका नहीं चूकतीं. जानकारों का कहना है कि यदि निर्मल कंवर चुनाव में खड़ी न भी हुईं तो भी वे भाजपा सरकार के खिलाफ समाज के आक्रोश को बढ़ावा देने का काम कर सकती हैं.

मुकुल चौधरी

मुकुल चौधरी प्रदेश के चर्चित और मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के विरोधी माने जाने वाले आईपीएस पंकज चौधरी की पत्नी हैं. उनका एक परिचय यह भी है कि वे भैरोसिंह सरकार में कानून मंत्री रह चुकी शशि दत्ता की पुत्री हैं. बताया जाता है कि राजे से विवाद के चलते पंकज चौधरी को अभी तक सात चार्जशीट मिल चुकी हैं. मुकुल चौधरी की मानें तो उन्होंने अपने पति के साथ हो रही ज्यादती का बदला लेने के लिए ही मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के विधानसभा क्षेत्र झालरापाटन (झालावाड़) से चुनाव लड़ने का फैसला लिया है. मुकुल का कहना है कि इस चुनाव में वे अपनी मां और भाजपा के पुराने सहयोगियों की मदद से लोकतांत्रिक लड़ाई लड़ेंगी. बता दें कि शशि दत्ता खुद लंबे समय तक झालावाड़ में बतौर अधिवक्ता अपनी प्रैक्टिस कर चुकी हैं.

जानकारों का कहना है कि मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और भाजपा के प्रति नाराज़गी के माहौल के बीच यदि मुकुल, राजे के गृहक्षेत्र में ठीक-ठाक प्रदर्शन करने में भी सफल रहीं तो इसे प्रदेश भाजपा के लिए बड़ी मनोवैज्ञानिक क्षति के तौर पर देखा जाएगा. मुकुल चौधरी की चुनावी घोषणा तब और अहम हो जाती है जब बीते दिनों झालावाड़ में ही भाजपा कार्यकर्ताओं का विरोध झेलने की वजह से मुख्यमंत्री राजे पहले ही दबाव में हैं. तब नाराज कार्यकर्ताओं के समूह ने ‘वसुंधरा वापस जाओ’, ‘वसुंधरा झालावाड़ छोड़ो’ जैसे पोस्टरों के साथ क्षेत्र में एक बाइक रैली का आयोजन किया था. बताया जाता है कि इस रैली में पांच सौ मोटरसाइकलों के साथ एक हज़ार से ज्यादा कार्यकर्ता शामिल हुए थे. ये सभी लोग झालावाड़ में विकास न होने और भ्रष्टाचार की वजह से नाराज थे. इन चुनावों में वसुंधरा राजे के झालरापाटन के अलावा किसी एक और सीट पर दांव लगाने जैसे कयासों के पीछे भी कुछ जानकार मुकुल चौधरी को क्षेत्र में मिल रहे समर्थन को वजह के तौर पर देख रहे हैं.

दिव्या सिंह

इन विधानसभा चुनावों में भरतपुर जिले के पूर्व राजघराने से ताल्लुक रखने वाली और भारतीय जनता पार्टी से ही सांसद रह चुकी दिव्या सिंह भी वसुंधरा राजे के लिए परेशानी खड़ी कर सकती हैं. वे कांग्रेस विधायक विश्वेंद्र सिंह की पत्नी हैं. हालांकि सिंह समय-समय पर अपना पाला बदलकर चौंकाने के लिए राजस्थान में खास पहचान रखते हैं, लेकिन सूत्रों का कहना है कि तमाम विवादों के बावजूद उनको इस बार कांग्रेस से ही चुनाव लड़ना पड़ेगा. भरतपुर जिले की जिस डीग-कुम्हेर सीट से विश्वेंद्र सिंह अपना दावा ठोकते रहे हैं, वहीं से ही वसुंधरा राजे के बेहद विश्वसनीय दिगंबर सिंह भी चुनाव लड़ा करते थे. सिंह के निधन के बाद भाजपा डीग-कुम्हेर सीट पर उनकी पत्नी आशा सिंह या पुत्र शैलेश सिंह को आगे कर सकती है जिनके साथ क्षेत्र के लोगों की जबरदस्त सहानुभूति देखने को मिल रही है. ऐसे में विश्वेंद्र सिंह चाहेंगे कि दिगंबर सिंह की पत्नी या पुत्र के पैर क्षेत्र में जमने से पहले ही डिगा दिए जाएं. तय माना जा रहा है कि चुनाव में प्रचार के लिए आशा सिंह कड़ी मेहनत करने वाली हैं. ऐसे में इलाके के जानकारों का मानना है कि उनके जवाब के तौर पर दिव्या सिंह को खुलकर मैदान में आना ही होगा. स्थानीय जानकार बताते हैं कि विश्वेंद्र सिंह को पिछला विधानसभा चुनाव जितवाने में दिव्या सिंह की ‘नाटकीय’ अपील ने जादू का काम किया था. माना जा रहा है कि ऐसे में एकबारगी दिव्या सिंह खुलकर वसुंधरा राजे का सीधा विरोध न भी करें, लेकिन भाजपा को आड़े हाथों लेने से वे नहीं चूकेंगी.

गैरराजनैतिक महिलाएं

यदि राजनीति से इतर देखा जाए तो राजस्थान के सामाजिक कार्यकर्ताओं में भी महिलाएं ही ज्यादा मुखर हैं. अरुणा रॉय, कविता श्रीवास्तव और निशा सिद्धू ऐसे ही कुछ नाम हैं जो अलग-अलग मुद्दों के चलते समय-समय पर मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की पेशानी पर बल लाती रही हैं. हालांकि वसुंधरा समर्थक और भाजपा के नेता इस बात से सहमत नहीं दिखते. राजस्थान महिला आयोग की अध्यक्ष सुमन शर्मा मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के पक्ष में दलील देते हुए कहती हैं, ‘जितने भी नाम आपने गिनाए उनमें से अधिकतर की प्रदेश के लोगों पर कोई पकड़ नहीं है.’ सत्याग्रह से हुई बातचीत में शर्मा यह भी कहती हैं कि मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने खुद की छवि को राजघराने से अलग कर उसे जननेता के तौर पर स्थापित किया है जबकि रासेश्वरी राज्यलक्ष्मी देवी या दिव्या सिंह जैसी नेता ऐसा करने में असफल रही हैं. वे आगे जोड़ती हैं, ‘एक तय एजेंडे के तहत एक्टिविज़्म करने वाली महिलाओं को भी प्रदेश की अवाम पहचान चुकी है. यही कारण है कि तमाम दावों के बावजूद भी वे आज तक न तो खुद से जनता को ही जोड़ने में सफल नहीं हो पाईं और न ही मुख्यमंत्री राजे के लिए कोई बड़ी चुनौती खड़ी कर पाईं.’